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लिपि:
॥ श्री ॥
ललिता सहस्रनाम
सहस्रनाम · माँ दुर्गा
पाठ
॥ ध्यानम् ॥ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम्। अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम्॥
आरंभिक नाम (नाम 1–10)
- श्रीमाता — समस्त सृष्टि की पावन माता
- श्रीमहाराज्ञी — ब्रह्मांड की महारानी
- श्रीमत्सिंहासनेश्वरी — दिव्य सिंहासन की स्वामिनी
- चिदग्निकुण्डसम्भूता — चित् रूपी अग्निकुंड से प्रकट
- देवकार्यसमुद्यता — देवों के कार्य हेतु उद्यत
- उद्यद्भानुसहस्राभा — सहस्र उदित सूर्यों-सी आभा वाली
- चतुर्बाहुसमन्विता — चार भुजाओं से युक्त
- रागस्वरूपपाशाढ्या — राग रूपी पाश धारण करने वाली
- क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला — क्रोध रूपी अंकुश से उज्ज्वल
- मनोरूपेक्षुकोदण्डा — मन रूपी इक्षु-धनुष धारण करने वाली
अर्थ (हिन्दी)
- अरुण वर्ण वाली, करुणा से तरंगित नेत्रों वाली, पाश-अंकुश व पुष्प-बाण-धनुष धारण करने वाली, अणिमादि सिद्धियों से घिरी हुई भवानी का मैं "अहम्" रूप में ध्यान करता हूँ।
लाभ
- देवी की कृपा से समृद्धि, रक्षा व आध्यात्मिक उन्नति होती है।
- मन की एकाग्रता व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
- श्रीविद्या उपासना में अत्यंत फलदायी।
कब करें पाठ
शुक्रवार को · नवरात्रि में · पूर्णिमा को
स्रोत
रचयिता: वाग्देवियाँ (हयग्रीव-अगस्त्य संवाद). ब्रह्माण्ड पुराण — ललितोपाख्यान
