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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री महाकाल आरती

आरती · श्री शिव

पाठ

1

जय महाकाल भगवन्, जय अवंतिका नाथा। भस्म-रमे तन शोभे, त्रिशूल-डमरू हाथा॥

2

दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग, उज्जैन में राजे। काल के भी तुम काल, महाकाल विराजे॥

3

प्रातः भस्म आरती, जग में अति प्यारी। दर्शन कर भक्तन के, मिटती दुख-भारी॥

4

अकाल मृत्यु से रक्षा, भय-संकट टारो। शरण पड़े की रक्षा, महाकाल हमारी॥

5

महाकाल की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-मृत्यु से छूटे, शिव-कृपा पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे महाकाल भगवान, हे अवंतिका (उज्जैन) के नाथ, आपकी जय हो! भस्म रमे शरीर पर शोभा देती है तथा हाथों में त्रिशूल व डमरू सुशोभित हैं।
  2. दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग रूप में आप उज्जैन में सुशोभित हैं; आप काल के भी काल हैं, इसी से "महाकाल" रूप में विराजमान हैं।
  3. प्रातः की भस्म आरती समस्त जगत में अति प्रिय है; आपके दर्शन से भक्तों के भारी दुःख मिट जाते हैं।
  4. अकाल मृत्यु से रक्षा कीजिए, हमारे भय-संकट दूर कीजिए; हे महाकाल, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  5. जो भक्त श्रद्धा से महाकाल की यह आरती गाता है, वह भय व मृत्यु-भय से छूट जाता है और शिव-कृपा प्राप्त करता है।

लाभ

  • अकाल मृत्यु व मृत्यु-भय से रक्षा होती है।
  • रोग, संकट व नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
  • मन को शांति, निर्भयता व शिव-कृपा प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

सोमवार व प्रदोष काल में · महाशिवरात्रि व श्रावण मास में · प्रातः (भस्म आरती) व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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