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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री महाकाली आरती
आरती · माँ दुर्गा
पाठ
1
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्परवाली। तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
2
तेरे भक्त जनों पर माता, भीर पड़ी है भारी। दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
3
सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली। दुष्टों को तू ने संहारा, भक्तन की रखवाली॥
4
चण्ड-मुण्ड रक्तबीज को, क्षण में तूने मारा। भय-संकट से भक्तन का माँ, तूने किया उद्धारा॥
5
महाकाली की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-संकट सब मिटते, अभय-पद वह पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे अम्बे, आप ही जगदम्बा काली हैं; हे खप्पर धारण करने वाली दुर्गा, आपकी जय हो! भारती (संसार) आपके ही गुण गाती है — हे माता, हम सब आपकी आरती उतारते हैं।
- हे माता, आपके भक्तों पर भारी विपत्ति आ पड़ी है; हे माँ, सिंह की सवारी कर दानवों के दल पर टूट पड़िए (उनका नाश कीजिए)।
- सैकड़ों सिंहों से भी अधिक बलशाली, आठ भुजाओं वाली; आपने दुष्टों का संहार किया और भक्तों की रक्षा की।
- चण्ड, मुण्ड व रक्तबीज को आपने क्षणभर में मार डाला; हे माँ, आपने भक्तों का भय-संकट से उद्धार किया।
- जो भक्त श्रद्धा से महाकाली की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह अभय-पद प्राप्त करता है।
लाभ
- भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
- संकट व विपत्ति का शीघ्र नाश होता है।
- साहस, शक्ति व निर्भयता में वृद्धि होती है।
कब करें पाठ
नवरात्रि व अष्टमी को · मंगलवार व अमावस्या को · रात्रि व संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
