1अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्परवाली।
तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
हे अम्बे, आप ही जगदम्बा काली हैं; हे खप्पर धारण करने वाली दुर्गा, आपकी जय हो! भारती (संसार) आपके ही गुण गाती है — हे माता, हम सब आपकी आरती उतारते हैं।
2तेरे भक्त जनों पर माता, भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
हे माता, आपके भक्तों पर भारी विपत्ति आ पड़ी है; हे माँ, सिंह की सवारी कर दानवों के दल पर टूट पड़िए (उनका नाश कीजिए)।
3सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली।
दुष्टों को तू ने संहारा, भक्तन की रखवाली॥
सैकड़ों सिंहों से भी अधिक बलशाली, आठ भुजाओं वाली; आपने दुष्टों का संहार किया और भक्तों की रक्षा की।
4चण्ड-मुण्ड रक्तबीज को, क्षण में तूने मारा।
भय-संकट से भक्तन का माँ, तूने किया उद्धारा॥
चण्ड, मुण्ड व रक्तबीज को आपने क्षणभर में मार डाला; हे माँ, आपने भक्तों का भय-संकट से उद्धार किया।
5महाकाली की आरती, जो जन श्रद्धा गावे।
भय-संकट सब मिटते, अभय-पद वह पावे॥
जो भक्त श्रद्धा से महाकाली की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह अभय-पद प्राप्त करता है।