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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री मनसा देवी आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय मनसा देवी माता, मैया जय मनसा देवी। मन की इच्छा पूरण करती, तू वर-दायिनी देवी॥

2

शिवालिक पर्वत शोभे, हरिद्वार में धामा। गंगा-तट के निकट हो, पूरण करती कामा॥

3

मौली बाँधे भक्त वृक्ष पर, मन्नत माँगे प्यारी। पूरण होने पर खोलें, ऐसी रीति न्यारी॥

4

भय-संकट सब हरती, मनोरथ पूरण करती। शरण पड़े की रक्षा, हे जग की महतारी॥

5

मनसा देवी आरती, जो जन श्रद्धा गावे। मन की इच्छा पूरण, सुख-समृद्धि पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे मनसा देवी माता, आपकी जय हो! आप मन की इच्छा पूर्ण करती हैं और वरदान देने वाली देवी हैं।
  2. शिवालिक पर्वत पर सुशोभित, आपका धाम हरिद्वार में है; गंगा-तट के निकट विराजमान आप (भक्तों की) कामनाएँ पूर्ण करती हैं।
  3. भक्त वृक्ष पर मौली (धागा) बाँधकर प्रिय मन्नत माँगते हैं; मनोकामना पूर्ण होने पर धागा खोलते हैं — ऐसी अनूठी रीति है।
  4. आप भय-संकट हरती हैं और मनोरथ पूर्ण करती हैं; हे जगत की माता, शरण में आए जनों की रक्षा करती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से मनसा देवी की यह आरती गाता है, उसकी मन की इच्छा पूर्ण होती है और वह सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।

लाभ

  • मन की इच्छा व मनोकामना की पूर्ति होती है।
  • भय, संकट व बाधाओं से रक्षा होती है।
  • सुख, समृद्धि व सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

नवरात्रि में · मंगलवार व शुक्रवार को · मनोकामना-पूर्ति हेतु दर्शन के समय

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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