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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री मीरा बाई आरती
आरती
पाठ
1
जय जय मीरा बाई, गिरधर की दीवानी। प्रेम-भक्ति की मूरत, कृष्ण की रागिनी॥
2
"मेरे तो गिरधर गोपाल", यही धुन गाई। राजमहल को तजकर, प्रभु-प्रीत निभाई॥
3
विष का प्याला पीकर, अमृत कर डाला। प्रभु की कृपा से तुमने, हर संकट टाला॥
4
भजन-कीर्तन गाए, जग को राह दिखाई। प्रेम-भक्ति की ज्योति, घर-घर पहुँचाई॥
5
मीरा बाई आरती, जो जन श्रद्धा गावे। प्रेम-भक्ति रस पावे, कृष्ण-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे मीरा बाई, गिरधर (कृष्ण) की दीवानी, आपकी जय हो! आप प्रेम-भक्ति की मूर्ति व कृष्ण की रागिनी हैं।
- "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई" — यही धुन आपने गाई; राजमहल का सुख त्यागकर प्रभु-प्रेम निभाया।
- (शत्रुओं द्वारा दिया) विष का प्याला पीकर भी आपने उसे अमृत कर दिया; प्रभु की कृपा से आपने हर संकट टाल दिया।
- आपने भजन-कीर्तन गाकर जगत को (भक्ति का) मार्ग दिखाया; प्रेम-भक्ति की ज्योति घर-घर तक पहुँचाई।
- जो भक्त श्रद्धा से मीरा बाई की यह आरती गाता है, वह प्रेम-भक्ति का रस तथा श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- कृष्ण के प्रति प्रेम व भक्ति का भाव गहरा होता है।
- मन में समर्पण, धैर्य व सकारात्मकता आती है।
- भक्ति-रस व आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है।
कब करें पाठ
मीरा जयंती (शरद पूर्णिमा) पर · जन्माष्टमी व नित्य संध्या में · कृष्ण-भक्ति सत्संग में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक संत आरती संग्रह
