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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री नाग देवता आरती
आरती
पाठ
1
जय नाग देवता, जय शेष-वासुकि। शिव-गल शोभा पाते, हरि-शय्या रूपी॥
2
शेषनाग पर विष्णु, क्षीरसागर सोहे। पृथ्वी शीश पर धारे, त्रिभुवन मन मोहे॥
3
नाग पंचमी पूजे, दूध-लावा अर्पित। सर्प-भय सब हरते, कालसर्प से रक्षित॥
4
जो जन तुमको पूजे, संकट सब टारे। वंश-वृद्धि सुख देते, भक्तन के प्यारे॥
5
नाग देवता आरती, जो जन श्रद्धा गावे। सर्प-भय से छूटे, सुख-समृद्धि पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे नाग देवता, हे शेष व वासुकि, आपकी जय हो! आप शिव के गले की शोभा बढ़ाते हैं और हरि (विष्णु) की शय्या रूप हैं।
- शेषनाग पर विष्णु क्षीरसागर में सुशोभित होते हैं; आप अपने शीश पर पृथ्वी को धारण करते हैं — यह रूप तीनों लोकों के मन को मोह लेता है।
- नाग पंचमी पर दूध व लावा अर्पित कर पूजा की जाती है; आप सर्प-भय हर लेते हैं और कालसर्प दोष से रक्षा करते हैं।
- जो भक्त आपको पूजता है, उसके सब संकट दूर हो जाते हैं; हे भक्तों के प्यारे, आप वंश-वृद्धि व सुख देते हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से नाग देवता की यह आरती गाता है, वह सर्प-भय से छूट जाता है और सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।
लाभ
- सर्प-भय व कालसर्प दोष से रक्षा होती है।
- वंश-वृद्धि, सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- भय व बाधाओं का नाश होकर मन को शांति मिलती है।
कब करें पाठ
नाग पंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर · पंचमी तिथि व सोमवार को · कालसर्प दोष शांति हेतु
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
