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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री नृसिंह भगवान आरती

आरती · श्री विष्णु

पाठ

1

जय नृसिंह भगवाना, जय जय नृसिंह भगवाना। भक्त प्रह्लाद उबारे, हिरण्यकश्यप हाना॥

2

नर-हरि रूप अनूपम, अर्ध सिंह नर देही। खम्भ फाड़ प्रगट भये, रक्षा भक्त की लेही॥

3

उग्र रूप अति भीषण, दुष्ट-दलन-कारी। भक्तन हेतु दयालु, शरणागत-पाली॥

4

जो नर तुमको सुमिरे, भय संकट नाशे। रोग-दोष सब मिटते, सुख-सम्पति आशे॥

5

नृसिंह जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय संकट सब मिटते, रक्षा वह पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे नृसिंह भगवान, आपकी जय हो! आपने भक्त प्रह्लाद का उद्धार किया और हिरण्यकशिपु का वध किया।
  2. आधे सिंह व आधे मनुष्य का अनुपम नर-हरि रूप धारण कर; खम्भे को फाड़कर प्रकट हुए और भक्त की रक्षा की।
  3. अति भीषण उग्र रूप वाले, दुष्टों का दमन करने वाले; किन्तु भक्तों के लिए दयालु तथा शरणागत की रक्षा करने वाले।
  4. जो मनुष्य आपका स्मरण करता है, उसके भय व संकट नष्ट हो जाते हैं; रोग-दोष मिट जाते हैं और सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।
  5. जो भक्त श्रद्धा से नृसिंह जी की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय व संकट मिट जाते हैं और उसे रक्षा प्राप्त होती है।

लाभ

  • भय, शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • संकट व विपत्ति का शीघ्र नाश होता है।
  • भक्ति, साहस व आत्मबल में वृद्धि होती है।

कब करें पाठ

नृसिंह जयंती (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी) पर · शनिवार व एकादशी को · भय या संकट के समय

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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