वापस
लिपि:
॥ श्री ॥
श्री नवग्रह आरती
आरती
पाठ
1
जय जय जय नवग्रह देवा, जय जय जय नवग्रह देवा। करूँ प्रणाम मैं नित प्रति, स्वीकारो सेवा॥
2
सूर्य तेज के स्वामी, चन्द्र मन के दाता। मंगल साहस देते, बुध बुद्धि प्रदाता॥
3
गुरु ज्ञान के सागर, शुक्र वैभव लाते। शनि न्याय करत हैं, कर्मफल दिलवाते॥
4
राहु-केतु छाया ग्रह, दोष सभी हरते। नवग्रह कृपा से भक्तन, सुख-शान्ति भरते॥
5
नवग्रह जी की आरती, जो जन नित गावे। ग्रह-पीड़ा सब मिटती, सुख-सम्पति पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे नवग्रह देवो, आपकी जय हो! मैं नित्य प्रणाम करता हूँ; मेरी सेवा स्वीकार कीजिए।
- सूर्य तेज के स्वामी हैं, चन्द्र मन (शांति) के दाता हैं; मंगल साहस देते हैं और बुध बुद्धि प्रदान करते हैं।
- गुरु (बृहस्पति) ज्ञान के सागर हैं, शुक्र वैभव लाते हैं; शनि न्याय करते हैं और कर्म के अनुसार फल दिलाते हैं।
- राहु व केतु छाया-ग्रह हैं जो (पूजन से) समस्त दोष हर लेते हैं; नवग्रह की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख-शांति भर जाती है।
- जो भक्त नित्य नवग्रह जी की यह आरती गाता है, उसकी समस्त ग्रह-पीड़ा मिट जाती है और वह सुख-सम्पत्ति प्राप्त करता है।
लाभ
- नौ ग्रहों के दोष व पीड़ा शांत होती है।
- जीवन में संतुलन, स्थिरता व सुख-शांति आती है।
- कर्मफल अनुकूल होकर बाधाएँ दूर होती हैं।
कब करें पाठ
प्रातः पूजा में · शनिवार व अमावस्या को · ग्रह-शांति/नवग्रह पूजन के पश्चात
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
