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॥ श्री ॥

परमा एकादशी

व्रत कथा · श्री विष्णु

पाठ

व्रत कथा

निर्धन ब्राह्मण सुमेधा

काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक धर्मनिष्ठ किंतु अत्यंत निर्धन ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ रहता था। दरिद्रता के बावजूद पत्नी ने पति को धनार्जन हेतु परदेश जाने नहीं दिया और अतिथि-सेवा में कमी नहीं आने दी।

एक बार ऋषि कौण्डिन्य उनके यहाँ पधारे। दंपती की श्रद्धा देखकर उन्होंने उन्हें अधिक मास की परमा एकादशी तथा पंचरात्रि व्रत करने की प्रेरणा दी।

दरिद्रता का नाश

दंपती ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से एक राजकुमार ने उन्हें समस्त सुविधाओं से युक्त घर तथा जीविका हेतु एक ग्राम प्रदान किया, जिससे उनकी दरिद्रता सदा के लिए दूर हो गई और अंत में वे स्वर्ग को प्राप्त हुए।

ऋषि कौण्डिन्य ने यह भी बताया कि इसी व्रत के प्रभाव से कुबेर को धनाधिपति का पद मिला और राजा हरिश्चंद्र को उनका परिवार व राज्य पुनः प्राप्त हुआ।

लाभ

  • दरिद्रता का नाश व समृद्धि
  • समस्त तीर्थ व यज्ञ तुल्य पुण्य
  • सुख-सौभाग्य; अंत में स्वर्ग

स्रोत

परमा एकादशी माहात्म्य — निर्धन ब्राह्मण सुमेधा व ऋषि कौण्डिन्य प्रसंग · एकादशी माहात्म्य परंपरा

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