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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री राधा मंत्र

मंत्र · श्री राधा

पाठ

1

राधे राधे

2

ॐ राधायै स्वाहा

3

श्रीं रां राधिकायै स्वाहा

4

क्लीं श्रीं राधिकायै स्वाहा

अर्थ (हिन्दी)

  1. राधा जी का नाम-जाप — ब्रज की सबसे सहज उपासना। ब्रज में यही अभिवादन भी है। इसके लिए कोई विधि या दीक्षा नहीं चाहिए।
  2. षडक्षर (छह अक्षर का) राधा-मंत्र — ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड 55.6। भाव: राधा जी को यह आहुति समर्पित है। "स्वाहा" समर्पण का शब्द है।
  3. अष्टाक्षर (आठ अक्षर का) राधा-मंत्र — गौरीतन्त्र से, गौरगोविन्दार्चन-स्मरणपद्धति में उद्धृत। "श्रीं" श्री-बीज है और "रां" राधा-बीज।
  4. अष्टाक्षर मंत्र का दूसरा रूप — ऊर्ध्वाम्नाय से, साधनदीपिका (षष्ठकक्षा) में उद्धृत। इसमें पहला बीज "क्लीं" है। दोनों रूप आठ ही अक्षर के हैं।

लाभ

  • "राधे राधे" नाम-जाप के लिए न विधि चाहिए, न दीक्षा — चलते-फिरते भी किया जा सकता है।
  • षडक्षर मंत्र का उद्धरण ब्रह्मवैवर्त पुराण में है — राधा-उपासना का सबसे पुराना पुराण-प्रमाण।
  • नित्य जप से मन एकाग्र होता है; परंपरा प्रेम व भक्ति-भाव की वृद्धि कहती है।
  • राधाष्टमी के संकल्प-जप में यही मंत्र लिए जाते हैं।

कब करें पाठ

नित्य — किसी भी समय, बिना विधि के ("राधे राधे") · प्रातः ब्रह्म मुहूर्त व संध्या में माला-जप · राधाष्टमी व एकादशी पर संकल्प-सहित · ब्रज-यात्रा में — बरसाना, वृंदावन, राधाकुंड

स्रोत

ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड 55.5–6 — षडक्षर राधा-मंत्र (विकिस्रोत का संस्कृत पाठ) · गौरगोविन्दार्चन-स्मरणपद्धति, श्लोक 181 (गौरीतन्त्र से उद्धृत) — "श्रीं रां राधिकायै स्वाहा" · साधनदीपिका, षष्ठकक्षा (श्री-ऊर्ध्वाम्नाय से उद्धृत) — "क्लीं श्रीं राधिकायै स्वाहा" · "राधे राधे" नाम-जाप — ब्रज की जीवित परंपरा; कोई ग्रंथ-उद्धरण नहीं

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