वापस
लिपि:
॥ श्री ॥
श्री रंगनाथ आरती
आरती · श्री विष्णु
पाठ
1
जय रंगनाथ स्वामी, शेष-शय्या धारी। श्रीरंगम विराजे, जय भव-भय-हारी॥
2
श्याम-वरण तन सुन्दर, शयन-मुद्रा प्यारी। लक्ष्मी (रंगनायकी) संग शोभे, छवि अति न्यारी॥
3
दिव्यदेश में प्रमुख, वैष्णव-धाम कहाया। वैकुण्ठ एकादशी पर, द्वार स्वर्ग का खुलवाया॥
4
भक्तन के दुख हरते, मोक्ष-मार्ग दिखाते। जो जन तुमको सुमिरे, भव-पार लगाते॥
5
रंगनाथ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भक्ति-मुक्ति वह पावे, हरि-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे रंगनाथ स्वामी, शेष-शय्या पर शयन करने वाले, आपकी जय हो! श्रीरंगम में विराजमान हे भव-भय हरने वाले, आपकी जय हो।
- श्याम वर्ण का सुन्दर तन, प्यारी शयन-मुद्रा में; लक्ष्मी (रंगनायकी) के संग सुशोभित आपकी छवि अति अनुपम है।
- दिव्यदेशों में प्रमुख, आप वैष्णव-धाम कहलाते हैं; वैकुण्ठ एकादशी पर यहाँ (वैकुण्ठ) स्वर्ग का द्वार खुलता है।
- आप भक्तों के दुःख हरते हैं और मोक्ष-मार्ग दिखाते हैं; जो आपका स्मरण करते हैं, उन्हें भवसागर से पार लगाते हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से रंगनाथ की यह आरती गाता है, वह भक्ति व मुक्ति तथा हरि (विष्णु) की कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- भक्ति, सुख-शांति व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
- भय व संकट दूर होकर रक्षा मिलती है।
- मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होकर विष्णु-कृपा प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
वैकुण्ठ एकादशी पर · एकादशी व नित्य संध्या में · गुरुवार को
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
