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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री रविदास आरती
आरती
पाठ
1
जय जय गुरु रविदास, संत शिरोमणि स्वामी। निर्गुण भक्ति सिखाई, तुम अन्तर्यामी॥
2
मन चंगा तो कठौती में, गंगा का दर्शन। श्रम की गरिमा गाई, हरि-नाम का सुमिरन॥
3
ऊँच-नीच को तजकर, समता का मारग। "बेगमपुरा" बताया, सबको दिया सत-मग॥
4
भक्ति-ज्ञान का सागर, अज्ञान मिटाया। भक्तन के मन-मंदिर, रविदास समाया॥
5
रविदास जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ज्ञान-भक्ति वह पावे, सहज शान्ति पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे गुरु रविदास, हे संत-शिरोमणि स्वामी, आपकी जय हो! आपने निर्गुण भक्ति सिखाई और आप सबके अन्तर्यामी हैं।
- "मन शुद्ध हो तो कठौती (पात्र) में ही गंगा का दर्शन होता है" — यह सिखाकर आपने श्रम की गरिमा गाई व हरि-नाम का स्मरण किया।
- ऊँच-नीच का भेद त्यागकर समता का मार्ग दिखाया; "बेगमपुरा" (दुःख-रहित आदर्श नगर) का स्वप्न बताकर सबको सत्य का मार्ग दिया।
- आप भक्ति व ज्ञान के सागर हैं, आपने अज्ञान मिटाया; हे रविदास, आप भक्तों के मन-मंदिर में समाए हुए हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से गुरु रविदास की यह आरती गाता है, वह ज्ञान-भक्ति तथा सहज शांति प्राप्त करता है।
लाभ
- मन को सहज शांति व आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है।
- भेदभाव से ऊपर उठकर समता व प्रेम का भाव आता है।
- भक्ति, सेवा व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
कब करें पाठ
रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा) पर · नित्य संध्या व सत्संग में · पूर्णिमा को
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक संत आरती संग्रह
