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॥ श्री ॥

श्री रविदास चालीसा

चालीसा

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर हृदय धरि ध्यान। संत रविदास की करूँ, चालीसा गुणगान॥

1

जय जय संत रविदास गुसाईं। भक्ति-ज्ञान के तुम जग-दाई॥

2

काशी-नगरी जन्म तुम्हारा। संत-शिरोमणि जग-उजियारा॥

3

"मन चंगा तो कठौती में गंगा"। पावन वचन कहा तुम संगा॥

4

भक्ति-भाव में रहे समाये। श्रम को पूजा-रूप बनाये॥

5

ऊँच-नीच का भेद मिटाया। समता का संदेश सुनाया॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

दीन-दुखी के तुम रखवारे। भक्त-गण नित तुम्हें पुकारे॥

8

मीरा ने तुम्हें गुरु बनाया। भक्ति-मार्ग सबने अपनाया॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

रविदास जयंती भक्त मनावें। माघ-पूर्णिमा शीश नवावें॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

13

सत्संग-कीर्तन भक्त सजावैं। श्रद्धा से गुरु को रिझावैं॥

14

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-शान्ति घर में लाते॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। रविदास-कृपा वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

"बेगमपुरा" नगर बताया। भेद-रहित जग-स्वप्न दिखाया॥

18

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह रविदास चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा रविदास की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-शान्ति घर में लावैं॥

22

रविदास-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

सच्ची-श्रद्धा-भक्ति बताई। पाखंड से दूरी सिखलाई॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत रविदास देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। जन-जन गाता जयकारा॥

27

गुरु-ग्रंथ में बानी सोहे। भक्ति-पद सब जग को मोहे॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

रविदास-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

काशी-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

सत्य-भक्ति का मार्ग दिखाते। शरणागत को पार लगाते॥

33

दीन-रक्षक तुम कल्याणी। भव-तारण तुम सुख-दानी॥

34

जो जन रविदास गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

रविदास-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

सुख-शान्ति-भक्ति घर में आवै। समता-श्रद्धा-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। रविदास जो जन नित ध्यावै॥

38

भक्ति-मार्ग वह सहज वह पावै। रविदास-नाम जो जन गावै॥

39

भक्ति-सुख-शान्ति घर में लावै। समता-श्रद्धा सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय संत रविदासा। रक्षा करो प्रभु पूर्ण आशा॥

रविदास चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, संत-कृपा बरसाय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में ध्यान धरकर मैं संत रविदास की चालीसा का गुणगान करता हूँ।
  2. हे संत रविदास गुसाईं, आपकी जय-जय हो; आप जगत को भक्ति व ज्ञान देने वाले हैं।
  3. काशी-नगरी में आपका जन्म हुआ; आप संत-शिरोमणि व जगत के उजियारे हैं।
  4. "मन चंगा तो कठौती में गंगा" — यह पावन वचन आपने जगत को दिया।
  5. आप भक्ति-भाव में समाए रहते थे और श्रम (कर्म) को ही पूजा-रूप बनाया।
  6. आपने ऊँच-नीच का भेद मिटाया और समता का संदेश सुनाया।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. आप दीन-दुखियों के रक्षक हैं; भक्तगण नित्य आपको पुकारते हैं।
  9. मीराबाई ने आपको गुरु बनाया; सबने आपका भक्ति-मार्ग अपनाया।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. भक्त रविदास जयंती मनाते हैं और माघ-पूर्णिमा पर शीश नवाते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  14. भक्त सत्संग-कीर्तन सजाते हैं और श्रद्धा से गुरु को रिझाते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह रविदास-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. आपने "बेगमपुरा" (दुःख-रहित नगर) की कल्पना बताई और भेद-रहित समाज का स्वप्न दिखाया।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह रविदास चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर संत रविदास की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-शांति लाते हैं।
  23. जिन पर संत रविदास की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. आपने सच्ची श्रद्धा-भक्ति बताई और पाखंड से दूरी सिखलाई।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर संत रविदास तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है; जन-जन आपका जयकारा गाता है।
  28. गुरु-ग्रंथ साहिब में आपकी बानी सुशोभित है; आपके भक्ति-पद समस्त जगत को मोह लेते हैं।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन रविदास-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. काशी-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप सत्य-भक्ति का मार्ग दिखाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
  34. आप दीनों के रक्षक व कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
  35. जो जन संत रविदास के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन रविदास-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में सुख, शांति व भक्ति आती है और समता, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन संत रविदास का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन रविदास-नाम गाता है, वह सहज ही भक्ति-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में भक्ति, सुख व शांति आती है और समता व श्रद्धा बढ़ती है।
  41. हे संत रविदास, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कर आशा पूर्ण कीजिए।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल रविदास चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और संत की कृपा बरसती है।

लाभ

  • मन को शांति, भक्ति व सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
  • भय, संकट व अहंकार-भेदभाव से मुक्ति मिलती है।
  • सच्ची भक्ति, समता व सेवा-भाव बढ़ता है।
  • घर में सुख-शांति व संत-कृपा बनी रहती है।

कब करें पाठ

रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा) पर · रविवार को · सत्संग व नित्य पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक रविदास चालीसा · संत रविदास भक्ति-परंपरा

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