बंदौं वीणा पाणि को,
देहु आय मोहिं ज्ञान।
पाय बुद्धि रविदास को,
करौं चरित्र बखान॥
मैं वीणा धारण करने वाली सरस्वती की वंदना करता हूँ — आकर मुझे ज्ञान दीजिए। रविदास की बुद्धि पाकर मैं उनका चरित्र वर्णन करूँ।
मातु की महिमा अमित है,
लिखि न सकत है दास।
ताते आयों शरण में,
पुरवहु जन की आस॥
माता की महिमा अपार है, यह दास उसे लिख नहीं सकता। इसीलिए शरण में आया हूँ — इस जन की आस पूरी कीजिए।
1जै होवै रविदास तुम्हारी।
कृपा करहु हरिजन हितकारी॥
हे रविदास, आपकी जय हो; हे हरिजनों का हित करने वाले, कृपा कीजिए।
2राहू भक्त तुम्हारे ताता।
कर्मा नाम तुम्हारी माता॥
राहू आपके भक्त पिता थे और कर्मा आपकी माता का नाम था।
3काशी ढिंग माडुर स्थाना।
वर्ण अछूत करत गुजराना॥
काशी के निकट मडुर नामक स्थान पर आप रहे; अछूत माने जाने वाले वर्ण में जीवन-यापन किया।
4द्वादश वर्ष उम्र जब आई।
तुम्हरे मन हरि भक्ति समाई॥
जब बारह वर्ष की उम्र हुई, तब आपके मन में हरि की भक्ति समा गई।
5रामानन्द के शिष्य कहाये।
पाय ज्ञान निज नाम बढ़ाये॥
आप रामानन्द के शिष्य कहलाए; ज्ञान पाकर अपना नाम बढ़ाया।
6शास्त्र तर्क काशी में कीन्हों।
ज्ञानिन को उपदेश है दीन्हों॥
काशी में शास्त्रार्थ किया और ज्ञानियों को भी उपदेश दिया।
7गंग मातु के भक्त अपारा।
कौड़ी दीन्ह उनहिं उपहारा॥
आप गंगा माता के अपार भक्त थे; एक बार उपहार में एक कौड़ी दी।
8पंडित जन ताको लै जाई।
गंग मातु को दीन्ह चढ़ाई॥
पंडितजन उसे ले गए और गंगा माता को चढ़ा दिया।
9हाथ पसारि लीन्ह चौगानी।
भक्त की महिमा अमित बखानी॥
गंगा ने हाथ फैलाकर वह चौगानी (कौड़ी) ले ली; भक्त की महिमा अपार बखानी गई।
10चकित भये पंडित काशी के।
देखि चरित भव भय नाशी के॥
काशी के पंडित चकित रह गए — भव का भय नाश करने वाला वह चरित्र देखकर।
11रत्न जटित कंगन तब दीन्हाँ।
रविदास अधिकारी कीन्हाँ॥
तब गंगा ने रत्न-जड़ित कंगन दिया और रविदास को उसका अधिकारी बनाया।
12पंडित दीजौ भक्त को मेरे।
आदि जन्म के जो हैं चेरे॥
(गंगा ने कहा —) हे पंडित, यह मेरे भक्त को दे देना, जो आदि जन्म से ही मेरे सेवक हैं।
13पहुँचे पंडित ढिग रविदासा।
दै कंगन पुरइ अभिलाषा॥
पंडित रविदास के पास पहुँचे और कंगन देकर अभिलाषा पूरी की।
14तब रविदास कही यह बाता।
दूसर कंगन लावहु ताता॥
तब रविदास ने यह बात कही — हे तात, दूसरा कंगन भी लाइए।
15पंडित जन तब कसम उठाई।
दूसर दीन्ह न गंगा माई॥
पंडितजनों ने तब कसम खाई कि गंगा माई ने दूसरा नहीं दिया।
16तब रविदास ने वचन उचारे।
पंडित जन सब भये सुखारे॥
तब रविदास ने वे वचन कहे, जिनसे सब पंडितजन प्रसन्न हो गए —
17जो सर्वदा रहै मन चंगा।
तौ घर बसति मातु है गंगा॥
"जो मन सदा चंगा रहे, तो घर में ही गंगा माता बसती हैं।"
18हाथ कठौती में तब डारा।
दूसर कंगन एक निकारा॥
फिर उन्होंने हाथ कठौती में डाला और दूसरा कंगन निकाल दिया।
19चित संकोचित पंडित कीन्हें।
अपने अपने मारग लीन्हें॥
पंडितों का चित्त संकोच से भर गया और वे अपने-अपने मार्ग चले गए।
20तब से प्रचलित एक प्रसंगा।
मन चंगा तो कठौती में गंगा॥
तभी से यह कहावत प्रचलित हुई — "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।
21एक बार फिरि परयो झमेला।
मिलि पंडितजन कीन्हों खेला॥
एक बार फिर झमेला खड़ा हुआ; पंडितजनों ने मिलकर एक खेल रचा।
22सालिग राम गंग उतरावै।
सोई प्रबल भक्त कहलावै॥
(तय हुआ कि) जो शालिग्राम को गंगा में तैरा देगा, वही प्रबल भक्त कहलाएगा।
23सब जन गये गंग के तीरा।
मूरति तैरावन बिच नीरा॥
सब लोग गंगा के तट पर गए और मूर्ति को जल के बीच तैराने लगे।
24डूब गईं सबकी मझधारा।
सबके मन भयो दुःख अपारा॥
सबकी मूर्तियाँ मझधार में डूब गईं; सबका मन अपार दुख से भर गया।
25पत्थर मूर्ति रही उतराई।
सुर नर मिलि जयकार मचाई॥
पर (रविदास की) पत्थर की मूर्ति तैरती रही; देवता और मनुष्य मिलकर जयकार करने लगे।
26रह्यो नाम रविदास तुम्हारा।
मच्यो नगर महँ हाहाकारा॥
आपका नाम रविदास रह गया (अमर हो गया); नगर भर में हाहाकार मच गया।
27चीरि देह तुम दुग्ध बहायो।
जन्म जनेऊ आप दिखाओ॥
(एक बार) आपने अपनी देह चीरकर दूध बहाया और जन्म का जनेऊ दिखा दिया।
28देखि चकित भये सब नर नारी।
विद्वानन सुधि बिसरी सारी॥
यह देखकर सब नर-नारी चकित रह गए; विद्वानों की सारी सुध-बुध जाती रही।
29ज्ञान तर्क कबिरा संग कीन्हों।
चकित उनहुँ का तुम करि दीन्हों॥
आपने कबीर के संग ज्ञान की चर्चा की और उन्हें भी चकित कर दिया।
30गुरु गोरखहि दीन्ह उपदेशा।
उन मान्यो तकि संत विशेषा॥
गुरु गोरखनाथ को भी आपने उपदेश दिया; उन्होंने आपको विशेष संत मानकर स्वीकार किया।
31सदना पीर तर्क बहु कीन्हाँ।
तुम ताको उपदेश है दीन्हाँ॥
सदना पीर ने बहुत तर्क किए; आपने उन्हें भी उपदेश दिया।
32मन महँ हारयो सदन कसाई।
जो दिल्ली में खबरि सुनाई॥
सदन कसाई मन ही मन हार गया, और यह खबर दिल्ली तक पहुँच गई।
33मुस्लिम धर्म की सुनि कुबड़ाई।
लोधि सिकन्दर गयो गुस्साई॥
मुस्लिम धर्म की यह कुबड़ाई (अपमान) सुनकर लोदी सिकंदर क्रोधित हो उठा।
34अपने गृह तब तुमहिं बुलावा।
मुस्लिम होन हेतु समुझावा॥
उसने आपको अपने घर बुलाया और मुसलमान बनने के लिए समझाया।
35मानी नाहिं तुम उसकी बानी।
बंदीगृह काटी है रानी॥
आपने उसकी बात नहीं मानी; तब उसने आपको बंदीगृह में डाल दिया।
36कृष्ण दरश पाये रविदासा।
सफल भई तुम्हरी सब आशा॥
बंदीगृह में ही रविदास ने कृष्ण के दर्शन पाए और आपकी सब आशा सफल हुई।
37ताले टूटि खुल्यो है कारा।
नाम सिकन्दर के तुम मारा॥
ताले टूट गए और कारागार खुल गया; आपने सिकंदर के नाम (गर्व) पर ही प्रहार कर दिया।
38काशी पुर तुम कहँ पहुँचाई।
दै प्रभुता अरुमान बड़ाई॥
आपको प्रभुता और मान-बड़ाई देकर काशीपुर पहुँचा दिया गया।
39मीरा योगावति गुरु कीन्हों।
जिनको क्षत्रिय वंश प्रवीनो॥
मीरा और योगावती ने आपको गुरु बनाया, जो क्षत्रिय वंश की प्रवीण थीं।
40तिनको दै उपदेश अपारा।
कीन्हों भव से तुम निस्तारा॥
उन्हें अपार उपदेश देकर आपने उनका भव-सागर से निस्तार किया।
ऐसे ही रविदास ने,
कीन्हें चरित अपार।
कोई कवि गावै कितै,
तहूं न पावै पार॥
रविदास ने ऐसे ही अपार चरित्र किए; कोई कवि कितना भी गाए, उनका पार नहीं पाता।
नियम सहित हरिजन अगर,
ध्यान धरै चालीसा।
ताकी रक्षा करेंगे,
जगतपति जगदीशा॥
जो हरिजन नियम सहित इस चालीसा का ध्यान धरे, जगत के स्वामी जगदीश स्वयं उसकी रक्षा करेंगे।