श्री रविदास चालीसा

śrī ravidāsa cālīsā

Sant Ravidas Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
44
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा); रविवार
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)समता (Equality)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री रविदास चालीसा दो दोहों और चालीस चौपाइयों की रचना है, जो "जै होवै रविदास तुम्हारी" से शुरू होती है। यह स्तुति नहीं, संत रविदास की जीवनी है — माता-पिता के नाम से लेकर "मन चंगा तो कठौती में गंगा", कबीर और गोरखनाथ से संवाद, सिकंदर लोदी का कारागार और मीरा के गुरु बनने तक।

परिचय

स्रोत: संत रविदास (रैदास), काशी — भक्तिकाल की निर्गुण संत परंपरा

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री रविदास चालीसा
IASTśrī ravidāsa cālīsā
मूल स्रोतसंत रविदास (रैदास), काशी — भक्तिकाल की निर्गुण संत परंपरा
शुभ दिनरविदास जयंती (माघ पूर्णिमा); रविवार
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा किसी देवता की नहीं, एक संत की जीवनी है — और वह जीवनी क्रम से, घटना-दर-घटना कही गई है।

परिचय (चौपाई 2–5). पिता राहू, माता कर्मा, स्थान काशी के निकट मडुर। चालीसा यह छिपाती नहीं कि वे किस वर्ण में जन्मे — "वर्ण अछूत करत गुजराना" (3) — और यही स्पष्टता आगे की हर कथा को अर्थ देती है। बारह वर्ष की आयु में भक्ति जागी (4) और वे रामानन्द के शिष्य हुए (5)।

गंगा और कंगन (चौपाई 7–20). एक कौड़ी का उपहार गंगा ने स्वयं हाथ बढ़ाकर लिया (9); बदले में रत्न-जड़ित कंगन दिया (11)। पंडित उसे लाए तो रविदास ने दूसरा कंगन माँगा, और जब वे न ला सके तो कहा — "जो सर्वदा रहै मन चंगा, तौ घर बसति मातु है गंगा" (17)। फिर कठौती में हाथ डालकर दूसरा कंगन निकाल दिया (18)। चौपाई 20 उस कहावत को नाम देती है जो आज भी चलती है — "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।

शालिग्राम (चौपाई 21–26). पंडितों ने शर्त रखी कि जो शालिग्राम को गंगा में तैरा दे, वही प्रबल भक्त। सबकी मूर्तियाँ डूब गईं, रविदास की पत्थर-मूर्ति तैरती रही।

संवाद (चौपाई 29–32). यह हिस्सा असामान्य है — कबीर, गुरु गोरखनाथ और सदना पीर, तीनों से चर्चा। भक्तिकाल के इन नामों को एक साथ रखने वाला कोई और चालीसा नहीं मिलता।

सिकंदर लोदी (चौपाई 33–40). दिल्ली तक खबर पहुँची; लोदी सिकंदर ने बुलाकर धर्म बदलने को कहा, न मानने पर बंदीगृह भेजा। वहीं कृष्ण के दर्शन हुए, ताले टूटे, और अंततः मान-सम्मान सहित काशी लौटे। अंतिम चौपाई में मीरा का नाम आता है, जिन्होंने रविदास को गुरु बनाया।

⚠️ एक बात दर्ज कर देनी चाहिए। इस audit की योजना में यह मान लिया गया था कि संत-परंपरा में चालीसा की प्रथा नहीं है और रविदास का पृष्ठ हटाना पड़ेगा। जाँच में यह ग़लत निकला — रविदास चालीसा तीन बड़े प्रकाशकों पर मौजूद है। (गुरु नानक और कबीर के लिए सचमुच कोई प्रकाशित चालीसा नहीं मिली।)

संपूर्ण चालीसा

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बंदौं वीणा पाणि को, देहु आय मोहिं ज्ञान। पाय बुद्धि रविदास को, करौं चरित्र बखान॥

मैं वीणा धारण करने वाली सरस्वती की वंदना करता हूँ — आकर मुझे ज्ञान दीजिए। रविदास की बुद्धि पाकर मैं उनका चरित्र वर्णन करूँ।

मातु की महिमा अमित है, लिखि न सकत है दास। ताते आयों शरण में, पुरवहु जन की आस॥

माता की महिमा अपार है, यह दास उसे लिख नहीं सकता। इसीलिए शरण में आया हूँ — इस जन की आस पूरी कीजिए।

जै होवै रविदास तुम्हारी। कृपा करहु हरिजन हितकारी॥

हे रविदास, आपकी जय हो; हे हरिजनों का हित करने वाले, कृपा कीजिए।

राहू भक्त तुम्हारे ताता। कर्मा नाम तुम्हारी माता॥

राहू आपके भक्त पिता थे और कर्मा आपकी माता का नाम था।

काशी ढिंग माडुर स्थाना। वर्ण अछूत करत गुजराना॥

काशी के निकट मडुर नामक स्थान पर आप रहे; अछूत माने जाने वाले वर्ण में जीवन-यापन किया।

द्वादश वर्ष उम्र जब आई। तुम्हरे मन हरि भक्ति समाई॥

जब बारह वर्ष की उम्र हुई, तब आपके मन में हरि की भक्ति समा गई।

रामानन्द के शिष्य कहाये। पाय ज्ञान निज नाम बढ़ाये॥

आप रामानन्द के शिष्य कहलाए; ज्ञान पाकर अपना नाम बढ़ाया।

शास्त्र तर्क काशी में कीन्हों। ज्ञानिन को उपदेश है दीन्हों॥

काशी में शास्त्रार्थ किया और ज्ञानियों को भी उपदेश दिया।

गंग मातु के भक्त अपारा। कौड़ी दीन्ह उनहिं उपहारा॥

आप गंगा माता के अपार भक्त थे; एक बार उपहार में एक कौड़ी दी।

पंडित जन ताको लै जाई। गंग मातु को दीन्ह चढ़ाई॥

पंडितजन उसे ले गए और गंगा माता को चढ़ा दिया।

हाथ पसारि लीन्ह चौगानी। भक्त की महिमा अमित बखानी॥

गंगा ने हाथ फैलाकर वह चौगानी (कौड़ी) ले ली; भक्त की महिमा अपार बखानी गई।

चकित भये पंडित काशी के। देखि चरित भव भय नाशी के॥

काशी के पंडित चकित रह गए — भव का भय नाश करने वाला वह चरित्र देखकर।

रत्न जटित कंगन तब दीन्हाँ। रविदास अधिकारी कीन्हाँ॥

तब गंगा ने रत्न-जड़ित कंगन दिया और रविदास को उसका अधिकारी बनाया।

पंडित दीजौ भक्त को मेरे। आदि जन्म के जो हैं चेरे॥

(गंगा ने कहा —) हे पंडित, यह मेरे भक्त को दे देना, जो आदि जन्म से ही मेरे सेवक हैं।

पहुँचे पंडित ढिग रविदासा। दै कंगन पुरइ अभिलाषा॥

पंडित रविदास के पास पहुँचे और कंगन देकर अभिलाषा पूरी की।

तब रविदास कही यह बाता। दूसर कंगन लावहु ताता॥

तब रविदास ने यह बात कही — हे तात, दूसरा कंगन भी लाइए।

पंडित जन तब कसम उठाई। दूसर दीन्ह न गंगा माई॥

पंडितजनों ने तब कसम खाई कि गंगा माई ने दूसरा नहीं दिया।

तब रविदास ने वचन उचारे। पंडित जन सब भये सुखारे॥

तब रविदास ने वे वचन कहे, जिनसे सब पंडितजन प्रसन्न हो गए —

जो सर्वदा रहै मन चंगा। तौ घर बसति मातु है गंगा॥

"जो मन सदा चंगा रहे, तो घर में ही गंगा माता बसती हैं।"

हाथ कठौती में तब डारा। दूसर कंगन एक निकारा॥

फिर उन्होंने हाथ कठौती में डाला और दूसरा कंगन निकाल दिया।

चित संकोचित पंडित कीन्हें। अपने अपने मारग लीन्हें॥

पंडितों का चित्त संकोच से भर गया और वे अपने-अपने मार्ग चले गए।

तब से प्रचलित एक प्रसंगा। मन चंगा तो कठौती में गंगा॥

तभी से यह कहावत प्रचलित हुई — "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।

एक बार फिरि परयो झमेला। मिलि पंडितजन कीन्हों खेला॥

एक बार फिर झमेला खड़ा हुआ; पंडितजनों ने मिलकर एक खेल रचा।

सालिग राम गंग उतरावै। सोई प्रबल भक्त कहलावै॥

(तय हुआ कि) जो शालिग्राम को गंगा में तैरा देगा, वही प्रबल भक्त कहलाएगा।

सब जन गये गंग के तीरा। मूरति तैरावन बिच नीरा॥

सब लोग गंगा के तट पर गए और मूर्ति को जल के बीच तैराने लगे।

डूब गईं सबकी मझधारा। सबके मन भयो दुःख अपारा॥

सबकी मूर्तियाँ मझधार में डूब गईं; सबका मन अपार दुख से भर गया।

पत्थर मूर्ति रही उतराई। सुर नर मिलि जयकार मचाई॥

पर (रविदास की) पत्थर की मूर्ति तैरती रही; देवता और मनुष्य मिलकर जयकार करने लगे।

रह्यो नाम रविदास तुम्हारा। मच्यो नगर महँ हाहाकारा॥

आपका नाम रविदास रह गया (अमर हो गया); नगर भर में हाहाकार मच गया।

चीरि देह तुम दुग्ध बहायो। जन्म जनेऊ आप दिखाओ॥

(एक बार) आपने अपनी देह चीरकर दूध बहाया और जन्म का जनेऊ दिखा दिया।

देखि चकित भये सब नर नारी। विद्वानन सुधि बिसरी सारी॥

यह देखकर सब नर-नारी चकित रह गए; विद्वानों की सारी सुध-बुध जाती रही।

ज्ञान तर्क कबिरा संग कीन्हों। चकित उनहुँ का तुम करि दीन्हों॥

आपने कबीर के संग ज्ञान की चर्चा की और उन्हें भी चकित कर दिया।

गुरु गोरखहि दीन्ह उपदेशा। उन मान्यो तकि संत विशेषा॥

गुरु गोरखनाथ को भी आपने उपदेश दिया; उन्होंने आपको विशेष संत मानकर स्वीकार किया।

सदना पीर तर्क बहु कीन्हाँ। तुम ताको उपदेश है दीन्हाँ॥

सदना पीर ने बहुत तर्क किए; आपने उन्हें भी उपदेश दिया।

मन महँ हारयो सदन कसाई। जो दिल्ली में खबरि सुनाई॥

सदन कसाई मन ही मन हार गया, और यह खबर दिल्ली तक पहुँच गई।

मुस्लिम धर्म की सुनि कुबड़ाई। लोधि सिकन्दर गयो गुस्साई॥

मुस्लिम धर्म की यह कुबड़ाई (अपमान) सुनकर लोदी सिकंदर क्रोधित हो उठा।

अपने गृह तब तुमहिं बुलावा। मुस्लिम होन हेतु समुझावा॥

उसने आपको अपने घर बुलाया और मुसलमान बनने के लिए समझाया।

मानी नाहिं तुम उसकी बानी। बंदीगृह काटी है रानी॥

आपने उसकी बात नहीं मानी; तब उसने आपको बंदीगृह में डाल दिया।

कृष्ण दरश पाये रविदासा। सफल भई तुम्हरी सब आशा॥

बंदीगृह में ही रविदास ने कृष्ण के दर्शन पाए और आपकी सब आशा सफल हुई।

ताले टूटि खुल्यो है कारा। नाम सिकन्दर के तुम मारा॥

ताले टूट गए और कारागार खुल गया; आपने सिकंदर के नाम (गर्व) पर ही प्रहार कर दिया।

काशी पुर तुम कहँ पहुँचाई। दै प्रभुता अरुमान बड़ाई॥

आपको प्रभुता और मान-बड़ाई देकर काशीपुर पहुँचा दिया गया।

मीरा योगावति गुरु कीन्हों। जिनको क्षत्रिय वंश प्रवीनो॥

मीरा और योगावती ने आपको गुरु बनाया, जो क्षत्रिय वंश की प्रवीण थीं।

तिनको दै उपदेश अपारा। कीन्हों भव से तुम निस्तारा॥

उन्हें अपार उपदेश देकर आपने उनका भव-सागर से निस्तार किया।

ऐसे ही रविदास ने, कीन्हें चरित अपार। कोई कवि गावै कितै, तहूं न पावै पार॥

रविदास ने ऐसे ही अपार चरित्र किए; कोई कवि कितना भी गाए, उनका पार नहीं पाता।

नियम सहित हरिजन अगर, ध्यान धरै चालीसा। ताकी रक्षा करेंगे, जगतपति जगदीशा॥

जो हरिजन नियम सहित इस चालीसा का ध्यान धरे, जगत के स्वामी जगदीश स्वयं उसकी रक्षा करेंगे।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. मैं वीणा धारण करने वाली सरस्वती की वंदना करता हूँ — आकर मुझे ज्ञान दीजिए। रविदास की बुद्धि पाकर मैं उनका चरित्र वर्णन करूँ।
  2. माता की महिमा अपार है, यह दास उसे लिख नहीं सकता। इसीलिए शरण में आया हूँ — इस जन की आस पूरी कीजिए।
  3. हे रविदास, आपकी जय हो; हे हरिजनों का हित करने वाले, कृपा कीजिए।
  4. राहू आपके भक्त पिता थे और कर्मा आपकी माता का नाम था।
  5. काशी के निकट मडुर नामक स्थान पर आप रहे; अछूत माने जाने वाले वर्ण में जीवन-यापन किया।
  6. जब बारह वर्ष की उम्र हुई, तब आपके मन में हरि की भक्ति समा गई।
  7. आप रामानन्द के शिष्य कहलाए; ज्ञान पाकर अपना नाम बढ़ाया।
  8. काशी में शास्त्रार्थ किया और ज्ञानियों को भी उपदेश दिया।
  9. आप गंगा माता के अपार भक्त थे; एक बार उपहार में एक कौड़ी दी।
  10. पंडितजन उसे ले गए और गंगा माता को चढ़ा दिया।
  11. गंगा ने हाथ फैलाकर वह चौगानी (कौड़ी) ले ली; भक्त की महिमा अपार बखानी गई।
  12. काशी के पंडित चकित रह गए — भव का भय नाश करने वाला वह चरित्र देखकर।
  13. तब गंगा ने रत्न-जड़ित कंगन दिया और रविदास को उसका अधिकारी बनाया।
  14. (गंगा ने कहा —) हे पंडित, यह मेरे भक्त को दे देना, जो आदि जन्म से ही मेरे सेवक हैं।
  15. पंडित रविदास के पास पहुँचे और कंगन देकर अभिलाषा पूरी की।
  16. तब रविदास ने यह बात कही — हे तात, दूसरा कंगन भी लाइए।
  17. पंडितजनों ने तब कसम खाई कि गंगा माई ने दूसरा नहीं दिया।
  18. तब रविदास ने वे वचन कहे, जिनसे सब पंडितजन प्रसन्न हो गए —
  19. "जो मन सदा चंगा रहे, तो घर में ही गंगा माता बसती हैं।"
  20. फिर उन्होंने हाथ कठौती में डाला और दूसरा कंगन निकाल दिया।
  21. पंडितों का चित्त संकोच से भर गया और वे अपने-अपने मार्ग चले गए।
  22. तभी से यह कहावत प्रचलित हुई — "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।
  23. एक बार फिर झमेला खड़ा हुआ; पंडितजनों ने मिलकर एक खेल रचा।
  24. (तय हुआ कि) जो शालिग्राम को गंगा में तैरा देगा, वही प्रबल भक्त कहलाएगा।
  25. सब लोग गंगा के तट पर गए और मूर्ति को जल के बीच तैराने लगे।
  26. सबकी मूर्तियाँ मझधार में डूब गईं; सबका मन अपार दुख से भर गया।
  27. पर (रविदास की) पत्थर की मूर्ति तैरती रही; देवता और मनुष्य मिलकर जयकार करने लगे।
  28. आपका नाम रविदास रह गया (अमर हो गया); नगर भर में हाहाकार मच गया।
  29. (एक बार) आपने अपनी देह चीरकर दूध बहाया और जन्म का जनेऊ दिखा दिया।
  30. यह देखकर सब नर-नारी चकित रह गए; विद्वानों की सारी सुध-बुध जाती रही।
  31. आपने कबीर के संग ज्ञान की चर्चा की और उन्हें भी चकित कर दिया।
  32. गुरु गोरखनाथ को भी आपने उपदेश दिया; उन्होंने आपको विशेष संत मानकर स्वीकार किया।
  33. सदना पीर ने बहुत तर्क किए; आपने उन्हें भी उपदेश दिया।
  34. सदन कसाई मन ही मन हार गया, और यह खबर दिल्ली तक पहुँच गई।
  35. मुस्लिम धर्म की यह कुबड़ाई (अपमान) सुनकर लोदी सिकंदर क्रोधित हो उठा।
  36. उसने आपको अपने घर बुलाया और मुसलमान बनने के लिए समझाया।
  37. आपने उसकी बात नहीं मानी; तब उसने आपको बंदीगृह में डाल दिया।
  38. बंदीगृह में ही रविदास ने कृष्ण के दर्शन पाए और आपकी सब आशा सफल हुई।
  39. ताले टूट गए और कारागार खुल गया; आपने सिकंदर के नाम (गर्व) पर ही प्रहार कर दिया।
  40. आपको प्रभुता और मान-बड़ाई देकर काशीपुर पहुँचा दिया गया।
  41. मीरा और योगावती ने आपको गुरु बनाया, जो क्षत्रिय वंश की प्रवीण थीं।
  42. उन्हें अपार उपदेश देकर आपने उनका भव-सागर से निस्तार किया।
  43. रविदास ने ऐसे ही अपार चरित्र किए; कोई कवि कितना भी गाए, उनका पार नहीं पाता।
  44. जो हरिजन नियम सहित इस चालीसा का ध्यान धरे, जगत के स्वामी जगदीश स्वयं उसकी रक्षा करेंगे।

लाभ

  • संत रविदास की पूरी जीवनी क्रम से — माता-पिता से लेकर मीरा के गुरु बनने तक।
  • "मन चंगा तो कठौती में गंगा" कहावत कहाँ से आई, चालीसा स्वयं बताती है (चौपाई 17–20)।
  • कबीर, गोरखनाथ और सदना पीर — तीनों से संवाद एक ही पाठ में (चौपाई 29–32)।
  • रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा) का प्रमुख पाठ।

कब करें पाठ

रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा) पररविवार कोनित्य प्रातः पाठ मेंसत्संग व भजन-मंडली में

पाठ विधि

संत रविदास के चित्र के समक्ष दीप जलाएँ और श्वेत पुष्प अर्पित करें। इस परंपरा में मूर्ति-पूजा की अपेक्षा नाम-स्मरण और सत्संग का महत्व अधिक है, इसलिए पाठ से पहले "सतनाम" का स्मरण किया जाता है। पहले दोनों दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और दोनों समापन दोहे पढ़ें। रविदास जयंती पर यह पाठ सामूहिक रूप से, सत्संग में किया जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — रविदास चालीसा (आधार-पाठ) · drikpanchang.com — श्री रविदास चालीसा · hindunidhi.com — श्री रविदास चालीसा (चार जगह अकेली शुद्ध प्रति)
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

श्री रविदास चालीसा — सामान्य प्रश्न

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