श्री साईं बाबा आरती
पाठ
आरती साईबाबा। सौख्यदातार जीवा। चरणरजतळीं द्यावा दासां विसावा। भक्तां विसावा॥
जाळुनियां अनंग। स्वस्वरूपीं राहे दंग। मुमुक्षुजनां दावी। निजडोळां श्रीरंग॥
जया मनीं जैसा भाव। तया तैसा अनुभव। दाविसी दयाघना। ऐसी तुझी ही माव॥
तुमचें नाम ध्यातां। हरे संसृतिव्यथा। अगाध तव करणी। मार्ग दाविसी अनाथा॥
कलियुगीं अवतार। सगुणब्रह्म साचार। अवतीर्ण झालासे। स्वामी दत्त दिगंबर॥
आठा दिवसां गुरुवारी। भक्त करिती वारी। प्रभुपद पहावया। भवभय निवारी॥
माझा निजद्रव्य ठेवा। तव चरणरजसेवा। मागणें हेंचि आता। तुम्हा देवाधिदेवा॥
इच्छित दीन चातक। निर्मळ तोय निजसुख। पाजावें माधवा या। सांभाळ आपुली भाक॥
अर्थ (हिन्दी)
- (ध्रुवपद) हे जीवों को सुख देने वाले साईं बाबा, आपकी आरती! अपने चरणों की धूल के नीचे दासों को विश्राम दीजिए — भक्तों को विश्राम दीजिए।
- काम (अनंग) को जलाकर आप अपने आत्म-स्वरूप में मग्न रहते हैं; मोक्ष चाहने वालों को आप उनकी अपनी आँखों से श्रीरंग (भगवान) का दर्शन कराते हैं।
- जिसके मन में जैसा भाव होता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है; हे दया के घन, आप ऐसा ही दिखाते हैं — ऐसी आपकी लीला है।
- आपके नाम का ध्यान करने से संसार (जन्म-मरण) की व्यथा मिट जाती है; आपकी करनी अगाध है — आप अनाथों को मार्ग दिखाते हैं।
- कलियुग में आपका अवतार हुआ है — आप साक्षात सगुण ब्रह्म हैं; हे स्वामी, आप दत्त-दिगंबर के रूप में अवतरित हुए हैं।
- हर आठवें दिन, गुरुवार को, भक्त वारी (दर्शन-यात्रा) करते हैं — प्रभु के चरणों के दर्शन के लिए, जो संसार का भय दूर करते हैं।
- मेरा अपना धन और खज़ाना आपके चरणों की धूल की सेवा है; हे देवों के देव, अब आपसे यही माँगता हूँ।
- यह दीन चातक (पक्षी की तरह) निर्मल जल — आत्म-सुख — चाहता है; इस माधव को वह पिलाइए, और अपना वचन निभाइए।
लाभ
- गुरु-भक्ति का भाव — "माझा निजद्रव्य ठेवा, तव चरणरजसेवा": गुरु-चरणों की सेवा ही सबसे बड़ा धन।
- भाव के अनुसार अनुभव — "जया मनीं जैसा भाव, तया तैसा अनुभव"।
- गुरुवार के दर्शन और वारी का पाठ (पद 5)।
कब करें पाठ
गुरुवार को · गुरु पूर्णिमा पर · साईं मंदिर में आरती के समय
स्रोत
रचयिता: अंतिम पद की छाप "माधवा" (प्रकाशित प्रतियों में पूरा नाम नहीं). kavitakosh.org — आरती साईबाबा (आधार-पाठ) · marathimati.com — साईबाबाची आरती · marathi.webdunia.com — आरती साईबाबाची
