1आरती साईंबाबा, सौख्यदातार जीवा।
चरणरजातळी, द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा॥
हे साईं बाबा, आपकी आरती — आप जीवों को सुख देने वाले हैं; अपने चरणों की रज तले इस दास को विश्राम (शरण) दीजिए, भक्तों को विश्राम दीजिए।
2जाळुनियां आनंगा, स्वस्वरूपीं राहे दंग।
मुमुक्षु जनां दावी, निज डोळां श्रीरंग, डोळां श्रीरंग॥
काम (अनंग) को भस्म कर जो अपने आत्मस्वरूप में लीन रहते हैं; मुक्ति चाहने वाले भक्तों को अपने ही नेत्रों में श्रीरंग (परमात्मा) का दर्शन कराते हैं।
3जया मनीं जैसा भाव, तया तैसा अनुभव।
दाविसी दयाघना, ऐसी तुझी ही माव, तुझी ही माव॥
जिसके मन में जैसा भाव होता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है; हे करुणा के सागर, ऐसी ही आपकी अद्भुत लीला (माया) है।
4तुमचे नाम ध्याता, हरे संसृति व्यथा।
अगाध तव करणी, मार्ग दाविसी अनाथा, दाविसी अनाथा॥
आपका नाम स्मरण करते ही संसार के दुख दूर हो जाते हैं; आपकी लीला अगाध है — आप अनाथों को (सही) मार्ग दिखाते हैं।
5कलियुगीं अवतार, सगुण ब्रह्म साचार।
अवतीर्ण झालासे, स्वामी दत्त दिगंबर, दत्त दिगंबर॥
कलियुग में आप साकार (सगुण) ब्रह्म के सच्चे अवतार हैं; हे स्वामी, आप दत्त दिगंबर (दत्तात्रेय) के रूप में अवतीर्ण हुए हैं।