श्री सायिनाथ अष्टकम्
पाठ
पत्रिग्राम समुद्भूतं द्वारकामायि वासिनम्। भक्ताभीष्टप्रदं देवं सायिनाथं नमाम्यहम्॥१॥
महोन्नत कुलेजातं क्षीराम्बुधि समे शुभे। द्विजराजं तमोघ्नं तं सायिनाथं नमाम्यहम्॥२॥
जगदुद्धारणार्थं यो नररूप धरो विभुः। योगिनं च महात्मानं सायिनाथं नमाम्यहम्॥३॥
साक्षात्कारे जये लाभे स्वात्मारामो गुरोर्मुखात्। निर्मलं मम गात्रं च सायिनाथं नमाम्यहम्॥४॥
यस्य दर्शन मात्रेण नश्यन्ति व्याधि कोटयः। सर्वे पापाः प्रणश्यन्ति सायिनाथं नमाम्यहम्॥५॥
नरसिंहादि शिष्याणां ददौ योऽनुग्रहं गुरुः। भवबन्धापहर्तारं सायिनाथं नमाम्यहम्॥६॥
धनाढ्यान् च दरिद्रान्यः समदृष्ट्येव पश्यति। करुणासागरं देवं सायिनाथं नमाम्यहम्॥७॥
समाधिस्थोपि यो भक्त्या समतीर्थार्थदानतः। अचिन्त्य महिमानन्तं सायिनाथं नमाम्यहम्॥८॥ ॥ इति श्री सायिनाथ अष्टकम् ॥
अर्थ (हिन्दी)
- जो पत्री ग्राम में उत्पन्न हुए और द्वारकामायी में निवास करते हैं, तथा जो भक्तों का अभीष्ट देने वाले देव हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। पहला ही श्लोक दो स्थान नाम लेकर बता देता है: पत्री (महाराष्ट्र) जन्म-स्थान की परंपरा है, और द्वारकामायी वह मस्जिद है जिसे स्वयं बाबा ने यह नाम दिया था।
- जो क्षीरसागर के समान शुभ तथा अत्यंत उन्नत कुल में उत्पन्न हुए, और जो द्विजराज (चंद्रमा) के समान अंधकार का नाश करने वाले हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। उपमा सुसंगत है: चंद्रमा भी क्षीरसागर से ही प्रकट हुए माने जाते हैं।
- जो विभु जगत के उद्धार के लिए नर-रूप धारण किए हुए हैं, तथा जो योगी व महात्मा हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। यह श्लोक स्तोत्र की दृष्टि स्पष्ट कर देता है — बाबा को यहाँ सिद्ध पुरुष नहीं, अवतार माना गया है।
- जो गुरु के मुख से (प्राप्त उपदेश द्वारा) साक्षात्कार, जय तथा लाभ में स्वात्माराम (अपनी ही आत्मा में रमण करने वाले) हैं — उनसे मेरा शरीर निर्मल हो; उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। (इस श्लोक की वाक्य-रचना शिथिल है और उपलब्ध स्रोत में इसका पदच्छेद स्पष्ट नहीं; अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है।)
- जिनके दर्शन मात्र से करोड़ों व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं और समस्त पाप प्रणष्ट हो जाते हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
- जिन गुरु ने नरसिंह आदि शिष्यों पर अनुग्रह किया, तथा जो भव-बंधन का अपहरण करने वाले हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। यह श्लोक स्तोत्र को इतिहास से जोड़ता है: यहाँ नाम लेकर शिष्यों का उल्लेख है।
- जो धनवान तथा दरिद्र — दोनों को समान दृष्टि से ही देखते हैं, और जो करुणा के सागर देव हैं — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। यह इस स्तोत्र का सबसे विशिष्ट श्लोक है, और शिरडी की परंपरा का मूल भाव भी।
- जो समाधिस्थ होकर भी भक्ति तथा तीर्थ-दान के द्वारा (फल देते रहते हैं), तथा जिनकी महिमा अचिंत्य व अनंत है — उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। — इस प्रकार श्री सायिनाथ अष्टकम् सम्पूर्ण हुआ। अंतिम श्लोक का भाव शिरडी की जीवित परंपरा है: समाधि के बाद भी वे उतने ही उपस्थित माने जाते हैं।
लाभ
- श्लोक 5 के अनुसार दर्शन मात्र से करोड़ों व्याधियाँ तथा समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
- श्लोक 7 इस स्तोत्र का सार है — वे धनवान व दरिद्र दोनों को समान दृष्टि से देखते हैं; यह शिरडी परंपरा का मूल भाव है।
- श्लोक 6 के अनुसार वे भव-बंधन का अपहरण करने वाले हैं।
- श्लोक 8 का भाव यह है कि समाधि के बाद भी वे भक्ति व तीर्थ-दान के द्वारा फल देते रहते हैं।
- केवल 3–4 मिनट का पाठ, अतः प्रत्येक गुरुवार को नियमपूर्वक पढ़ने के लिए सुविधाजनक।
कब करें पाठ
गुरुवार को — शिरडी परंपरा का मुख्य वार · नौ गुरुवार के साईं व्रत में प्रतिदिन · रामनवमी, गुरुपूर्णिमा तथा विजयादशमी — शिरडी के तीन प्रमुख उत्सव · साईं मंदिर के दर्शन अथवा शिरडी यात्रा के समय
स्रोत
रचयिता: अज्ञात (रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया). stotranidhi.com — श्री सायिनाथ अष्टकम् ("श्री शिर्डी साईबाबा स्तोत्राणि" वर्ग के अंतर्गत); पूर्ण पाठ, 8 श्लोक। · ⚠️ यह पृष्ठ इस संग्रह के दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता, और यह छिपाया नहीं गया। पाठ केवल एक स्रोत पर मिला; sanskritdocuments, hindunidhi तथा drikpanchang पर शिरडी साईं का कोई अष्टकम् नहीं है। · ⚠️ रचना-काल आधुनिक है — शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं (महासमाधि 1918), अतः यह किसी पुराण से नहीं आता, बल्कि 20वीं सदी की संस्कृत रचना है। रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया, अतः कुछ गढ़ा नहीं गया। · ⚠️ शिरडी साईं और सत्य साईं भिन्न व्यक्ति हैं। आधार-स्रोत के इसी वर्ग में "श्री सत्यसायि अष्टोत्तरशतनामावली" भी है, जो सत्य साईं की है; यहाँ केवल शिरडी साईं की सामग्री ली गई है। श्लोक 1 का "पत्रिग्राम/द्वारकामायि" इसकी आंतरिक पुष्टि है। · ⚠️ श्लोक 4 की वाक्य-रचना शिथिल है और उसका पदच्छेद स्रोत में स्पष्ट नहीं; अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है, गढ़ा हुआ निश्चित अर्थ नहीं दिया गया। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित (8/8)।
