समय
3–4 मिनट
श्लोक
8
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
गुरुवार; रामनवमी, गुरुपूर्णिमा व विजयादशमी (शिरडी के तीन प्रमुख उत्सव)
उद्देश्य:श्रद्धा-सबूरी (Faith & Patience)कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)आरोग्य (Health)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
श्री सायिनाथ अष्टकम् आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है, जिसका हर श्लोक "सायिनाथं नमाम्यहम्" पर समाप्त होता है। पहला श्लोक ही पत्री ग्राम तथा द्वारकामायी का नाम लेकर इसे शिरडी परंपरा में स्थापित कर देता है। पाठ 3–4 मिनट का है।
FAQ
श्री सायिनाथ अष्टकम् — सामान्य प्रश्न
यह शिरडी के साईं बाबा की स्तुति में रचा गया आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है, छन्द अनुष्टुप्। इसकी पहचान वह ध्रुवपद है जिस पर आठों श्लोक समाप्त होते हैं — "सायिनाथं नमाम्यहम्", अर्थात "उन सायिनाथ को मैं नमस्कार करता हूँ"। सम्पूर्ण पाठ 3–4 मिनट का है।
नहीं — और यह स्पष्ट कह देना चाहिए। शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं; उनकी महासमाधि 1918 में हुई। इसलिए यह अष्टकम् किसी पुराण से नहीं आ सकता — यह 20वीं सदी की संस्कृत रचना है। इससे इसकी प्रामाणिकता कम नहीं होती: यह छपा हुआ, प्रचलित और नियमित रूप से पढ़ा जाने वाला पाठ है। रचयिता का नाम किसी उपलब्ध स्रोत ने नहीं दिया, अतः यहाँ कोई नाम गढ़ा नहीं गया।
पत्री (महाराष्ट्र का पाथरी) वह ग्राम है जिसे परंपरा साईं बाबा का जन्म-स्थान मानती है। द्वारकामायी वह मस्जिद है जिसे स्वयं बाबा ने यह नाम दिया था और जहाँ उन्होंने शिरडी में अपना अधिकांश जीवन बिताया — वहीं धूनी सदा जलती रही। किसी अष्टकम् का पहला ही श्लोक इस तरह भौगोलिक होकर आरंभ हो, यह विरल है; और यह इसलिए है क्योंकि यह किसी पौराणिक देवता का नहीं, एक ऐतिहासिक व्यक्ति का स्तोत्र है।
सातवाँ — *"धनाढ्यान् च दरिद्रान्यः समदृष्ट्येव पश्यति"*, अर्थात वे धनवान और दरिद्र, दोनों को समान दृष्टि से ही देखते हैं; और वे करुणा के सागर हैं। आठ श्लोकों में यही एक पंक्ति है जो किसी शक्ति या महिमा की नहीं, व्यवहार की बात करती है — और वही शिरडी परंपरा का मूल भाव है।
हाँ, तीसरे श्लोक में स्पष्ट रूप से। वहाँ कहा गया है — *"जगदुद्धारणार्थं यो नररूप धरो विभुः"*, अर्थात वे विभु हैं जिन्होंने जगत के उद्धार के लिए नर-रूप धारण किया। यहाँ उन्हें सिद्ध पुरुष नहीं, अवतार माना गया है। यही मान्यता शिरडी परंपरा में स्थापित है, और साईं सच्चरित्र में भी उन्हें दत्तात्रेय का अवतार कहा जाता है।
भाव यह है कि समाधिस्थ होकर भी वे भक्ति तथा तीर्थ-दान के द्वारा फल देते रहते हैं, और उनकी महिमा अचिंत्य तथा अनंत है। यह शिरडी की आज भी जीवित मान्यता है — बाबा की महासमाधि 1918 में हुई, पर परंपरा उन्हें समाधि के बाद भी उतना ही उपस्थित मानती है। स्तोत्र का अंत इसी विश्वास पर होता है।
नहीं — और यह भ्रम बहुत होता है, इसलिए स्पष्ट कर देना चाहिए। शिरडी साईं बाबा (महासमाधि 1918) और सत्य साईं बाबा भिन्न व्यक्ति हैं, और उनके स्तोत्र भी भिन्न हैं। इंटरनेट पर एक ही वर्ग में दोनों की सामग्री साथ-साथ मिलती है — उदाहरण के लिए "श्री सत्यसायि अष्टोत्तरशतनामावली" सत्य साईं की है, शिरडी की नहीं। इस पृष्ठ की सामग्री केवल शिरडी साईं बाबा की है, और इस अष्टकम् का पहला श्लोक स्वयं "पत्रिग्राम" तथा "द्वारकामायी" कहकर इसकी पुष्टि करता है।
हाँ, चौथे श्लोक में — और यह छिपाया नहीं गया। *"साक्षात्कारे जये लाभे स्वात्मारामो गुरोर्मुखात्"* की वाक्य-रचना शिथिल है और उपलब्ध स्रोत में उसका पदच्छेद स्पष्ट नहीं है। यहाँ अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है और उसी श्लोक पर यह बात दर्ज है — कोई निश्चित अर्थ गढ़कर नहीं दिया गया। शेष सात श्लोक स्पष्ट हैं।
गुरुवार शिरडी परंपरा का मुख्य वार है। प्रातः स्नान के पश्चात साईं बाबा के चित्र के समक्ष घी का दीप जलाकर बैठें; परंपरा में पीले वस्त्र व पीले पुष्प का विधान है। पहले "ॐ श्री सायिनाथाय नमः" तीन बार कहें, फिर आठों श्लोक क्रम से पढ़ें और अंत का ध्रुवपद ठहरकर बोलें। नौ गुरुवार के साईं व्रत में इसे प्रतिदिन पढ़ने की परंपरा है। इसके साथ श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्र, साईं चालीसा अथवा साईं अष्टोत्तर शतनामावली पढ़ी जाती है।
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पर्व
