समय
3–4 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
नवरात्रि; अष्टमी व नवमी; मंगलवार व शुक्रवार
उद्देश्य:रक्षा (Protection)भय-नाश (Freedom from Fear)विजय (Victory)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
श्री दुर्गाष्टकम् आठ श्लोकों का शाक्त स्तोत्र है जिसका हर श्लोक "दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते" पर समाप्त होता है। यह "कात्यायनि महामाये" से आरंभ होता है और नवें श्लोक में फलश्रुति आती है। पूरा पाठ 3–4 मिनट में पूर्ण होता है।
FAQ
श्री दुर्गाष्टकम् — सामान्य प्रश्न
आठ श्लोक, और उनके बाद एक नवाँ श्लोक जो फलश्रुति है — "दुर्गाष्टकमिदं पुण्यं…"। "अष्टक" का अर्थ ही आठ है; फलश्रुति उससे अलग, पाठ-फल बताने वाला श्लोक है। हर श्लोक की अंतिम पंक्ति एक ही है — "दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते"।
यह ज्ञात नहीं है, और इसे स्पष्ट कह देना चाहिए। उपलब्ध स्रोतों में न रचयिता का नाम मिलता है, न कोई पुराण-अध्याय। इसीलिए यहाँ कोई नाम नहीं दिया गया — गढ़ा नहीं गया। जो निश्चित है वह यह कि यह आठ अनुष्टुप् श्लोकों की पारंपरिक शाक्त स्तुति है और दो स्वतंत्र स्रोतों में समान क्रम से मिलती है।
यह इस स्तोत्र की सबसे विशिष्ट बात है। श्लोक 2 देवी को वासुदेवसहोदरी (श्रीकृष्ण की बहन) तथा नन्दा कहता है, और श्लोक 6 उन्हें विष्णुनाथसहोदरी व वृष्णीनां कुलसम्भूता। यह सीधे योगमाया की ओर संकेत है — वही जो कंस के हाथ से छूटकर आकाश में स्थित हुईं और जिन्हें भागवत-परंपरा नन्द-यशोदा की पुत्री मानती है। श्लोक 4 में शंख, चक्र व गदा — विष्णु के आयुध — देवी के हाथों में हैं। पूरे स्तोत्र में शाक्त और वैष्णव परंपराएँ एक-दूसरे में गुँथी हुई हैं।
यह दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र का भाव है। वहाँ मधु-कैटभ के वध के प्रसंग में भगवान विष्णु की योगनिद्रा ही देवी हैं — ब्रह्मा उन्हीं की स्तुति करते हैं ताकि विष्णु जागें। इसीलिए यहाँ एक ही श्लोक में योगनिद्रा, महानिद्रा, योगमाया और योगसिद्धिकरी — चारों साथ आते हैं।
क्योंकि स्तोत्र स्वयं यह कहता है। श्लोक 8 में देवी को अष्टमीनवमीप्रिये कहा गया है — जिन्हें अष्टमी और नवमी तिथियाँ प्रिय हैं। यही पंक्ति इस परंपरा का आधार है। उसी श्लोक में अट्टहासप्रिये भी है, जो देवी के उग्र रणचंडी रूप का संकेत करता है — आठ श्लोकों की स्तुति अंत में उसी रूप पर आकर ठहरती है।
नहीं, वह बिल्कुल अलग रचना है। दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र देवी के 108 नामों की सूची है ("सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी…") और वह दुर्गा सप्तशती की परंपरा से जुड़ा है। यह दुर्गाष्टकम् केवल आठ श्लोकों की स्तुति है, नामों की सूची नहीं। दोनों को एक मान लेना सामान्य भ्रम है।
हाँ, एक स्थान पर वास्तविक पाठ-भेद है। श्लोक 4 कहीं "शार्ङ्गज्यायतबाहवे" छपता है (शार्ङ्ग धनुष की प्रत्यंचा से तनी भुजाओं वाली) और कहीं "शार्ङ्गाद्यायुधबाहवे" (शार्ङ्ग आदि आयुधों से युक्त भुजाओं वाली)। दोनों अर्थ-संगत हैं; यहाँ पहला रखा गया है और भेद दर्ज है। इसके अतिरिक्त श्लोक 2 में "वसुन्धराश्रिये"/"वसुन्धरश्रिये" केवल मात्रा-भेद है, अर्थ नहीं बदलता।
लंबाई और उद्देश्य दोनों में। दुर्गा सप्तशती 700 श्लोकों का ग्रंथ है, जिसमें तीन चरित्र और देवी की समस्त लीलाएँ हैं; उसका पूर्ण पाठ कई घंटों का होता है। दुर्गाष्टकम् केवल आठ श्लोक, 3–4 मिनट की स्तुति है। इसी कारण नित्य-नियम अथवा समय की कमी में यह पढ़ा जाता है, और सप्तशती के पाठ से पूर्व या पश्चात भी।
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पर्व
