समय
5–6 मिनट
श्लोक
13
कठिनाई
मध्यम (Intermediate)
शुभ दिन
चतुर्थी; बुधवार; गणेश चतुर्थी
उद्देश्य:विघ्न-नाश (Removal of Obstacles)सिद्धि (Accomplishment)विद्या (Knowledge)
✓ संपूर्ण (13/13 श्लोक)
गणेशाष्टकम् गणेश पुराण के उपासना खण्ड (अध्याय 91) का स्तोत्र है, जिसमें कुल 13 श्लोक हैं — देवताओं द्वारा की गई आठ श्लोकों की स्तुति तथा स्वयं गणेश जी द्वारा कही गई पाँच श्लोकों की फलश्रुति। आठों श्लोक एक ही ध्रुवपद पर समाप्त होते हैं — "सदा तं गणेशं नमामो भजामः"।
FAQ
श्री गणेशाष्टकम् — सामान्य प्रश्न
दोनों सही हैं, और यही भ्रम का कारण है। "अष्टकम्" नाम आठ स्तुति-श्लोकों से बना है, जो देवगण कहते हैं। किंतु उनके बाद पाँच फलश्रुति-श्लोक और आते हैं, जो स्वयं गणेश जी कहते हैं। अतः पूर्ण पाठ तेरह श्लोकों का है — 8 + 5।
गणेश पुराण के उपासना खण्ड, अध्याय 91 का। पुष्पिका यही बताती है — "इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे एकनवतितमोऽध्याये गणेशाष्टकं सम्पूर्णम्"।
यह एक संवाद के भीतर रखा हुआ स्तोत्र है, और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। आरंभ "सर्वे ऊचुः" से होता है — स्तुति के आठ श्लोक देवगण मिलकर कहते हैं। फिर नवाँ श्लोक कहता है "पुनरूचे गणाधीशः" — तब गणेश जी ने कहा; अर्थात फलश्रुति स्वयं गणेश जी की वाणी है, किसी बाद के संकलक की नहीं। और तेरहवाँ श्लोक कथा बंद करता है — "एवमुक्त्वा ततो देवश्चान्तर्धानं गतः प्रभुः", ऐसा कहकर प्रभु अंतर्धान हो गए।
यह इस स्तोत्र का ध्रुवपद है — आठों स्तुति-श्लोक ठीक इसी पंक्ति पर समाप्त होते हैं। साथ ही आठों श्लोक "यतः" (जिनसे) से आरंभ होते हैं। इस दोहरी रचना से हर श्लोक एक ही वाक्य-रचना दोहराता है: "जिनसे यह… यह… यह हुआ — उन गणेश को हम सदा नमन करते हैं।" इसी से पाठ में लय बनती है और स्तोत्र सहज कंठस्थ हो जाता है।
यह उन थोड़े स्तोत्रों में है जो अवधि और संख्या दोनों क्रम से देते हैं —
| पाठ-क्रम | फल |
| --- | --- |
| तीन दिन, त्रिसन्ध्य | सब कार्य सिद्ध |
| आठ दिन, तथा चतुर्थी को आठ बार | आठों सिद्धियाँ |
| एक मास, प्रतिदिन दस बार | बंधन तथा राजदण्ड से भी मुक्ति |
| इक्कीस बार | सब मनोवांछित |
श्लोक 13 इन सब पर एक शर्त रखता है — "परया भक्त्या", अर्थात परा भक्ति के साथ। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं।
"नेति नेति" अर्थात "यह नहीं, यह नहीं" — उपनिषदों का वह प्रसिद्ध सूत्र जिससे ब्रह्म का वर्णन निषेध द्वारा किया जाता है, क्योंकि कोई भी सकारात्मक वर्णन उन तक नहीं पहुँच पाता। श्लोक कहता है कि वेद-वाणी मन सहित कुण्ठित होकर लौट आती है और श्रुति उन्हें "नेति नेति" कहकर ही बता पाती है। यहाँ यह वेदांत-सूत्र गणेश पर लगाया गया है — उन्हें परब्रह्म तथा चिदानन्द-स्वरूप कहकर। इसी से यह स्तोत्र केवल स्तुति न रहकर वेदांत तक पहुँच जाता है।
हाँ, और यह बड़े भ्रम की जड़ है। इस नाम से कम-से-कम चार अलग रचनाएँ मिलती हैं —
1. यह वाला — गणेश पुराण, उपासना खण्ड, "यतोऽनन्तशक्तेः…"; सर्वाधिक प्रसिद्ध
2. गणनायकाष्टकम् (गणेशाष्टकम् / गणाष्टकम् नाम से भी)
3. गणेशस्तवनम् अथवा कव्यष्टकम् — वाल्मीकि को आरोपित
4. गणेशस्तवराजः — रुद्रयामल तंत्र से
इनके अतिरिक्त "एकदन्तं महाकायं…" वाला पाठ भी कभी-कभी गणेशाष्टकम् कह दिया जाता है, जबकि वह वस्तुतः गणेशनामाष्टकम् है — एक भिन्न रचना। यहाँ दिया गया पाठ पहला वाला है।
यहाँ स्पष्ट रहना आवश्यक है: देखे गए किसी स्रोत ने छंद का नाम नहीं दिया। किंतु श्लोक 1–8 में प्रति चरण 12 अक्षर हैं और उनमें ल-गु-गु का क्रम चार बार आवर्तित होता है — यह भुजंगप्रयात का लक्षण है। यह निष्कर्ष यहाँ स्वयं अक्षर गिनकर निकाला गया है, किसी स्रोत के कथन के आधार पर नहीं, और पाठक स्वयं गिनकर जाँच सकते हैं। फलश्रुति के श्लोक 9–13 सामान्य अनुष्टुप् में हैं।
और अष्टकम्
संबंधित अष्टकम्
पर्व
