समय
4–5 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
मध्यम (Intermediate)
शुभ दिन
गुरुवार व एकादशी
उद्देश्य:पाप-नाश (Freedom from Sin)शरणागति (Surrender)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
श्री विष्ण्वष्टकम् आठ श्लोकों की वैष्णव स्तुति है जो "विष्णुं विशालारुणपद्मनेत्रं" से आरंभ होती है और नौवें श्लोक में फलश्रुति देती है। हर श्लोक भगवान विष्णु के एक स्वरूप का वर्णन कर उन्हें प्रणाम करता है। पूरा पाठ 4–5 मिनट में पूर्ण होता है।
FAQ
श्री विष्ण्वष्टकम् — सामान्य प्रश्न
आठ श्लोक, और उनके बाद एक फलश्रुति श्लोक — "विष्ण्वष्टकमिदं पुण्यं…"। "अष्टक" का अर्थ ही आठ है; फलश्रुति उससे अलग, पाठ-फल बताने वाला श्लोक है। छंद उपजाति है और पूरा पाठ 4–5 मिनट में पूर्ण होता है।
नहीं — और यह जान लेना ज़रूरी है। इस नाम से कम-से-कम तीन भिन्न रचनाएँ प्रचलित हैं: (1) यह वाली, "विष्णुं विशालारुणपद्मनेत्रं…" से आरंभ — सर्वाधिक प्रचलित; (2) "पुरः सृष्टाविष्टः पुरुष इति…" — बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (निर्णयसागर संस्करण, स्तोत्र 211) में संकलित; (3) "जगन्नाथं विश्ववन्द्यं शङ्खपद्मगदाधरम्…" — "गायत्रीस्वरूप ब्रह्मचारी विरचित"। तीनों के श्लोक आपस में मिलते ही नहीं। यहाँ पहली दी गई है क्योंकि लोक-प्रचलन उसी का है।
स्रोत एकमत नहीं हैं, इसलिए यहाँ कोई नाम नहीं दिया गया। एक स्रोत इसे "श्री नारायणगुरु विरचितं" कहकर समाप्त करता है, जबकि दूसरा स्रोत कोई रचयिता नहीं बताता — और इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि कहीं नहीं मिली। एक स्रोत के दावे को तथ्य बनाकर छापना ठीक नहीं होता, इसलिए `author` खाली रखा गया है। पाठ स्वयं दोनों स्रोतों में समान है, उस पर कोई संदेह नहीं।
नहीं, वह अलग रचना है। अच्युताष्टकम् आदि शंकराचार्य की रचना है और "अच्युतं केशवं रामनारायणम्…" से आरंभ होती है; वह इस संग्रह में पहले से उपलब्ध है। विष्ण्वष्टकम् एक स्वतंत्र स्तुति है जो "विष्णुं विशालारुणपद्मनेत्रं" से आरंभ होती है।
यही इसकी सबसे विशिष्ट बात है। अधिकांश अष्टक एक टेक दोहराते हैं — लिंगाष्टकम् में "तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्", दुर्गाष्टकम् में "दुर्गादेवि नमोऽस्तु ते"। यहाँ हर श्लोक अलग क्रिया पर समाप्त होता है: प्रपद्ये (शरण जाता हूँ), नमामि (नमन करता हूँ), आनतोऽस्मि (नत हूँ), भजे (भजता हूँ), ईडितोऽस्मि (स्तुति करता हूँ)। यानी हर श्लोक में समर्पण का एक अलग ढंग बताया गया है।
क्योंकि उसके चारों चरण "नमोऽस्तु ते" से आरंभ होते हैं। पहले सात श्लोक भगवान का वर्णन करते हैं — रूप, आयुध, लीला, स्वरूप; आठवाँ कुछ वर्णन नहीं करता, केवल नमस्कार करता है। और वह "नमो नमस्त्वच्चरणं प्रपद्ये" पर समाप्त होता है — ठीक उसी क्रिया पर जिससे पहला श्लोक समाप्त हुआ था। स्तुति एक वृत्त पूरा करती है।
भ्रमर के समान, अर्थात भौंरे जैसा श्यामवर्ण। भगवान विष्णु के लिए "मेघश्याम" उपमा सामान्य है, पर भ्रमर की उपमा विरल है — और वह केवल रंग नहीं, उस रंग की चमक भी बताती है। यह उन थोड़े शब्दों में है जो इस स्तुति को अन्य वैष्णव स्तोत्रों से अलग करते हैं।
पैमाने का। विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व की रचना है, उसमें एक हज़ार से अधिक नाम हैं और पाठ 30–40 मिनट का होता है। विष्ण्वष्टकम् केवल आठ श्लोक, 4–5 मिनट की स्तुति है — नामों की सूची नहीं, वर्णन व शरणागति की स्तुति। इसी कारण नित्य-नियम अथवा समय की कमी में यह पढ़ा जाता है।
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पर्व
