समय
2–3 मिनट
श्लोक
5
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
गुरुवार; रामनवमी, गुरुपूर्णिमा व विजयादशमी
उद्देश्य:गुरु-कृपा (Guru’s Grace)कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण (5/5 श्लोक)
श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्रम् पाँच श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है, जिसका हर श्लोक "सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि" पर समाप्त होता है। इसकी विशेषता यह है कि यह महल्सापति, पत्री ग्राम, शिरडी तथा गुरु वेङ्कटेश महर्षि — सबका नाम लेकर आता है। पाठ 2–3 मिनट का है।
FAQ
श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्रम् — सामान्य प्रश्न
यह शिरडी के साईं बाबा की स्तुति में रचे गए पाँच श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है — "पञ्चरत्न" अर्थात पाँच रत्न। इसका ध्रुवपद है "सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि"। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ नमस्कार चरणों में किया गया है — पूरा स्तोत्र गुरु-भाव का है, देव-भाव का नहीं। पाठ 2–3 मिनट का है।
"वह देवता जो कल्पना में नहीं, सामने प्रत्यक्ष रहा।" यह शब्द असामान्य है — किसी पौराणिक देवता के स्तोत्र में यह नहीं आ सकता था। यह इसलिए आता है क्योंकि यह एक ऐसे व्यक्ति का स्तोत्र है जिसे लोगों ने अपनी आँखों से देखा था। पूरे स्तोत्र की दृष्टि इसी पहले शब्द में खुल जाती है।
चौथे श्लोक में *"त्यागि महल्सापति सेविताग्रं"* आता है, अर्थात जिनकी सबसे पहले सेवा त्यागी महल्सापति ने की। महल्सापति कोई पौराणिक पात्र नहीं हैं — वे शिरडी के खण्डोबा मंदिर के पुजारी थे, और परंपरा के अनुसार उन्होंने ही सबसे पहले बाबा को "साईं" कहकर पुकारा था। वे बाबा के आजीवन निकटतम भक्तों में रहे। किसी स्तोत्र में इस तरह एक ऐतिहासिक भक्त का नाम आना विरल है।
हाँ — पाँचवें श्लोक में "श्रीवेङ्कटेश महर्षि शिष्यम्", अर्थात वे श्री वेङ्कटेश महर्षि के शिष्य हैं। वही श्लोक दो स्थान भी दर्ज करता है — पत्री ग्राम (जन्म-स्थान की परंपरा) तथा शिरडी ग्राम (निवास)। अर्थात यह श्लोक जन्म-स्थान, निवास-स्थान और गुरु — तीनों का नाम लेकर स्तोत्र समाप्त करता है। यह पौराणिक स्तोत्रों में नहीं मिलता; यह इसलिए है क्योंकि स्तुति एक इतिहास-पुरुष की है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य — ये छह "षड्वर्ग" कहे जाते हैं, और श्लोक कहता है कि उन्होंने इन छहों को जीत लिया (*"कामादि षड्वर्गजितं"*)। साधक की दृष्टि से यह श्लोक का सबसे व्यावहारिक अंश है: जिन्होंने इन्हें स्वयं जीत लिया, वे ही इनसे मुक्ति दिला सकते हैं। इसी श्लोक में उन्हें करुणा की मूर्ति तथा करुणा से भरे विशाल नेत्रों वाला कहा गया है।
नहीं — और यह स्पष्ट कह देना चाहिए। शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं; महासमाधि 1918 में हुई। अतः यह स्तोत्र किसी पुराण से नहीं आ सकता — यह 20वीं सदी की संस्कृत रचना है। इससे इसकी प्रामाणिकता कम नहीं होती: यह छपा हुआ, प्रचलित और नियमित रूप से पढ़ा जाने वाला पाठ है। रचयिता का नाम किसी उपलब्ध स्रोत ने नहीं दिया, अतः यहाँ कोई नाम गढ़ा नहीं गया।
हाँ, कई हैं। इसी परंपरा में श्री सायिनाथ करावलम्ब स्तोत्रम् (लंबा स्तोत्र, ध्रुवपद "श्रीसायिनाथ मम देहि करावलम्बम्") तथा श्री सायिनाथ दशनाम स्तोत्रम् (तीन श्लोकों में दस नाम, त्रिसन्ध्य जप के लिए) भी मिलते हैं; इनके अतिरिक्त श्री सायिनाथ अष्टकम् तथा साईं सहस्रनामावली (1000 नाम) भी हैं। यहाँ `स्तोत्रम्` के रूप में पञ्चरत्न लिया गया है, क्योंकि वह सबसे संक्षिप्त, सबसे प्रचलित और नित्य-पाठ के लिए सबसे उपयुक्त है।
हाँ, तीसरे श्लोक में — और यह छिपाया नहीं गया। वहाँ का पद *"करारिमभ्यर्थित दासवर्गम्"* उपलब्ध स्रोत में स्पष्ट नहीं है; "करारिम्" का निश्चित पदच्छेद कहीं नहीं मिला। यहाँ अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है ("जिनका दास-वर्ग उनसे प्रार्थना करता है") और उसी श्लोक पर यह बात दर्ज है — कोई निश्चित अर्थ गढ़कर नहीं दिया गया। शेष चारों श्लोक स्पष्ट हैं।
गुरुवार शिरडी परंपरा का मुख्य वार है। प्रातः स्नान के पश्चात साईं बाबा के चित्र के समक्ष घी का दीप जलाकर बैठें; परंपरा में पीले वस्त्र व पीले पुष्प का विधान है। पहले "ॐ श्री सायिनाथाय नमः" तीन बार कहें, फिर पाँचों श्लोक पढ़ें और अंत का ध्रुवपद ठहरकर बोलें। चूँकि यह गुरु-भाव का स्तोत्र है, पाठ के समय भाव शिष्य का रखें। पाठ केवल 2–3 मिनट का है, अतः इसे श्री सायिनाथ अष्टकम्, साईं चालीसा अथवा साईं अष्टोत्तर शतनामावली के साथ पढ़ा जाता है। नौ गुरुवार के साईं व्रत में इसे प्रतिदिन पढ़ने की परंपरा है।
पर्व
