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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्रम्

स्तोत्रम् · श्री साईं बाबा

पाठ

1

प्रत्यक्षदैवं प्रतिबन्धनाशनं सत्यस्वरूपं सकलार्तिनाशनम्। सौख्यप्रदं शान्तमनोज्ञरूपं सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि॥१॥

2

भक्तावनं भक्तिमतां सुभाजनं मुक्तिप्रदं भक्तमनोहरम्। विभुं ज्ञानसुशीलरूपिणं सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि॥२॥

3

कारुण्यमूर्तिं करुणायताक्षं करारिमभ्यर्थित दासवर्गम्। कामादि षड्वर्गजितं वरेण्यं सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि॥३॥

4

वेदान्तवेद्यं विमलान्तरङ्गं ध्यानाधिरूढं वरसेव्यसद्गुरुम्। त्यागि महल्सापति सेविताग्रं सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि॥४॥

5

पत्रिग्रामे जातं वर षिरिडि ग्रामनिवासं श्रीवेङ्कटेश महर्षि शिष्यम्। शङ्करं शुभकरं भक्तिमतां सायिनाथं सद्गुरुं चरणं नमामि॥५॥ ॥ इति श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्रम् ॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. जो प्रत्यक्ष देव हैं, प्रतिबंधों का नाश करने वाले हैं, सत्य के स्वरूप हैं और समस्त पीड़ाओं का नाश करने वाले हैं; जो सौख्य देने वाले तथा शांत व मनोहर रूप वाले हैं — उन सद्गुरु सायिनाथ के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ। पहला ही शब्द प्रत्यक्षदैव ध्यान देने योग्य है — अर्थात *जो देवता कल्पना में नहीं, सामने प्रत्यक्ष रहे*।
  2. जो भक्तों की रक्षा करने वाले तथा भक्तिमानों के सुपात्र हैं; जो मुक्ति देने वाले व भक्तों का मन हरने वाले हैं; जो विभु हैं तथा ज्ञान व सुशील के रूप वाले हैं — उन सद्गुरु सायिनाथ के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ।
  3. जो करुणा की मूर्ति हैं तथा करुणा से भरे विशाल नेत्रों वाले हैं; जिनका दास-वर्ग उनसे प्रार्थना करता है; जिन्होंने काम आदि छहों वर्गों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) को जीत लिया है और जो वरेण्य हैं — उन सद्गुरु सायिनाथ के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ। ("करारिम्" पद का पाठ उपलब्ध स्रोत में स्पष्ट नहीं; अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है।)
  4. जो वेदांत द्वारा जानने योग्य हैं, निर्मल अंतःकरण वाले हैं, ध्यान पर आरूढ़ हैं और श्रेष्ठ सेवनीय सद्गुरु हैं; तथा जिनकी सबसे पहले सेवा त्यागी महल्सापति ने की — उन सद्गुरु सायिनाथ के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ। महल्सापति ऐतिहासिक व्यक्ति हैं — शिरडी के खण्डोबा मंदिर के पुजारी, जिन्होंने सबसे पहले बाबा को "साईं" कहकर पुकारा था।
  5. जो पत्री ग्राम में उत्पन्न हुए और श्रेष्ठ शिरडी ग्राम में निवास करते हैं; जो श्री वेङ्कटेश महर्षि के शिष्य हैं; जो शंकर-स्वरूप तथा भक्तिमानों का शुभ करने वाले हैं — उन सद्गुरु सायिनाथ के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ। — इस प्रकार श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। यह श्लोक जन्म-स्थान, निवास-स्थान तथा गुरु — तीनों का नाम लेकर स्तोत्र समाप्त करता है।

लाभ

  • श्लोक 1 उन्हें प्रतिबन्धनाशन तथा सकलार्तिनाशन कहता है — रुकावटों व समस्त पीड़ाओं का नाश करने वाले।
  • श्लोक 2 के अनुसार वे मुक्तिप्रद हैं तथा भक्तों की रक्षा करने वाले।
  • श्लोक 3 का भाव साधक के लिए है — जिन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मात्सर्य — छहों को जीत लिया, वे ही उससे मुक्ति दिला सकते हैं।
  • केवल 2–3 मिनट का पाठ, अतः प्रतिदिन अथवा प्रत्येक गुरुवार पढ़ने के लिए सबसे सुविधाजनक साईं स्तोत्र।
  • नौ गुरुवार के साईं व्रत में अष्टकम् व चालीसा के साथ इसे पढ़ने की परंपरा है।

कब करें पाठ

गुरुवार को — शिरडी परंपरा का मुख्य वार · नौ गुरुवार के साईं व्रत में प्रतिदिन · रामनवमी, गुरुपूर्णिमा तथा विजयादशमी — शिरडी के तीन प्रमुख उत्सव · प्रातः अथवा संध्या के नित्य पाठ में — पाठ छोटा है, अतः नियम बनाना सरल है

स्रोत

रचयिता: अज्ञात (रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया). stotranidhi.com — श्री सायिनाथ पञ्चरत्न स्तोत्रम् ("श्री शिर्डी साईबाबा स्तोत्राणि" वर्ग के अंतर्गत); पूर्ण पाठ, 5 श्लोक। · ⚠️ यह पृष्ठ इस संग्रह के दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता, और यह छिपाया नहीं गया। पाठ केवल एक स्रोत पर मिला; sanskritdocuments तथा hindunidhi पर यह स्तोत्र नहीं है। · ⚠️ रचना-काल आधुनिक है — शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं (महासमाधि 1918), अतः यह किसी पुराण से नहीं आता। रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया, अतः कुछ गढ़ा नहीं गया। · ✅ स्तोत्र में सत्यापन-योग्य जीवन-विवरण दर्ज है: श्लोक 4 में महल्सापति (शिरडी के खण्डोबा मंदिर के पुजारी) तथा श्लोक 5 में पत्री ग्राम, शिरडी व गुरु श्री वेङ्कटेश महर्षि। · ⚠️ श्लोक 3 का पद "करारिम्" स्रोत में स्पष्ट नहीं; अर्थ यथासंभव निकट रखा गया है, गढ़ा हुआ निश्चित अर्थ नहीं दिया गया। · ⚠️ शिरडी साईं और सत्य साईं भिन्न व्यक्ति हैं; यहाँ केवल शिरडी साईं की सामग्री है — श्लोक 5 का "पत्रिग्रामे जातं वर षिरिडि ग्रामनिवासं" इसकी आंतरिक पुष्टि है। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित (5/5)।

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