समय
1–2 मिनट (एक आवृत्ति)
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
गुरुवार; नौ गुरुवार का साईं व्रत
उद्देश्य:कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)भय-नाश (Freedom from Fear)गुरु-कृपा (Guru’s Grace)
✓ संपूर्ण (3/3 श्लोक) नाम जाप
श्री सायिनाथ दशनाम मंत्र में साईं बाबा के दस नाम तीन श्लोकों में दिए गए हैं — सायिनाथ, द्वारकामायी, तीर्थराज, भक्तवत्सल, परमात्मा, शिरडीवासी, सद्गुरुनाथ, अनाथनाथ, निराडम्बर तथा दत्तावतार। पाठ स्वयं कहता है कि इनका त्रिकाल जप करने वाला समस्त कष्ट व भय से मुक्त हो जाता है।
FAQ
श्री सायिनाथ दशनाम मंत्र — सामान्य प्रश्न
पाठ इन्हें गिनकर देता है — 1. सायिनाथ, 2. द्वारकामायी, 3. तीर्थराज, 4. भक्तवत्सल, 5. परमात्मा, 6. शिरडीवासी, 7. सद्गुरुनाथ, 8. अनाथनाथ, 9. निराडम्बर, 10. दत्तावतार। तीनों श्लोकों में यही क्रम "प्रथमं… द्वितीयं… तृतीयं…" कहकर दिया गया है, इसलिए इन्हें याद रखना सरल हो जाता है।
पाठ स्वयं समय बता देता है — "त्रिसन्ध्यं", अर्थात प्रातः, मध्याह्न तथा संध्या — तीनों समय। श्लोक 3 कहता है: *"एतानि दश नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः, सर्वकष्टभयान्मुक्तो"* — जो मनुष्य इन दस नामों का त्रिकाल पाठ करता है, वह समस्त कष्टों व भयों से मुक्त हो जाता है। एक आवृत्ति में केवल 1–2 मिनट लगते हैं, इसलिए तीनों समय का नियम कठिन नहीं।
क्योंकि दस नामों की स्तुति-सूची में एक नाम स्वयं आडम्बर-हीनता का है — निराडम्बर अर्थात *आडम्बर से रहित*। यह विरल है; स्तुति-सूचियाँ प्रायः महिमा गिनाती हैं। शिरडी परंपरा में इसका आधार भी है: बाबा ने जीवन भर एक फटी कफनी पहनी, भिक्षा माँगकर खाया, और कोई मठ, संपत्ति या संगठन नहीं बनाया। यह नाम साधक के लिए स्वयं एक शिक्षा है।
द्वारकामायी वह मस्जिद है जिसमें साईं बाबा ने शिरडी में अपना अधिकांश जीवन बिताया, और यह नाम स्वयं बाबा ने दिया था। वहीं वह धूनी जलती रही जिसकी ऊदी (भस्म) आज भी प्रसाद रूप में दी जाती है। दस नामों में दो नाम भौगोलिक हैं — द्वारकामायी तथा शिरडीवासी; यह इस बात का संकेत है कि यह स्तुति किसी पौराणिक देवता की नहीं, एक ऐसे व्यक्ति की है जिसका स्थान ज्ञात है।
दसवाँ नाम दत्तावतार उन्हें दत्तात्रेय का अवतार कहता है। यह शिरडी परंपरा की स्थापित मान्यता है और साईं सच्चरित्र में भी दुहराई जाती है। इसी क्रम में श्री सायिनाथ अष्टकम् का तीसरा श्लोक भी उन्हें *"जगदुद्धारणार्थं यो नररूप धरो विभुः"* — जगत के उद्धार के लिए नर-रूप धारण करने वाला विभु — कहता है। अर्थात परंपरा उन्हें सिद्ध पुरुष नहीं, अवतार मानती है।
स्रोत इसे "श्री सायिनाथ दशनाम स्तोत्रम्" शीर्षक देता है, और वह शीर्षक यहाँ दर्ज भी है। किंतु रचना स्वयं को जप-विधान के रूप में प्रस्तुत करती है — *"एतानि दश नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः"*, अर्थात यह दस नामों का त्रिकाल-जप है। इसी कारण यह पृष्ठ इसे नाम-जप मंत्र के रूप में रखता है। दोनों बातें सच हैं; वर्गीकरण उपयोग के आधार पर किया गया है, और मूल शीर्षक छिपाया नहीं गया।
नहीं, और यह ईमानदारी से कह देना चाहिए — पाठ शिथिल है। "द्वारकमायिने", "अनाथनाथने", "दत्तावतारये" तथा "सर्वकष्टभयान्मुक्तो" जैसे रूप शास्त्रीय व्याकरण के अनुरूप नहीं हैं (जैसे शुद्ध रूप "दत्तावताराय" होता)। यह आधुनिक रचना का लक्षण है — शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं और यह पाठ भी उसी काल का है। यहाँ इसे "सुधारा" नहीं गया; स्रोत का पाठ जैसा है वैसा ही रखा गया है, क्योंकि पाठ ठीक करना इस संग्रह का काम नहीं। पढ़ते समय भी जैसा छपा है वैसा ही पढ़ें।
नहीं। शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं; महासमाधि 1918 में हुई। अतः यह पाठ किसी पुराण से नहीं आ सकता — यह 20वीं सदी की रचना है। रचयिता का नाम किसी उपलब्ध स्रोत ने नहीं दिया, इसलिए यहाँ कोई नाम गढ़ा नहीं गया। यह प्रामाणिकता का प्रश्न नहीं, सही परिचय का है — पाठ छपा हुआ, प्रचलित और नियमित रूप से जपा जाने वाला है।
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