श्री सायिनाथ दशनाम मंत्र
पाठ
प्रथमं सायिनाथाय द्वितीयं द्वारकमायिने। तृतीयं तीर्थराजाय चतुर्थं भक्तवत्सले॥१॥
पञ्चमं परमात्माय षष्टं च षिर्डिवासिने। सप्तमं सद्गुरुनाथाय अष्टमं अनाथनाथने॥२॥
नवमं निराडम्बराय दशमं दत्तावतारये। एतानि दश नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। सर्वकष्टभयान्मुक्तो सायिनाथ गुरु कृपाः॥३॥ ॥ इति श्री सायिनाथ दशनाम स्तोत्रम् ॥
अर्थ (हिन्दी)
- पहला नाम सायिनाथ, दूसरा द्वारकामायी (उस मस्जिद के नाम से, जिसे स्वयं बाबा ने यह नाम दिया था), तीसरा तीर्थराज (तीर्थों के राजा) तथा चौथा भक्तवत्सल (भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले)।
- पाँचवाँ नाम परमात्मा, छठा शिरडीवासी (शिरडी में निवास करने वाले), सातवाँ सद्गुरुनाथ तथा आठवाँ अनाथनाथ (अनाथों के नाथ)।
- नौवाँ नाम निराडम्बर (आडम्बर-रहित) तथा दसवाँ दत्तावतार (दत्तात्रेय के अवतार)। जो मनुष्य इन दस नामों का त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, संध्या) पाठ करता है, वह समस्त कष्टों व भयों से मुक्त हो जाता है — यह सायिनाथ गुरु की कृपा है। — इस प्रकार श्री सायिनाथ दशनाम स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। ध्यान दें कि नौवाँ नाम निराडम्बर है: दस नामों की सूची में एक नाम स्वयं आडम्बर-हीनता का है।
लाभ
- पाठ स्वयं फल कहता है — त्रिकाल जप करने वाला "सर्वकष्टभयान्मुक्त", अर्थात समस्त कष्टों व भयों से मुक्त हो जाता है।
- केवल तीन श्लोक होने से यह साईं-उपासना का सबसे छोटा नियम बन सकता है — दिन में तीन बार भी कठिन नहीं।
- नाम 8 अनाथनाथ तथा नाम 4 भक्तवत्सल — आश्रय व वात्सल्य के भाव से पढ़े जाते हैं।
- नाम 9 निराडम्बर साधक के लिए स्वयं एक शिक्षा है — बाबा ने जीवन भर कोई मठ या संपत्ति नहीं बनाई।
- नौ गुरुवार के साईं व्रत में इसे प्रतिदिन जपने की परंपरा है।
कब करें पाठ
प्रातः, मध्याह्न तथा संध्या — पाठ स्वयं "त्रिसन्ध्यं" कहता है · गुरुवार को विशेष रूप से · नौ गुरुवार के साईं व्रत में प्रतिदिन · यात्रा अथवा व्यस्तता में, जब लंबा पाठ संभव न हो
स्रोत
रचयिता: अज्ञात (रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया). stotranidhi.com — श्री सायिनाथ दशनाम स्तोत्रम् ("श्री शिर्डी साईबाबा स्तोत्राणि" वर्ग के अंतर्गत); पूर्ण पाठ, 3 श्लोक। · ⚠️ यह पृष्ठ इस संग्रह के दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता, और यह छिपाया नहीं गया। पाठ केवल एक स्रोत पर मिला। · ℹ️ स्रोत का मूल शीर्षक "दशनाम स्तोत्रम्" है; यहाँ इसे `मंत्र` प्रकार में रखा गया क्योंकि रचना स्वयं त्रिसन्ध्य जप का विधान देती है ("एतानि दश नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः")। · ⚠️ पाठ का संस्कृत व्याकरण शिथिल है — "द्वारकमायिने", "अनाथनाथने", "दत्तावतारये", "सर्वकष्टभयान्मुक्तो" जैसे रूप शास्त्रीय नियमों के अनुरूप नहीं। यह आधुनिक रचना का लक्षण है; पाठ बदला नहीं गया। · ⚠️ रचना-काल आधुनिक है — महासमाधि 1918; रचयिता का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया, अतः कुछ गढ़ा नहीं गया। · ⚠️ शिरडी साईं और सत्य साईं भिन्न व्यक्ति हैं; यहाँ केवल शिरडी की सामग्री है — नाम 2 "द्वारकामायी" व नाम 6 "शिरडीवासी" इसकी आंतरिक पुष्टि हैं। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित (3/3)।
