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लिपि:
॥ श्री ॥

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला — सरस्वती वंदना

मंत्र · माँ सरस्वती

पाठ

1

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. जो कुंद के पुष्प, चंद्रमा, हिम और मोती के हार के समान श्वेत हैं; जो श्वेत वस्त्रों से आवृत हैं; जिनका हाथ वीणा व वरदण्ड से सुशोभित है; जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं; और जो ब्रह्मा, विष्णु व शंकर आदि देवों द्वारा सदा वंदित हैं — वे भगवती सरस्वती, जो जड़ता का पूर्ण नाश करती हैं, मेरी रक्षा करें।

लाभ

  • विद्यालयों की प्रार्थना-सभा व विद्यारंभ संस्कार का सर्वाधिक प्रचलित श्लोक है।
  • परंपरा में इसे बुद्धि, स्मरण-शक्ति व वाणी-शुद्धि से जोड़ा जाता है।
  • "जाड्य" — मन की जड़ता — के नाश की प्रार्थना इसका केंद्रीय भाव है।
  • बसंत पंचमी की पूजा में पाठ विहित बताया जाता है।

कब करें पाठ

बसंत पंचमी पर · विद्यारंभ संस्कार व अध्ययन आरंभ पर · परीक्षा या साक्षात्कार से पूर्व · प्रातः प्रार्थना के समय

स्रोत

श्री सरस्वती स्तोत्रम् — प्रथम श्लोक · विद्यारंभ संस्कार व बसंत पंचमी प्रार्थना परंपरा

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