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लिपि:
॥ श्री ॥
शनि वैदिक मंत्र — शं नो देवीरभिष्टये
मंत्र · श्री शनि देव
पाठ
1
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्रवन्तु नः॥
अर्थ (हिन्दी)
- वे जल-देवियाँ हमारे लिए कल्याणकारी हों और हमारी अभीष्ट कामना पूर्ण करें; वे पीने योग्य हों। वे सुख और आरोग्य लेकर हमारी ओर बहें।
लाभ
- नवग्रह उपासना में शनि का प्रतिष्ठित वैदिक मंत्र माना जाता है।
- परंपरा में इसे शनि-दोष व साढ़े साती की शांति से जोड़ा जाता है।
- शनि हवन व ग्रह-शांति की पद्धति में पाठ विहित बताया जाता है।
- "शम्" (शांति) का भाव — उग्र नहीं, शीतल उपासना का मंत्र है।
कब करें पाठ
शनिवार को · शनि अमावस्या व शनि जयंती पर · साढ़े साती या ढैया के काल में · नवग्रह शांति व शनि हवन में
स्रोत
नवग्रह ग्रह-शांति की वैदिक मंत्र परंपरा — शनि का वैदिक मंत्र · नोट: जाँचे गए स्रोत पाठ देते हैं, पर वेद का अध्याय/ऋचा-क्रमांक नहीं — इसलिए क्रमांक यहाँ नहीं दिया गया · नोट: ऋचा का सीधा सम्बोधन "आपः" (जल) है; शनि से जुड़ाव ग्रह-शांति परंपरा का है
