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लिपि:
॥ श्री ॥

शनिवार व्रत कथा

व्रत कथा · श्री शनि देव

पाठ

व्रत नियम

कौन रखे: कोई भी व्यक्ति यह व्रत रख सकता है। परंपरा में यह विशेष रूप से उनके द्वारा रखा जाता है जिन पर साढ़े-साती अथवा ढैया चल रही हो, अथवा जिनकी कुंडली में शनि की महादशा या अंतर्दशा हो।

कब: प्रत्येक शनिवार को। परंपरा में व्रत का आरंभ शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार से किया जाता है और संकल्प के अनुसार 7, 11, 21 अथवा 51 शनिवार तक चलाया जाता है।

आहार नियम: सूर्यास्त के पश्चात ही भोजन — यह इस व्रत का सबसे विशिष्ट नियम है; दिनभर फलाहार अथवा निराहार; सात्त्विक आहार; मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित; भोजन से पूर्व शनि-शांति हेतु "ॐ शं शनैश्चराय नमः" तथा राहु-शांति हेतु "ॐ रां राहवे नमः" — तीन-तीन माला जप; उड़द से बने पदार्थ वृद्ध ब्राह्मण को देकर तब स्वयं भोजन करें

पूजन सामग्री

शनिदेव की लौह (लोहे की) प्रतिमा अथवा चित्र · सरसों का तेल तथा दीपक · काला तिल एवं लौंग · काला वस्त्र तथा काली उड़द · नील अथवा काले पुष्प · शमी के पत्ते तथा शमी काष्ठ (हवन हेतु) · धूप, अक्षत, कर्पूर · पीपल वृक्ष के लिए जल-पात्र

पूजन विधि

  1. शनिवार प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।
  2. जल में काला तिल तथा लौंग मिलाएँ।
  3. पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पीपल वृक्ष पर वह जल चढ़ाएँ।
  4. पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीप जलाएँ।
  5. तत्पश्चात शिवोपासना अथवा हनुमत्-आराधना करें — परंपरा में शनि-पीड़ा में दोनों का आश्रय कहा गया है।
  6. शनिदेव की लौह प्रतिमा का पूजन करें — नील अथवा काले पुष्प, काला तिल, तेल, धूप व दीप अर्पित करें।
  7. शमी के पत्ते अर्पित करें।
  8. शनिवार व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें — व्रत इसके बिना पूर्ण नहीं माना जाता।
  9. उड़द से बने पदार्थ वृद्ध ब्राह्मण को दें; साथ ही काला तिल, तेल तथा काले वस्त्र का दान करें।
  10. भोजन से पूर्व शनि-शांति हेतु "ॐ शं शनैश्चराय नमः" तथा राहु-शांति हेतु "ॐ रां राहवे नमः" — तीन-तीन माला जप करें।
  11. व्रत की पूर्णाहुति हेतु शमी काष्ठ से हवन करें। (राहु-व्रत की पूर्णाहुति में दूर्वा का प्रयोग कहा गया है।)
  12. आरती कर प्रसाद वितरित करें, और सूर्यास्त के पश्चात भोजन ग्रहण कर पारण करें।

व्रत कथा

स्वर्ग में विवाद — सबसे बड़ा ग्रह कौन?

एक बार स्वर्गलोक में यह विवाद उठा कि नौ ग्रहों में सबसे बड़ा कौन है।

सभी ग्रहों में वाद-विवाद इतना बढ़ गया कि युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। अंततः निर्णय के लिए सब देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे।

इंद्र ने कहा — "मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। हम सब पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी के राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं।"

नौ धातुओं के सिंहासन

सभी ग्रह राजा विक्रमादित्य के पास पहुँचे और अपना प्रश्न रखा। राजा कुछ समय विचार करते रहे, क्योंकि प्रत्येक ग्रह अपनी-अपनी शक्ति के कारण महान था।

अचानक उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने विभिन्न धातुओं से बने नौ सिंहासन तैयार कराए और धातुओं की श्रेष्ठता के क्रम में रखवाकर प्रत्येक ग्रह को एक-एक पर बैठने को कहा।

जब सब बैठ गए, तब राजा बोले — "जो सबसे आगे बैठा है, वही सबसे बड़ा है।"

शनिदेव को सबसे पीछे स्थान मिला था।

शनिदेव का क्रोध

इस निर्णय से शनिदेव क्रोधित हो गए और बोले — "राजा विक्रमादित्य! तुमने मेरा अपमान किया है। मैं तुम्हें इसका दंड अवश्य दूँगा।"

"मैं जब किसी पर अपनी साढ़े साती की दृष्टि डालता हूँ, तो महान से महान शक्तिशाली भी मेरा प्रकोप सहन नहीं कर सकता।"

उन्होंने आगे कहा — "राम को वनवास भोगना पड़ा और रावण का अंत हुआ, यह सब मेरी साढ़े साती के कारण ही हुआ। अब तुम्हें भी मेरे प्रकोप का सामना करना होगा।" (यह कथा का अपना कथन है।)

घोड़े का व्यापारी और जंगल

कुछ दिनों बाद शनिदेव ने एक घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और सुंदर घोड़ों के साथ उज्जयिनी पहुँचे।

राजा ने स्वयं एक सुंदर घोड़ा खरीदने का निश्चय किया। किंतु जैसे ही वे उस पर सवार हुए, वह बिजली की गति से दौड़ पड़ा, राजा को घने जंगल में ले गया और अचानक गायब हो गया।

भूख-प्यास से परेशान राजा को एक चरवाहा मिला, जिसने उन्हें पानी पिलाया; बदले में राजा ने अपनी अंगूठी उसे दे दी।

खूँटी जो हार निगल गई

आगे चलकर राजा एक नगर में पहुँचे और एक सेठ की दुकान पर विश्राम करने लगे। वहाँ बैठते ही दुकान में अचानक ख़ूब बिक्री होने लगी।

सेठ ने उन्हें भाग्यशाली मानकर भोजन के लिए घर बुलाया। राजा जिस कक्ष में बैठे थे, वहाँ एक सोने का हार खूँटी पर टँगा था — और राजा के सामने ही खूँटी वह हार निगल गई।

लौटने पर सेठ ने हार गायब देखकर राजा पर चोरी का आरोप लगा दिया। नगर के राजा ने उन्हें चोर मानकर हाथ-पैर कटवाने का आदेश दे दिया।

सम्राट से कोल्हू तक

अब राजा विक्रमादित्य असहाय अवस्था में नगर की गलियों में पड़े रहे।

कुछ दिनों बाद एक तेली उन्हें अपने घर ले गया और कोल्हू पर बैलों को हाँकने का काम सौंप दिया।

जिस सम्राट के पास कभी देवता निर्णय माँगने आए थे, वह इस प्रकार शनिदेव के प्रकोप का कष्ट भोगता रहा।

मेघ मल्हार और मोहिनी

साढ़े साती पूरी होने के बाद एक दिन राजा मेघ मल्हार राग गा रहे थे।

उसी समय नगर की राजकुमारी मोहिनी वहाँ से गुज़री और उस मधुर स्वर को सुनकर मोहित हो गई। उसने उस विकलांग व्यक्ति से विवाह करने का निश्चय कर लिया।

स्वप्न में शनिदेव और कृपा

विवाह के बाद एक दिन राजा-रानी को स्वप्न में शनिदेव के दर्शन हुए।

शनिदेव ने कहा — "राजा! तुमने मेरे प्रकोप का प्रभाव देख लिया। अब मैं तुम पर कृपा करता हूँ। जो भी श्रद्धा से मेरी पूजा करेगा और शनिवार व्रत कथा सुनेगा, उस पर मेरी कृपा बनी रहेगी।"

सुबह जब राजा की नींद खुली, तो वे अपने कटे हुए हाथ-पैर सही-सलामत देखकर चकित रह गए।

उज्जयिनी की वापसी

राजा ने शनिदेव को प्रणाम किया और इस चमत्कार का बखान किया। सेठ ने जब यह सुना, तो क्षमा माँगी और अपनी पुत्री का विवाह भी उनसे कर दिया।

राजा विक्रमादित्य अपनी पत्नियों सहित उज्जयिनी लौटे, जहाँ नगरवासियों ने हर्षोल्लास से उनका स्वागत किया।

उन्होंने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि शनिदेव ही समस्त ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ हैं, और प्रत्येक व्यक्ति को शनिवार का व्रत व पूजन कर उनकी कथा अवश्य सुननी चाहिए।

कथा कहती है कि शनिदेव की कृपा से जो भी श्रद्धा व भक्ति से यह व्रत करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

लाभ

  • परंपरा में यह व्रत साढ़े-साती तथा ढैया के प्रभाव को कम करने के लिए सबसे अधिक किया जाता है।
  • कथा में शनिदेव स्वयं वचन देते हैं कि जो श्रद्धा से पूजा कर यह कथा सुनेगा, उस पर उनकी कृपा बनी रहेगी।
  • कथा का भाव यह है कि शनि दंड देते हैं, पर दंड की एक अवधि होती है — साढ़े-साती पूरी होते ही मोड़ आ जाता है।
  • व्रत मानसिक शांति, आर्थिक स्थिरता तथा बाधा-निवारण के संकल्प से रखा जाता है।
  • शनि की महादशा अथवा अंतर्दशा में इसे नियमपूर्वक रखने की परंपरा है।

कब करें पाठ

प्रत्येक शनिवार को पूजन के समय · साढ़े-साती तथा ढैया के काल में · शनि की महादशा अथवा अंतर्दशा में · शनि जयंती तथा शनि अमावस्या पर

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. hindunidhi.com — शनिवार व्रत कथा एवं व्रत विधि (कथा तथा पूजा-विधि का एकमात्र सत्यापित स्रोत)। · ⚠️ यह पृष्ठ इस संग्रह के दो-स्रोत मानक पर खरा नहीं उतरता, और यह छिपाया नहीं गया। कथा का पाठ केवल एक स्रोत से मिला; अन्य प्रमुख स्थलों पर या तो पृष्ठ नहीं है अथवा सामग्री JavaScript से आती है और सत्यापित नहीं की जा सकी। · ⚠️ किसी पुराण-अध्याय का संदर्भ कहीं नहीं मिला, अतः इसे "लोक-प्रचलित विक्रमादित्य कथा परंपरा" कहकर छोड़ा गया — कोई ग्रंथ-नाम गढ़ा नहीं गया। · ✅ व्रत-विधि की स्वतंत्र पुष्टि हो गई: इसके चार मुख्य अंग शनैश्चर सहस्रनाम (काश्यप ऋषि; स्वतंत्र रचना) में नामों के रूप में मिलते हैं — पीपल-मूल जप (नाम 9 अश्वत्थमूलजपप्रिय), लौह प्रतिमा (नाम 777 लोहजप्रतिमादानप्रिय), उड़द-दान (नाम 727 माषदानप्रिय), तथा शमी (नाम 867–876)। तिल-तेल का विधान सहस्रनाम के तिल-खंड (295–306, 321) तथा शनैश्चराष्टकम् के श्लोक 5 दोनों में है। · ⚠️ कथा के भीतर शनिदेव का यह कथन कि राम का वनवास व रावण का अंत उनकी साढ़े-साती से हुआ, कथा का अपना कथन है और वैसा ही दर्ज किया गया — स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं।

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