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FAQ
शनिवार व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
स्वर्ग में विवाद उठा कि नौ ग्रहों में सबसे बड़ा कौन है। इंद्र भी उत्तर न दे सके, तो सब उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के पास आए। राजा ने नौ धातुओं के सिंहासन धातु की श्रेष्ठता के क्रम में रखवाए और कहा — "जो सबसे आगे बैठा है, वही सबसे बड़ा है।" शनिदेव को लोहे का सिंहासन, सबसे पीछे मिला। रुष्ट होकर उन्होंने राजा को साढ़े-साती का दंड दिया — घोड़ा, जंगल, चोरी का झूठा आरोप, हाथ-पैर कटना, और कोल्हू पर मज़दूरी। साढ़े-साती पूरी होते ही शनिदेव प्रसन्न हुए और सब लौटा दिया।
इसमें शनिदेव खलनायक नहीं, न्यायाधीश हैं — और दंड की एक अवधि है। कथा किसी असुर-वध की नहीं, एक राजा के सब कुछ खो देने की है। जिस क्षण साढ़े-साती पूरी होती है, उसी क्षण मोड़ आ जाता है — राजकुमारी मोहिनी उनका स्वर सुनती है, स्वप्न में शनिदेव दर्शन देते हैं, और कटे हुए हाथ-पैर लौट आते हैं। यही इस व्रत का मूल आश्वासन है: कष्ट काल-बद्ध है, अनंत नहीं।
सबसे विशिष्ट नियम यह है कि भोजन सूर्यास्त के पश्चात ही किया जाता है। दिनभर फलाहार अथवा निराहार रहा जाता है; मांस-मदिरा व समस्त तामसिक भोजन वर्जित है। परंपरा में उड़द से बने पदार्थ पहले वृद्ध ब्राह्मण को दिए जाते हैं, और भोजन से पूर्व शनि-शांति हेतु "ॐ शं शनैश्चराय नमः" तथा राहु-शांति हेतु "ॐ रां राहवे नमः" — तीन-तीन माला जप का विधान है।
विधि के अनुसार जल में काला तिल और लौंग मिलाकर, पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पीपल वृक्ष पर चढ़ाया जाता है, और उसके नीचे सरसों के तेल का दीप जलाया जाता है। यह लोक-परंपरा भर नहीं है — इसी संग्रह के शनैश्चर सहस्रनाम में शनि का नाम 9 ही "अश्वत्थमूलजपप्रिय" है, अर्थात *पीपल की जड़ के पास किए गए जप से प्रसन्न होने वाले*। एक पूर्णतः स्वतंत्र पाठ इसी विधान की पुष्टि करता है।
हाँ — और यह असामान्य रूप से पक्की पुष्टि है। विधि के चार मुख्य अंग इसी संग्रह के शनैश्चर सहस्रनाम (काश्यप ऋषि; पूर्णतः स्वतंत्र रचना) में नामों के रूप में मिलते हैं: पीपल की जड़ पर जल → नाम 9 अश्वत्थमूलजपप्रिय; लौह प्रतिमा का पूजन → नाम 777 लोहजप्रतिमादानप्रिय; उड़द का दान → नाम 727 माषदानप्रिय; शमी काष्ठ से हवन → नाम 867–876 का पूरा शमी खंड। तिल-तेल का विधान भी सहस्रनाम के तिल-खंड (295–306) तथा शनैश्चराष्टकम् के श्लोक 5 दोनों में है। अर्थात विधि तीन स्वतंत्र पाठों से प्रमाणित है।
यह ईमानदारी से कहना चाहिए — किसी पुराण-अध्याय का संदर्भ कहीं नहीं मिला। यह कथा लोक में अत्यंत प्रचलित है और लगभग हर व्रत-संग्रह में छपती है, पर उसका शास्त्रीय स्रोत किसी उपलब्ध स्थान पर दर्ज नहीं है। इसलिए यहाँ इसे "लोक-प्रचलित विक्रमादित्य कथा परंपरा" कहा गया है और कोई ग्रंथ-नाम गढ़ा नहीं गया। ध्यान दें कि व्रत की विधि का प्रमाण अलग है और वह मिल गया (ऊपर देखें) — कथा और विधि की स्थिति एक-सी नहीं है।
क्रोधित होकर शनिदेव कहते हैं — *"राम को वनवास भोगना पड़ा और रावण का अंत हुआ, यह सब मेरी साढ़े साती के कारण ही हुआ।"* यह कथा का अपना कथन है, और यहाँ वैसा ही दर्ज किया गया है — इसे स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं कहा गया। कथा में इसका प्रयोजन यह दिखाना है कि साढ़े-साती से कोई अछूता नहीं, इसीलिए अगला वाक्य होता है: "अब तुम्हें भी मेरे प्रकोप का सामना करना होगा।"
परंपरा में व्रत का आरंभ शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार से किया जाता है, और संकल्प के अनुसार 7, 11, 21 अथवा 51 शनिवार तक चलाया जाता है। पूर्णाहुति शमी काष्ठ से हवन करके की जाती है। जिन पर साढ़े-साती अथवा ढैया चल रही हो, वे प्रायः पूरे काल तक इसे नियमपूर्वक रखते हैं।
विधि में स्पष्ट कहा गया है कि पीपल पर जल चढ़ाने के बाद शिवोपासना अथवा हनुमत्-आराधना करके तब शनि की लौह प्रतिमा का पूजन करें। परंपरा में शनि-पीड़ा में इन दोनों का आश्रय कहा गया है। यह भाव इसी संग्रह के शनि अष्टोत्तर शतनामावली में भी दिखता है, जहाँ शनि के लिए ही शिव के नाम आते हैं — महेश (21), शर्व (23), विरूपाक्ष (58) तथा पशूनां पति (84); और शनैश्चर सहस्रनाम में नाम 997 हनूमदर्चितपद है, अर्थात *हनुमान द्वारा अर्चित चरणों वाले*।
काला तिल, सरसों का तेल, काला वस्त्र तथा काली उड़द — ये शनिदेव को प्रिय मानी जाती हैं। साथ ही लोहे का दान भी। यह सूची कल्पित नहीं है: शनैश्चराष्टकम् का पाँचवाँ श्लोक स्वयं कहता है *"तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा"* — तिल, जौ, उड़द, गुड़, अन्न, लोहा तथा नील वस्त्र के दान से, और अपने वार को मंत्र-जप से वे प्रसन्न होते हैं। परंपरा में उड़द से बने पदार्थ वृद्ध ब्राह्मण को देने का विशेष विधान है।
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