श्री शनैश्चर स्तोत्रम्

śrī śanaiścara stotram

Shri Shanaishchara Stotram (Dasharatha Kritam)

समय
4–5 मिनट
श्लोक
13
कठिनाई
मध्यम (Intermediate)
शुभ दिन
शनिवार; साढ़े-साती व ढैया काल; शनि जयंती
उद्देश्य:शनि-शांति (Shani Relief)कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)रक्षा (Protection)
✓ संपूर्ण (13/13 श्लोक)

श्री शनैश्चर स्तोत्रम् राजा दशरथ द्वारा कहे गए 13 अनुष्टुप् श्लोकों का स्तोत्र है। कथा के अनुसार दशरथ शनि को रोहिणी-शकट भेदने से रोकने रथ लेकर नक्षत्र-मण्डल तक गए थे, जिससे बारह वर्ष का दुर्भिक्ष टल गया। स्तोत्र शनि के रूप का वर्णन बिना कोमल किए करता है।

परिचय

शनि देव कर्म और न्याय के अधिष्ठाता हैं — सूर्यपुत्र, जो कर्मों के अनुसार फल देते हैं।

स्रोत: रोहिणी-शकट-भेद प्रसंग — राजा दशरथ द्वारा नक्षत्र-मण्डल में कहा गया स्तोत्र

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री शनैश्चर स्तोत्रम्
IASTśrī śanaiścara stotram
देवताश्री शनि देव
मूल स्रोतरोहिणी-शकट-भेद प्रसंग — राजा दशरथ द्वारा नक्षत्र-मण्डल में कहा गया स्तोत्र
शुभ दिनशनिवार; साढ़े-साती व ढैया काल; शनि जयंती
पाठ समय4–5 मिनट
कठिनाईमध्यम (Intermediate)
छंदअनुष्टुप्

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री शनैश्चर स्तोत्रम् उन थोड़े स्तोत्रों में है जिनके पीछे एक पूरी कथा है, और वह कथा स्वयं स्तोत्र के साथ ही मिलती है।

कथा इस प्रकार है। रघुवंश में अत्यंत विख्यात, सप्तद्वीपों के अधिपति चक्रवर्ती राजा दशरथ को दैवज्ञों ने बताया कि शनि कृत्तिका के अंत में आ चुके हैं और अब रोहिणी-शकट को भेदकर आगे जाएँगे। इस "शकट-भेद" का परिणाम भयंकर था — बारह वर्ष का दुर्भिक्ष, जो सुर और असुर दोनों के लिए भयंकर होता। देश, नगर और ग्राम — सब भयभीत हो उठे।

दशरथ ने वसिष्ठ आदि ऋषियों से पूछा कि इसका समाधान क्या है। ऋषियों ने कहा कि यह योग इन्द्र और ब्रह्मा तक के लिए असाध्य है। तब दशरथ ने स्वयं निर्णय लिया — दिव्य धनुष और दिव्य आयुध लेकर, हंस-वर्ण के घोड़ों वाले स्वर्ण-रथ पर चढ़कर वे नक्षत्र-मण्डल तक गए, सूर्य से सवा लाख योजन ऊपर; रोहिणी को अपनी पीठ के पीछे करके खड़े हुए, और कान तक धनुष खींचकर संहारास्त्र का संधान कर दिया।

संहारास्त्र देखकर शनि रुक गए। उन्होंने हँसकर कहा — *"पौरुषं तव राजेन्द्र सुरासुरभयङ्करम्"*, तुम्हारा पौरुष सुर-असुर दोनों के लिए भयंकर है; मैं तुम्हारे तप और पौरुष से संतुष्ट हूँ, वर माँगो। और यहाँ कथा का सबसे सुंदर मोड़ आता है। दशरथ ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा — उन्होंने कहा कि आज से मेरे राष्ट्र में किसी को पीड़ा न हो, और *"रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं त्वया शने"*, रोहिणी को भेदकर मत जाइए, ताकि बारह वर्ष का दुर्भिक्ष कभी न हो। शनि ने "एवमस्तु" कहकर शाश्वत वर दे दिया।

इसके बाद दशरथ ने रथ पर ही धनुष रखकर, हाथ जोड़कर, सरस्वती और विनायक का ध्यान करके यह स्तोत्र कहा — और स्तोत्र का पहला श्लोक ठीक यही कहता है। स्तोत्र सुनकर शनि ने दूसरा वर दिया: जो मनुष्य इस स्तोत्र को पढ़ेगा, चाहे शनि उसके मृत्यु-स्थान, जन्म अथवा व्यय भाव में क्यों न हों, उसकी पीड़ा वे छोड़ देंगे — और गोचर, जन्म-लग्न, दशा व अंतर्दशा में उसकी रक्षा करेंगे।

स्तोत्र स्वयं असामान्य है, और यही इसकी पहचान है: यह शनि के रूप को कोमल नहीं करता। निर्मांस देह, लंबी दाढ़ी और जटा, विशाल नेत्र, सूखा उदर, कठोर शरीर, स्थूल रोम, नित्य क्षुधा से पीड़ित, कोटर-सदृश नेत्र, दुर्निरीक्ष्य, घोर, रौद्र, भीषण, कराल, सर्वभक्षी, वलीमुख — तेरह श्लोकों में एक भी शब्द सजावट का नहीं है। और इसी के भीतर श्लोक 9 वह पंक्ति रखता है जो इस स्तोत्र की आत्मा है: *"तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्"* — प्रसन्न होकर आप राज्य दे देते हैं, रुष्ट होकर उसी क्षण हर लेते हैं।

अंतिम श्लोक कथा का सार दोहरा देता है। दशरथ क्षमा माँगते हैं, पर अपने लिए नहीं — *"सर्वभूतहिताय च"*, समस्त प्राणियों के हित के लिए।

संपूर्ण स्तोत्र

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ध्यात्वा सरस्वतीं देवीं गणनाथं विनायकम्। राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाकरोत्॥१॥

भूमिका: सरस्वती देवी तथा गणों के नाथ विनायक का ध्यान करके राजा दशरथ ने शनिदेव का यह स्तोत्र किया। कथा के अनुसार यह स्तोत्र रथ पर ही कहा गया था — धनुष रख देने और हाथ जोड़ने के बाद।

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नमो नीलमयूखाय नीलोत्पलनिभाय च॥२॥

कृष्ण (श्याम वर्ण) तथा नील वर्ण वाले को नमस्कार; जो शितिकण्ठ (नीलकण्ठ शिव) के सदृश हैं। नील किरणों वाले तथा नील कमल के सदृश आभा वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत यहाँ कोष्ठक में "मधूकाय" भी देता है, और तुलना-स्रोत "शिखिकण्ठनिभाय" (मयूर-कण्ठ सदृश) तथा "नीलमुखाब्जाय" पढ़ता है।

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च। नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयानक॥३॥

मांस-रहित शरीर वाले तथा लंबी दाढ़ी व जटा वाले को नमस्कार। विशाल नेत्रों वाले, सूखे उदर वाले तथा भयानक रूप वाले को नमस्कार। यह स्तोत्र की सबसे विशिष्ट बात है — यह शनि के रूप का वर्णन बिना कोमल किए करता है।

नमः परुषगात्राय स्थूलरोमाय वै नमः। नमो नित्यं क्षुधार्ताय नित्यतप्ताय वै नमः॥४॥

कठोर शरीर वाले तथा स्थूल रोमों वाले को नमस्कार। नित्य क्षुधा से पीड़ित तथा नित्य तप्त रहने वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "तृप्ताय" देता है; तुलना-स्रोत "अतृप्ताय" तथा "परुषनेत्राय, स्थूलरोम्णे" पढ़ता है।

नमः कालाग्निरूपाय कृतान्तक नमोऽस्तु ते। नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः॥५॥

कालाग्नि के रूप वाले को नमस्कार; हे कृतान्त (यम-स्वरूप), आपको नमस्कार हो। कोटर (गड्ढे) सदृश नेत्रों वाले को नमस्कार; जिनकी ओर देखा तक न जा सके, उन दुर्निरीक्ष्य को नमस्कार। पाठभेद: तुलना-स्रोत यहाँ "नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्राय ते नमः। नमस्ते घोररूपाय…" पढ़ता है।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने। नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोऽस्तु ते॥६॥

घोर, रौद्र, भीषण तथा कराल रूप वाले को नमस्कार। सर्वभक्षी को नमस्कार; हे वलीमुख (झुर्रियों वाले मुख वाले), आपको नमस्कार हो। यह श्लोक दोनों पाठ-परंपराओं में लगभग अक्षरशः एक-सा है।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदायक। अधोदृष्टे नमस्तुभ्यं वपुःश्याम नमोऽस्तु ते॥७॥

हे सूर्यपुत्र, आपको नमस्कार हो; हे भास्कर-पुत्र, भय देने वाले। हे नीचे दृष्टि रखने वाले, आपको नमस्कार; हे श्याम शरीर वाले, आपको नमस्कार हो। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "भास्वरो" तथा "संवर्तक" देता है — और तुलना-स्रोत ठीक वही पढ़ता है: "भास्कराभयदायिने" तथा "संवर्तक नमो नमः"।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमो नमः। तपसा दग्धदेहाय नित्ययोगरताय च॥८॥

हे मन्दगति वाले, आपको नमस्कार; निर्दय (निस्त्रिंश) को बारंबार नमस्कार। तप से दग्ध शरीर वाले तथा नित्य योग में रत रहने वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "निष्प्रभाय" देता है; तुलना-स्रोत "नमो दुःसहदेहाय" पढ़ता है।

नमस्ते ज्ञाननेत्राय काश्यपात्मजसूनवे। तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्‍ क्षणात्॥९॥

ज्ञान-रूपी नेत्र वाले को नमस्कार; कश्यप के पुत्र (सूर्य) के पुत्र को नमस्कार। प्रसन्न होकर आप राज्य दे देते हैं, और रुष्ट होकर उसी क्षण हर लेते हैं। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "क्रुद्धो" देता है, और तुलना-स्रोत ठीक वही पढ़ता है।

देवासुरमनुष्याश्च पशुपक्षिसरीसृपाः। त्वया विलोकिताः सौरे दैन्यमाशु व्रजन्ति च॥१०॥

देवता, असुर, मनुष्य तथा पशु, पक्षी व सरीसृप — हे सौरे, आपके द्वारा देखे जाने पर ये सब शीघ्र ही दीनता को प्राप्त हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "सिद्धविद्याधरोरगाः" पढ़ता है।

ब्रह्मा शक्रो यमश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः। राज्यभ्रष्टाश्च ते सर्वे तव दृष्ट्या विलोकिताः॥११॥

ब्रह्मा, इन्द्र, यम तथा सप्तर्षि — ये सब भी आपकी दृष्टि से देखे जाने पर राज्य से भ्रष्ट हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "ऋषयः सप्त सागराः" पढ़ता है।

देशा नगरग्रामाश्च द्वीपाश्चैवाद्रयस्तथा। रौद्रदृष्ट्या तु ये दृष्टाः क्षयं गच्छन्ति तत् क्षणात्॥१२॥

देश, नगर, ग्राम, द्वीप तथा पर्वत — जो भी आपकी रौद्र दृष्टि से देखे जाते हैं, वे उसी क्षण क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "सरितः सागराः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः" जोड़ता है।

प्रसादं कुरु मे सौरे वरार्थेऽहं तवाश्रितः। सौरे क्षमस्वापराधं सर्वभूतहिताय च॥१३॥ ॥ इति दशरथ कृत श्री शनैश्चर स्तोत्रम् ॥

हे सौरे, मुझ पर प्रसन्न होइए; वर की इच्छा से मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे सौरे, समस्त प्राणियों के हित के लिए मेरा अपराध क्षमा कीजिए। — इस प्रकार दशरथ कृत श्री शनैश्चर स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। ध्यान दें कि अंतिम पंक्ति में याचना अपने लिए नहीं, सर्वभूतहित के लिए है — यही कथा का भी सार है।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. भूमिका: सरस्वती देवी तथा गणों के नाथ विनायक का ध्यान करके राजा दशरथ ने शनिदेव का यह स्तोत्र किया। कथा के अनुसार यह स्तोत्र रथ पर ही कहा गया था — धनुष रख देने और हाथ जोड़ने के बाद।
  2. कृष्ण (श्याम वर्ण) तथा नील वर्ण वाले को नमस्कार; जो शितिकण्ठ (नीलकण्ठ शिव) के सदृश हैं। नील किरणों वाले तथा नील कमल के सदृश आभा वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत यहाँ कोष्ठक में "मधूकाय" भी देता है, और तुलना-स्रोत "शिखिकण्ठनिभाय" (मयूर-कण्ठ सदृश) तथा "नीलमुखाब्जाय" पढ़ता है।
  3. मांस-रहित शरीर वाले तथा लंबी दाढ़ी व जटा वाले को नमस्कार। विशाल नेत्रों वाले, सूखे उदर वाले तथा भयानक रूप वाले को नमस्कार। यह स्तोत्र की सबसे विशिष्ट बात है — यह शनि के रूप का वर्णन बिना कोमल किए करता है।
  4. कठोर शरीर वाले तथा स्थूल रोमों वाले को नमस्कार। नित्य क्षुधा से पीड़ित तथा नित्य तप्त रहने वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "तृप्ताय" देता है; तुलना-स्रोत "अतृप्ताय" तथा "परुषनेत्राय, स्थूलरोम्णे" पढ़ता है।
  5. कालाग्नि के रूप वाले को नमस्कार; हे कृतान्त (यम-स्वरूप), आपको नमस्कार हो। कोटर (गड्ढे) सदृश नेत्रों वाले को नमस्कार; जिनकी ओर देखा तक न जा सके, उन दुर्निरीक्ष्य को नमस्कार। पाठभेद: तुलना-स्रोत यहाँ "नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्राय ते नमः। नमस्ते घोररूपाय…" पढ़ता है।
  6. घोर, रौद्र, भीषण तथा कराल रूप वाले को नमस्कार। सर्वभक्षी को नमस्कार; हे वलीमुख (झुर्रियों वाले मुख वाले), आपको नमस्कार हो। यह श्लोक दोनों पाठ-परंपराओं में लगभग अक्षरशः एक-सा है।
  7. हे सूर्यपुत्र, आपको नमस्कार हो; हे भास्कर-पुत्र, भय देने वाले। हे नीचे दृष्टि रखने वाले, आपको नमस्कार; हे श्याम शरीर वाले, आपको नमस्कार हो। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "भास्वरो" तथा "संवर्तक" देता है — और तुलना-स्रोत ठीक वही पढ़ता है: "भास्कराभयदायिने" तथा "संवर्तक नमो नमः"।
  8. हे मन्दगति वाले, आपको नमस्कार; निर्दय (निस्त्रिंश) को बारंबार नमस्कार। तप से दग्ध शरीर वाले तथा नित्य योग में रत रहने वाले को नमस्कार। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "निष्प्रभाय" देता है; तुलना-स्रोत "नमो दुःसहदेहाय" पढ़ता है।
  9. ज्ञान-रूपी नेत्र वाले को नमस्कार; कश्यप के पुत्र (सूर्य) के पुत्र को नमस्कार। प्रसन्न होकर आप राज्य दे देते हैं, और रुष्ट होकर उसी क्षण हर लेते हैं। पाठभेद: आधार-स्रोत कोष्ठक में "क्रुद्धो" देता है, और तुलना-स्रोत ठीक वही पढ़ता है।
  10. देवता, असुर, मनुष्य तथा पशु, पक्षी व सरीसृप — हे सौरे, आपके द्वारा देखे जाने पर ये सब शीघ्र ही दीनता को प्राप्त हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "सिद्धविद्याधरोरगाः" पढ़ता है।
  11. ब्रह्मा, इन्द्र, यम तथा सप्तर्षि — ये सब भी आपकी दृष्टि से देखे जाने पर राज्य से भ्रष्ट हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "ऋषयः सप्त सागराः" पढ़ता है।
  12. देश, नगर, ग्राम, द्वीप तथा पर्वत — जो भी आपकी रौद्र दृष्टि से देखे जाते हैं, वे उसी क्षण क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। पाठभेद: तुलना-स्रोत "सरितः सागराः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः" जोड़ता है।
  13. हे सौरे, मुझ पर प्रसन्न होइए; वर की इच्छा से मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे सौरे, समस्त प्राणियों के हित के लिए मेरा अपराध क्षमा कीजिए। — इस प्रकार दशरथ कृत श्री शनैश्चर स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ। ध्यान दें कि अंतिम पंक्ति में याचना अपने लिए नहीं, सर्वभूतहित के लिए है — यही कथा का भी सार है।

लाभ

  • कथा में शनि स्वयं वर देते हैं कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाले की पीड़ा वे छोड़ देंगे — चाहे वे उसके मृत्यु-स्थान, जन्म अथवा व्यय भाव में क्यों न हों।
  • शनि का दूसरा वचन यह है कि गोचर, जन्म-लग्न, दशा तथा अंतर्दशा में वे पाठ करने वाले की रक्षा करेंगे।
  • कथा के अनुसार दशरथ का पहला वर यह था कि रोहिणी-शकट न भेदा जाए, जिससे बारह वर्ष का दुर्भिक्ष टल गया — स्तोत्र इसी प्रसंग का है।
  • श्लोक 9 की पंक्ति "तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्" शनि-उपासना का मूल भाव एक ही वाक्य में रख देती है।
  • अंतिम श्लोक की याचना अपने लिए नहीं, "सर्वभूतहिताय" — समस्त प्राणियों के हित के लिए है।

कब करें पाठ

शनिवार को — कथा में शनि स्वयं "मद्दिने तु विशेषेण" कहकर अपने वार का उल्लेख करते हैंसाढ़े-साती तथा ढैया के काल में प्रतिदिनशनि की महादशा अथवा अंतर्दशा मेंशनि जयंती तथा शनि अमावस्या पर

पाठ विधि

कथा में शनिदेव स्वयं विधि बताते हैं, और वह यहाँ दर्ज करने योग्य है — स्नान कर शुद्ध व एकाग्र होकर श्रद्धापूर्वक पाठ करें; शमी के पत्तों से पूजन करें; लोहे की प्रतिमा का अर्चन करें; तिल मिश्रित उड़द का ओदन अर्पित करें; दक्षिणा में लोहा दें; और सामर्थ्य हो तो काले रंग की भैंस तथा वस्त्र का दान करें। शनि विशेष रूप से "मद्दिने" अर्थात अपने वार (शनिवार) का उल्लेख करते हैं। साधारण पाठ इस प्रकार करें — शनिवार प्रातः स्नान के बाद शनिदेव के समक्ष अथवा पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीप जलाकर बैठें, पहले सरस्वती व गणेश का स्मरण करें (श्लोक 1 यही कहता है), फिर तेरह श्लोक क्रम से पढ़ें। पाठ लगभग 4–5 मिनट का है। इसके साथ शनैश्चराष्टकम् अथवा शनि चालीसा पढ़ने की परंपरा है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (13/13 श्लोक)
मूल ग्रंथदशरथ कृत शनैश्चर स्तोत्र — मूलतः कैलास पर शंकर द्वारा पार्वती को उपदिष्ट (पुराण-संदर्भ अनिश्चित)
स्रोत परंपराstotranidhi.com — श्री शनैश्चर स्तोत्रम् (दशरथ कृतम्); आधार पाठ, 13 श्लोक। यह स्रोत स्वयं सात स्थानों पर कोष्ठक में पाठभेद छापता है। · sanskritdocuments.org (doc_z_misc_navagraha/shanaishcharastotram) — वही स्तोत्र, पूरी रोहिणी-शकट-भेद कथा सहित (61 श्लोक; सूत-मुनि संवाद, मूलतः कैलास पर शंकर द्वारा पार्वती को उपदिष्ट), तथा अंत में वही स्तोत्र स्वतंत्र 11-श्लोकीय रूप में। कथा, शनि द्वारा कही गई पूजा-विधि तथा दोनों वरदान इसी से हैं। · ⚠️ पाठ-परंपरा वास्तव में शाखित है। आधार-स्रोत के सात कोष्ठक-पाठभेदों में से कई ठीक वही पाठ हैं जो तुलना-स्रोत की परंपरा में मुख्य पाठ हैं (जैसे [संवर्तक], [क्रुद्धो]) — अर्थात दोनों स्रोत एक ही शाखित पाठ को ईमानदारी से दर्ज कर रहे हैं। आधार-स्रोत का पाठ मुख्य रखा गया; हर भेद उसी श्लोक के अर्थ में दर्ज है। · ⚠️ श्लोक-संख्या भिन्न: आधार-स्रोत 13 श्लोक, तुलना-स्रोत का स्वतंत्र रूप 11 श्लोक। · ⚠️ मूल पुराण का नाम किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला, अतः कोई ग्रंथ-नाम नहीं दिया गया। तुलना-स्रोत केवल "इति श्री दशरथमहाराजकृतं शनैश्चरस्तोत्रं सम्पूर्णम्" कहता है। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित (13/13)।
रचयिताराजा दशरथ
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: पाठ-परंपरा वास्तव में शाखित है, और यह अनुमान नहीं — प्रमाण है। आधार-स्रोत सात स्थानों पर कोष्ठक में पाठभेद छापता है ([मधूकाय], [तृप्ताय], [भास्वरो], [संवर्तक], [निष्प्रभाय], [ज्ञान], [क्रुद्धो]), और उनमें से कई ठीक वही पाठ हैं जो दूसरे स्रोत की परंपरा में मुख्य पाठ के रूप में मिलते हैं — जैसे [संवर्तक] और [क्रुद्धो]। अर्थात दोनों स्रोत ईमानदारी से एक ही शाखित पाठ को दर्ज कर रहे हैं। यहाँ आधार-स्रोत का पाठ मुख्य रखा गया है और भेद प्रत्येक श्लोक के अर्थ में दर्ज हैं; किसी को चुपचाप "सही" नहीं कहा गया। श्लोक-संख्या भी भिन्न है — आधार-स्रोत 13, तुलना-स्रोत का स्वतंत्र रूप 11। मूल पुराण का नाम किसी स्रोत ने नहीं दिया, अतः कोई ग्रंथ-नाम गढ़ा नहीं गया; तुलना-स्रोत केवल इतना बताता है कि यह मूलतः कैलास पर शंकर द्वारा पार्वती को उपदिष्ट था और सूत ने मुनियों से कहा। ध्यान दें कि यह शनैश्चराष्टकम् से भिन्न रचना है, यद्यपि वह भी दशरथ कृत है।

देव परिचय

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शनि देव कर्म और न्याय के अधिष्ठाता हैं — सूर्यपुत्र, जो कर्मों के अनुसार फल देते हैं।

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