शनि जयंती

Shani Jayanti

मई–जून

महत्व

शनि जयंती ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाई जाती है और इसे शनिदेव का जन्मोत्सव माना जाता है। परंपरा के अनुसार वे सूर्यदेव तथा उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं।

शनि को नवग्रहों में न्याय का देवता तथा कर्मफल-दाता कहा जाता है — वे व्यक्ति के अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा रखते हैं और उसी के अनुसार फल देते हैं। इसीलिए यह दिन केवल पूजा का नहीं, आत्म-चिंतन और कर्म-सुधार का अवसर भी माना जाता है।

साढ़े-साती तथा ढैया के काल से गुज़र रहे लोग इस दिन विशेष रूप से पूजा करते हैं। पूजन में काला वस्त्र, सरसों का तेल, काले तिल तथा नील पुष्प अर्पित किए जाते हैं — वही सामग्री जो शनैश्चराष्टकम् के पाँचवें श्लोक में भी गिनाई गई है।

पूजन विधि व परंपरा

  • काले वस्त्र पर शनिदेव की प्रतिमा अथवा चित्र की स्थापना
  • सरसों के तेल का दीप जलाना
  • काले तिल तथा नील पुष्प अर्पित करना
  • पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाना तथा परिक्रमा
  • शनि चालीसा, शनैश्चराष्टकम् व शनि नामावली का पाठ
  • तिल, उड़द, लोहा व नील वस्त्र का दान
  • शमी-पत्र अर्पण तथा हनुमान-उपासना

तिथि / पंचांग

तिथिअमावस्या
पक्षकृष्ण
माहज्येष्ठ
समय (लगभग)मई–जून
आराध्यश्री शनि देव
स्रोतhindunidhi.com — शनि जयंती: ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि; सूर्यदेव व छाया के पुत्र शनिदेव का जन्मोत्सव; काला वस्त्र, सरसों का तेल, काले तिल व नील पुष्प का पूजन-विधान · दान-सामग्री (तिल, उड़द, लोहा, नील वस्त्र) — शनैश्चराष्टकम् श्लोक 5, इसी संग्रह में स्रोत सहित दर्ज
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शनि जयंती — सामान्य प्रश्न

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