समय
3–4 मिनट
श्लोक
9
कठिनाई
मध्यम (Intermediate)
शुभ दिन
शनिवार; शनि साढ़े-साती व ढैया काल; अमावस्या
उद्देश्य:शनि-शांति (Shani Relief)भय-नाश (Freedom from Fear)कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)
✓ संपूर्ण (9/9 श्लोक)
श्री शनैश्चराष्टकम् ब्रह्माण्ड पुराण का आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जिसे राजा दशरथ ने कहा था। हर श्लोक "तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय" पर समाप्त होता है। इसका पाँचवाँ श्लोक तिल, उड़द, गुड़, लोहा व नील वस्त्र के दान का विधान देता है — शनि के प्रचलित उपायों का यही मूल है।
FAQ
श्री शनैश्चराष्टकम् — सामान्य प्रश्न
ब्रह्माण्ड पुराण से — पाठ "इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे श्रीशनैश्चरस्तोत्रं सम्पूर्णम्" कहकर समाप्त होता है। कर्ता राजा दशरथ हैं; विनियोग में स्पष्ट लिखा है "दशरथ ऋषिः, शनैश्चरो देवता, त्रिष्टुप् छन्दः"। यह उन थोड़े स्तोत्रों में है जिनका ग्रंथ-संदर्भ और ऋषि दोनों पाठ के भीतर ही दर्ज मिलते हैं।
"तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय" — अर्थात "उन श्री रविनन्दन को नमस्कार है"। रविनन्दन का अर्थ है सूर्य के पुत्र। आठों श्लोक इसी पद पर समाप्त होते हैं, और यही इस स्तोत्र की पहचान व लय है। पाठ करते समय इस पंक्ति को ठहरकर बोलने की परंपरा है।
पहला श्लोक ही उन्हें एक साथ गिना देता है — कोण, अन्तक, रौद्र, यम, बभ्रु, कृष्ण, शनि, पिङ्गल, मन्द तथा सौरि। श्लोक कहता है कि इनका नित्य स्मरण करने पर वे पीड़ा हर लेते हैं। यही दस नाम आगे चलकर स्वतंत्र "पिप्पलाद दशनाम स्तोत्र" के रूप में भी पढ़े जाते हैं, और कुछ पाठ-परंपराएँ उसके दो श्लोक इसी स्तोत्र के आगे जोड़ देती हैं।
हाँ — और वह इसी स्तोत्र का पाँचवाँ श्लोक है। वह कहता है: *"तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा। प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च"* — अर्थात तिल, जौ, उड़द, गुड़ तथा अन्न के दान से; लोहे अथवा नील वस्त्र के दान से; और अपने वार (शनिवार) को मंत्र-जप से वे प्रसन्न होते हैं। शनिवार को जो वस्तुएँ आज दान की जाती हैं, वे ठीक यही हैं — यह लोक-परंपरा भर नहीं, मूल पाठ में लिखा है।
वह दोहराव नहीं, क्रम है — और यह प्रायः किसी की दृष्टि में नहीं आता। श्लोक 2 में देवयोनियाँ हैं (सुर, असुर, किम्पुरुष, गणेन्द्र, गन्धर्व, विद्याधर, पन्नग); श्लोक 3 में प्राणी (मनुष्य, राजा, पशु, सिंह, और कीट-पतंग-भ्रमर तक); श्लोक 4 में स्थान व संस्थाएँ (देश, दुर्ग, वन, सेना के शिविर, नगर, पत्तन)। तीनों एक ही पद पर समाप्त होते हैं — *"पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन"*। भाव यह है कि प्रभाव व्यक्ति तक सीमित नहीं, देश और सेना तक जाता है।
सातवें श्लोक से। वह कहता है कि जो मनुष्य अन्य प्रदेश से उनके वार (शनिवार) को अपने घर लौटता है, वह सुखी होता है; और जो घर से निकल चुका हो, वह उस दिन आगे न बढ़े। अर्थात नियम यात्रा-मात्र का निषेध नहीं है — लौटना शुभ कहा गया है, आगे बढ़ना नहीं। यह भेद लोक-प्रचलन में प्रायः मिट जाता है।
आठवाँ श्लोक स्तोत्र को कहीं और ही ले जाता है — तीनों भुवनों के स्रष्टा स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, त्राता हरि हैं, संहार पिनाकधारी शिव करते हैं; किंतु "एकस्त्रिधा", एक ही तत्त्व तीन रूपों में है, जो ऋक्, यजुः तथा साम की मूर्ति है। आठ श्लोकों में शनि को नवग्रह में से एक ग्रह से उठाकर उसी त्रिमूर्ति-तत्त्व के साथ रख दिया गया है।
हाँ, तीन स्थानों पर — और वे यहाँ छिपाए नहीं गए। (1) श्लोक 2 में एक स्रोत "किम्पुरुषा गणेन्द्रा" (गणों के अधिपति) और दूसरा "किंपुरुषोरगेन्द्रा" (नागराज) छापता है; दोनों अर्थवान् हैं। (2) श्लोक 8 में "त्राता हरिः संहरते पिनाकी" बनाम "त्राता हरीशो हरते पिनाकी" — अर्थ एक ही रहता है, पद-विभाजन भिन्न। (3) फलश्रुति में "निर्वाणपदं परं सः" बनाम "निर्वाणपदं तदन्ते"। किसी को चुपचाप "सही" नहीं कहा गया; आधार-स्रोत का पाठ मुख्य रखा गया है और भेद यहाँ दर्ज हैं।
ये दो अलग रचनाएँ हैं, यद्यपि दोनों दशरथ कृत हैं। अष्टकम् त्रिष्टुप् (उपजाति) छन्द में 8 श्लोक + फलश्रुति है, हर श्लोक "तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय" पर समाप्त होता है, और यह ब्रह्माण्ड पुराण से है — पाठ 3–4 मिनट का। शनैश्चर स्तोत्रम् अनुष्टुप् में 13 श्लोकों की भिन्न रचना है जो "नमः कृष्णाय नीलाय" से आरंभ होती है और शनि के रूप का वर्णन करती है। दोनों को एक समझ लेना सामान्य भूल है।
फलश्रुति स्वयं कह देती है — "प्रभाते" (प्रातःकाल) और "प्रयतः" (संयमपूर्वक)। स्नान के बाद शनिदेव के समक्ष अथवा पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीप जलाकर बैठें और आठों श्लोक क्रम से पढ़ें; अंत का ध्रुवपद ठहरकर बोलें। पाठ के बाद श्लोक 5 में कहा गया दान — तिल, जौ, उड़द, गुड़, अन्न, लोहा अथवा नील वस्त्र — जो संभव हो, करें। साढ़े-साती अथवा ढैया के काल में इसे प्रतिदिन पढ़ने की परंपरा है, क्योंकि पाठ केवल 3–4 मिनट का है।
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पर्व
