श्री शनिदेव चालीसा

śrī śanideva cālīsā

Shani Dev Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
शनिवार; साढ़ेसाती व ढैया काल
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

परिचय

शनि देव कर्म और न्याय के अधिष्ठाता हैं — सूर्यपुत्र, जो कर्मों के अनुसार फल देते हैं।

स्रोत: पारंपरिक शनिदेव चालीसा

संपूर्ण चालीसा

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जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

गिरिजा-पुत्र गणेश को नमन, जो मंगल करने वाले व कृपालु हैं; हे नाथ, दीनों के दुःख दूर कर हमें निहाल कीजिए।

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो; आप सदा भक्तों का पालन करते हैं।

चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

चार भुजाओं वाला श्याम शरीर सुशोभित है; मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट की छवि छाई रहती है।

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

अत्यंत विशाल व मनोहर ललाट; टेढ़ी दृष्टि व विकराल भृकुटि वाले हैं।

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

कानों में कुण्डल चमचमाते हैं और वक्ष पर मोती-मणियों की माला दमकती है।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

हाथों में गदा, त्रिशूल व कुठार धारण किए; पल भर में शत्रुओं का संहार कर देते हैं।

पिंगल कृष्णो छाया नंदन। यम कोणस्थ रौद्र दुखभंजन॥

पिंगल, कृष्ण, छायापुत्र, यम, कोणस्थ व रौद्र — आप दुःखों का नाश करने वाले हैं।

सौरी मंद शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

सौरी, मंद, शनि आदि आपके दस नाम हैं; हे सूर्यपुत्र, सब अपनी कामना से आपको पूजते हैं।

जा पर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

हे प्रभु, जिस पर आप प्रसन्न हो जाते हैं, उस रंक (निर्धन) को भी क्षण भर में राजा बना देते हैं।

पर्वतहू तृण होइ निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

आपकी दृष्टि से पर्वत भी तिनके के समान हो जाता है और तिनके को पर्वत बना देते हैं।

राज मिलत बन रामहिं दीन्ह्यो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्ह्यो॥

राज्य मिलते-मिलते राम को वनवास दिलवा दिया; कैकेयी की बुद्धि हर ली।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

वन में कपट से (स्वर्ण) मृग दिखाकर माता जानकी का हरण करा दिया।

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

लक्ष्मण को शक्ति लगने से व्याकुल कर दिया, जिससे सेना में हाहाकार मच गया।

रावण की गति-मति बौराई। रामचंद्र सों बैर बढ़ाई॥

रावण की बुद्धि भ्रष्ट कर दी, जिससे उसने रामचंद्र से वैर बढ़ा लिया।

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

सोने की लंका को कीट (राख) के समान करा दिया और बजरंगबली वीर की विजय-डंका बजी।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

राजा विक्रम पर भी आपकी दशा पड़ी; (आरोप में) चित्र का मोर हार निगल गया।

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

नौलखा हार की चोरी का झूठा दोष लगा और (राजा के) हाथ-पैर कटवा दिए गए।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

भारी विकट दशा दिखाई और (विक्रम से) तेली के घर कोल्हू चलवाया।

विनय राग दीपक महँ कीन्ह्यो। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्ह्यो॥

जब (राजा ने) राग दीपक में आपकी विनती की, तब प्रभु प्रसन्न होकर उसे सुख दिया।

हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी। आपहुँ भरे डोम घर पानी॥

राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और स्वयं उन्हें डोम के घर पानी भरना पड़ा।

तैसे नल पर दशा सिरानी। भूँजी-मीन कूद गई पानी॥

वैसे ही राजा नल पर भी दशा बीती; (कहते हैं) भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

जब श्री शंकर पर भी दशा आई, तब पार्वती को सती होना पड़ा (दक्ष-यज्ञ प्रसंग)।

तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरीसुत सीसा॥

आपके क्रोधभरी दृष्टि से तनिक देखते ही गौरी-पुत्र (गणेश) का सिर आकाश में उड़ गया।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

पाण्डवों पर भी आपकी दशा आई; द्रौपदी का चीर-हरण होते-होते बची।

कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

कौरवों की भी बुद्धि भ्रष्ट कर दी, जिससे महाभारत का युद्ध हो गया।

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥

सूर्य को मुख में रखकर तत्काल पाताल में कूद पड़े (ग्रहण-कथा)।

शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

शेष आदि देवताओं ने विनती की, तब सूर्य को मुख से छुड़ा दिया।

वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

हे सुजान प्रभु, आपके सात वाहन हैं — हाथी, गधा, मृग, श्वान आदि।

जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

सियार, सिंह आदि नख-धारी वाहन हैं; ज्योतिष इनके फल को स्पष्ट बताता है।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

गज-वाहन पर आने से घर में लक्ष्मी आती है और अश्व-वाहन से सुख-सम्पत्ति उत्पन्न होती है।

गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

गर्दभ-वाहन अनेक कार्यों में हानि करता है, जबकि सिंह-वाहन राज-समाज में सिद्धि देता है।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

सियार-वाहन बुद्धि नष्ट करता है और मृग-वाहन कष्ट देकर प्राण-संकट लाता है।

जब आवहिं स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

जब श्वान की सवारी पर आते हैं, तब चोरी आदि का भारी भय रहता है।

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

इसी प्रकार आपके चार चरण हैं — स्वर्ण, लोहा, चाँदी व ताम्र।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पति नष्ट करावैं॥

हे प्रभु, जब आप लोहे के चरण पर आते हैं, तब धन-जन व सम्पत्ति की हानि होती है।

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

ताम्र समता देता है, रजत शुभकारी है और स्वर्ण-चरण सर्व सुख व महान मंगल देता है।

जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुँ न दशा निकृष्ट सतावै॥

जो नित्य शनि-चरित्र (चालीसा) गाता है, उसे कभी विकट दशा नहीं सताती।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बल ढीला॥

हे नाथ, आप अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रुओं का बल नष्ट कर ढीला कर देते हैं।

जो पंडित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

जो योग्य पंडित को बुलाकर विधिपूर्वक शनि ग्रह की शांति कराता है (उसका कल्याण होता है)।

पीपल जल शनि विधिवत सींचैं। देय दीप दधि घृत तेहि खींचैं॥

शनिवार को पीपल को विधिवत जल चढ़ाएँ तथा दीप, दही व घी अर्पित करें।

तेल टेल पर जो कुछ होई। टीनहिं तुरत देय तुम सोई॥

तेल आदि जो कुछ अर्पण-योग्य हो, उसे श्रद्धापूर्वक तुरंत शनिदेव को अर्पित करें।

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

श्रद्धापूर्वक शनिदेव का यह पाठ चालीस दिन निरंतर करने से भक्त भवसागर से पार हो जाता है।

लिपि बदलने के लिए ऊपर देवनागरी / IAST / Roman चुनें।

अर्थ (हिन्दी)

  1. गिरिजा-पुत्र गणेश को नमन, जो मंगल करने वाले व कृपालु हैं; हे नाथ, दीनों के दुःख दूर कर हमें निहाल कीजिए।
  2. हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो; आप सदा भक्तों का पालन करते हैं।
  3. चार भुजाओं वाला श्याम शरीर सुशोभित है; मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट की छवि छाई रहती है।
  4. अत्यंत विशाल व मनोहर ललाट; टेढ़ी दृष्टि व विकराल भृकुटि वाले हैं।
  5. कानों में कुण्डल चमचमाते हैं और वक्ष पर मोती-मणियों की माला दमकती है।
  6. हाथों में गदा, त्रिशूल व कुठार धारण किए; पल भर में शत्रुओं का संहार कर देते हैं।
  7. पिंगल, कृष्ण, छायापुत्र, यम, कोणस्थ व रौद्र — आप दुःखों का नाश करने वाले हैं।
  8. सौरी, मंद, शनि आदि आपके दस नाम हैं; हे सूर्यपुत्र, सब अपनी कामना से आपको पूजते हैं।
  9. हे प्रभु, जिस पर आप प्रसन्न हो जाते हैं, उस रंक (निर्धन) को भी क्षण भर में राजा बना देते हैं।
  10. आपकी दृष्टि से पर्वत भी तिनके के समान हो जाता है और तिनके को पर्वत बना देते हैं।
  11. राज्य मिलते-मिलते राम को वनवास दिलवा दिया; कैकेयी की बुद्धि हर ली।
  12. वन में कपट से (स्वर्ण) मृग दिखाकर माता जानकी का हरण करा दिया।
  13. लक्ष्मण को शक्ति लगने से व्याकुल कर दिया, जिससे सेना में हाहाकार मच गया।
  14. रावण की बुद्धि भ्रष्ट कर दी, जिससे उसने रामचंद्र से वैर बढ़ा लिया।
  15. सोने की लंका को कीट (राख) के समान करा दिया और बजरंगबली वीर की विजय-डंका बजी।
  16. राजा विक्रम पर भी आपकी दशा पड़ी; (आरोप में) चित्र का मोर हार निगल गया।
  17. नौलखा हार की चोरी का झूठा दोष लगा और (राजा के) हाथ-पैर कटवा दिए गए।
  18. भारी विकट दशा दिखाई और (विक्रम से) तेली के घर कोल्हू चलवाया।
  19. जब (राजा ने) राग दीपक में आपकी विनती की, तब प्रभु प्रसन्न होकर उसे सुख दिया।
  20. राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और स्वयं उन्हें डोम के घर पानी भरना पड़ा।
  21. वैसे ही राजा नल पर भी दशा बीती; (कहते हैं) भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।
  22. जब श्री शंकर पर भी दशा आई, तब पार्वती को सती होना पड़ा (दक्ष-यज्ञ प्रसंग)।
  23. आपके क्रोधभरी दृष्टि से तनिक देखते ही गौरी-पुत्र (गणेश) का सिर आकाश में उड़ गया।
  24. पाण्डवों पर भी आपकी दशा आई; द्रौपदी का चीर-हरण होते-होते बची।
  25. कौरवों की भी बुद्धि भ्रष्ट कर दी, जिससे महाभारत का युद्ध हो गया।
  26. सूर्य को मुख में रखकर तत्काल पाताल में कूद पड़े (ग्रहण-कथा)।
  27. शेष आदि देवताओं ने विनती की, तब सूर्य को मुख से छुड़ा दिया।
  28. हे सुजान प्रभु, आपके सात वाहन हैं — हाथी, गधा, मृग, श्वान आदि।
  29. सियार, सिंह आदि नख-धारी वाहन हैं; ज्योतिष इनके फल को स्पष्ट बताता है।
  30. गज-वाहन पर आने से घर में लक्ष्मी आती है और अश्व-वाहन से सुख-सम्पत्ति उत्पन्न होती है।
  31. गर्दभ-वाहन अनेक कार्यों में हानि करता है, जबकि सिंह-वाहन राज-समाज में सिद्धि देता है।
  32. सियार-वाहन बुद्धि नष्ट करता है और मृग-वाहन कष्ट देकर प्राण-संकट लाता है।
  33. जब श्वान की सवारी पर आते हैं, तब चोरी आदि का भारी भय रहता है।
  34. इसी प्रकार आपके चार चरण हैं — स्वर्ण, लोहा, चाँदी व ताम्र।
  35. हे प्रभु, जब आप लोहे के चरण पर आते हैं, तब धन-जन व सम्पत्ति की हानि होती है।
  36. ताम्र समता देता है, रजत शुभकारी है और स्वर्ण-चरण सर्व सुख व महान मंगल देता है।
  37. जो नित्य शनि-चरित्र (चालीसा) गाता है, उसे कभी विकट दशा नहीं सताती।
  38. हे नाथ, आप अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रुओं का बल नष्ट कर ढीला कर देते हैं।
  39. जो योग्य पंडित को बुलाकर विधिपूर्वक शनि ग्रह की शांति कराता है (उसका कल्याण होता है)।
  40. शनिवार को पीपल को विधिवत जल चढ़ाएँ तथा दीप, दही व घी अर्पित करें।
  41. तेल आदि जो कुछ अर्पण-योग्य हो, उसे श्रद्धापूर्वक तुरंत शनिदेव को अर्पित करें।
  42. श्रद्धापूर्वक शनिदेव का यह पाठ चालीस दिन निरंतर करने से भक्त भवसागर से पार हो जाता है।

लाभ

  • साढ़ेसाती, ढैया व शनि दोष की पीड़ा शांत होती है।
  • न्याय, धैर्य व कर्मफल में संतुलन की प्राप्ति होती है।
  • विघ्न, विलंब, रोग व भय का नाश होता है।
  • शनिवार के नियमित पाठ से शनि कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

कब करें पाठ

शनिवार कोसंध्या काल मेंसाढ़ेसाती/ढैया के समयशनि जयंती पर

पाठ विधि

शनिवार संध्या को शनिदेव के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाएँ, काले तिल व नीले पुष्प अर्पित करें। "ॐ शं शनैश्चराय नमः" का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करें। पीपल को जल चढ़ाना व तेल-दान शुभ माना जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपरापारंपरिक शनिदेव चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
रचयितापारंपरिक
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री शनि देव

Lord Shani (Saturn)

शनि देव कर्म और न्याय के अधिष्ठाता हैं — सूर्यपुत्र, जो कर्मों के अनुसार फल देते हैं।

देवता वर्गन्याय · कर्मफल · अनुशासन · धैर्य
वाहनकौआ / गिद्ध
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मुख्य मंत्रॐ शं शनैश्चराय नमः
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