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FAQ
गणेश चतुर्थी व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
क्योंकि परंपरा के अनुसार श्रीगणेश का प्राकट्य मध्याह्न काल में हुआ था। अधिकांश तिथि-व्रतों में सूर्योदय के समय की तिथि ली जाती है, किंतु यहाँ मध्याह्नव्यापिनी चतुर्थी ग्राह्य है — अर्थात जिस दिन मध्याह्न के समय चतुर्थी हो, वही दिन। यह इस व्रत को अन्य व्रतों से अलग करने वाली पहली बात है।
मान्यता है कि इस दिन चन्द्र-दर्शन से मिथ्या दोष लगता है — अर्थात व्यक्ति पर झूठा आरोप, विशेषतः चोरी का, लग सकता है। इसका कारण एक कथा है: गणेश जी के रोष पर चन्द्रदेव हँस पड़े थे, जिससे उन्हें श्राप मिला। बारह वर्ष तप के बाद गणेश ने श्राप मंद कर दिया और वह केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तक सीमित रह गया। निषेध पूरी चतुर्थी तिथि तक रहता है।
परंपरा में दो उपाय बताए गए हैं। पहला — स्यमन्तक मणि की कथा पढ़ें, सुनें अथवा स्मरण करें; शास्त्र कहते हैं कि इससे दोष निवृत्त हो जाता है। दूसरा — यह मंत्र पढ़ें: *"सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥"*
सीधा संबंध है। श्रीकृष्ण पर स्यमन्तक मणि चुराने का मिथ्या आरोप लगा था, और नारद जी ने उन्हें बताया कि इसका कारण यह है कि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रमा को देख लिया था। यानी यह कथा चन्द्र-दर्शन दोष का जीवंत उदाहरण भी है और उसका निवारण भी — क्योंकि इसी कथा का श्रवण दोष हरता है।
दूर्वा श्रीगणेश को सर्वाधिक प्रिय मानी जाती है, और परंपरा में इक्कीस दूर्वा-दल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ मोदक व लड्डू का भोग लगाया जाता है — मोदक गणेश जी का प्रिय नैवेद्य है।
कोई भी गणेश-भक्त स्त्री-पुरुष। विद्या, बुद्धि, आरोग्य तथा किसी नए कार्य के निर्विघ्न आरंभ की कामना से यह विशेष रूप से रखा जाता है। व्रत में अन्न वर्जित है; फल, दूध, मेवा, सेंधा नमक ग्रहण किया जा सकता है। प्याज-लहसुन व तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित। पारण मध्याह्न पूजन के पश्चात होता है।
उत्सव दस दिन चलता है और विसर्जन अनंत चतुर्दशी को किया जाता है। इन दस दिनों में प्रतिदिन पूजन, आरती व भोग की परंपरा है।
यह इस तिथि का एक प्रचलित लोक-नाम है, जो चन्द्र-दर्शन के निषेध तथा उससे लगने वाले मिथ्या दोष की मान्यता से जुड़ा है। सभी क्षेत्रों में यह नाम प्रचलित नहीं है।
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