गणेश चतुर्थी व्रत कथा

Ganesh Chaturthi Vrat Katha

तिथि व्रत (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) — मध्याह्न पूजन सहित

✓ संपूर्ण

परिचय व महत्व

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। गणेश पुराण के अनुसार श्रीगणेश का प्राकट्य इसी तिथि को, मध्याह्न काल में हुआ था — और यही बात इस व्रत को अन्य तिथि-व्रतों से अलग करती है।

अधिकांश व्रतों में सूर्योदय के समय की तिथि ली जाती है। यहाँ नहीं। चूँकि प्राकट्य मध्याह्न में हुआ, इसलिए मध्याह्नव्यापिनी चतुर्थी ही ग्राह्य मानी जाती है और मुख्य पूजन भी मध्याह्न में ही होता है।

इस पर्व की दूसरी विशिष्टता और भी असामान्य है — इस दिन चन्द्रमा को देखना वर्जित है। भारत के प्रमुख पर्वों में यह अकेला है जहाँ किसी को देखने पर ही निषेध हो। मान्यता है कि इस दिन चन्द्र-दर्शन से मिथ्या दोष लगता है, अर्थात व्यक्ति पर झूठा आरोप — विशेषतः चोरी का — लग सकता है। इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को कहीं-कहीं "पत्थर चौथ" भी कहा जाता है।

और यहीं इस व्रत की सबसे सुंदर बात है: कथा स्वयं ही उपाय है। परंपरा कहती है कि जो स्यमन्तक मणि का यह आख्यान पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है, वह चन्द्र-दर्शन के दोष से मुक्त हो जाता है। यानी यहाँ कथा केवल श्रद्धा की वस्तु नहीं, विहित निवारण है।

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेकोई भी गणेश-भक्त स्त्री-पुरुष यह व्रत रख सकते हैं। विद्या, बुद्धि, आरोग्य तथा किसी नए कार्य के निर्विघ्न आरंभ की कामना से यह विशेष रूप से रखा जाता है। रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ व बालक सामर्थ्यानुसार फलाहार पर व्रत रख सकते हैं।
कब रखेंभाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को। मध्याह्नव्यापिनी तिथि ग्राह्य है — अर्थात जिस दिन मध्याह्न के समय चतुर्थी हो, वही दिन लिया जाता है, न कि सूर्योदय के समय की तिथि। मुख्य पूजन मध्याह्न में तथा पारण उसके पश्चात।
आहार नियम:
  • दिनभर निराहार अथवा फलाहार (सामर्थ्यानुसार); मध्याह्न पूजन के पश्चात पारण
  • अन्न का त्याग; फल, दूध, मेवा व सेंधा नमक ग्रहण किया जा सकता है
  • प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित
  • तृतीया की संध्या से ही सात्त्विक आहार तथा संयम का पालन
अनुशंसित अभ्यास:
  • चन्द्र-दर्शन से बचें — यह इस व्रत का सबसे विशिष्ट नियम है; निषेध पूरी चतुर्थी तिथि तक रहता है
  • यदि अनजाने में चन्द्र-दर्शन हो जाए तो स्यमन्तक-कथा का श्रवण अथवा दोष-शमन मंत्र का पाठ करें
  • मध्याह्न में षोडशोपचार गणपति पूजन — यही मुख्य समय है
  • इक्कीस दूर्वा-दल तथा मोदक का भोग
  • गणेश चालीसा, संकटनाशन गणेश स्तोत्र व आरती का पाठ
  • दस दिन के उत्सव में प्रतिदिन पूजन तथा अनंत चतुर्दशी को विसर्जन

पूजन सामग्री

श्रीगणेश की मिट्टी की प्रतिमा अथवा चित्रदूर्वा (इक्कीस दल) — गणेश जी को सर्वाधिक प्रियमोदक तथा लड्डूसिंदूर, अक्षत, हल्दी, चंदनलाल पुष्प व लाल वस्त्रजनेऊ, सुपारी, नारियलघी के दीप, धूप, कर्पूरपंचामृत तथा गंगाजलऋतुफल व मेवा

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. तृतीया की संध्या से सात्त्विक आहार लें तथा संयम का पालन करें।
  2. चतुर्थी को प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  3. संकल्प लें — विद्या, आरोग्य, संतान व धन की प्राप्ति तथा विघ्नों के नाश हेतु श्रीगणपति के पूजन का।
  4. श्रीगणेश की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करें; परंपरा में मिट्टी की प्रतिमा ही श्रेष्ठ मानी जाती है।
  5. मध्याह्न काल की प्रतीक्षा करें — मुख्य पूजन इसी समय होता है, क्योंकि गणेश जी का प्राकट्य मध्याह्न में हुआ।
  6. षोडशोपचार से पूजन करें — ध्यान, आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, आभूषण, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा नमस्कार।
  7. सिंदूर अर्पित करें तथा इक्कीस दूर्वा-दल चढ़ाएँ — दूर्वा गणेश जी को सर्वाधिक प्रिय है।
  8. मोदक व लड्डू का भोग लगाएँ।
  9. "ॐ गं गणपतये नमः" का जप करें।
  10. गणेश चालीसा, संकटनाशन गणेश स्तोत्र तथा आरती का पाठ करें।
  11. स्यमन्तक मणि की कथा अवश्य सुनें अथवा पढ़ें — यही चन्द्र-दर्शन दोष का विहित निवारण है।
  12. मध्याह्न पूजन के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर पारण करें; दिनभर चन्द्र-दर्शन से बचें।
  13. दस दिन के उत्सव में प्रतिदिन पूजन करें और अनंत चतुर्दशी को विधिपूर्वक विसर्जन करें।

व्रत कथा

चन्द्रमा को श्राप क्यों मिला

कैलाश पर एक बार देवर्षि नारद भगवान शंकर के लिए एक अत्यंत स्वादिष्ट फल लेकर आए। कार्तिकेय और गणेश — दोनों पुत्र वह फल माँगने लगे।

ब्रह्मदेव के परामर्श से शंकर ने वह फल कार्तिकेय को दे दिया। इससे गणेश रुष्ट हो गए।

गणेश का यह रोष देखकर चन्द्रदेव हँस पड़े। अपने उपहास से क्षुब्ध होकर गणेश ने चन्द्रमा को श्राप दिया — कि वे किसी के देखने योग्य नहीं रहेंगे, और जो उन्हें देखेगा वह पाप का भागी होगा।

चन्द्रदेव ने बारह वर्ष तक तप किया। तब गणेश ने श्राप को मंद कर दिया — "केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो चन्द्रमा को देखेगा, वही अभिशाप का भागी होगा और उस पर मिथ्या दोषारोपण लगेंगे।"

यही कारण है कि आज भी इस एक दिन चन्द्र-दर्शन वर्जित माना जाता है।

स्यमन्तक मणि और श्रीकृष्ण पर लगा कलंक

सत्राजित भगवान सूर्य के परम भक्त थे। सूर्य ने प्रसन्न होकर उन्हें स्यमन्तक मणि दी, जो प्रतिदिन आठ भार स्वर्ण देती थी और जिसके प्रभाव से राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि तथा सर्प-भय नहीं रहता था।

श्रीकृष्ण ने कहा कि यह मणि राजा उग्रसेन को दे दी जाए, ताकि उसका लाभ पूरे राष्ट्र को मिले। किंतु लोभवश सत्राजित ने अस्वीकार कर दिया।

एक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन वह मणि धारण कर वन में शिकार खेलने गए। एक सिंह ने उन्हें मार डाला और मणि मुँह में दबा ली। आगे ऋक्षराज जाम्बवान् ने उस सिंह को मार डाला और मणि लेकर अपनी गुफा में चले गए, जहाँ उसे अपने बालक को खेलने के लिए दे दिया।

प्रसेन के न लौटने पर सत्राजित को संदेह हुआ कि श्रीकृष्ण ने ही उनके भाई को मारा होगा। यह बात फैलते ही द्वारका में श्रीकृष्ण के सिर कलंक का टीका लग गया।

गुफा का युद्ध और कलंक-निवारण

अपने ऊपर लगे इस लोकापवाद को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं वन में गए। उन्होंने पहले घोड़े व प्रसेन को मृत पाया, फिर सिंह को भी मृत पाया, और जाम्बवान् के पद-चिह्नों का अनुसरण करते हुए गुफा तक पहुँचे।

वहाँ श्रीकृष्ण और जाम्बवान् के बीच इक्कीस दिनों तक घोर संग्राम हुआ। अंत में शिथिल हो चुके जाम्बवान् ने भगवान को पहचान लिया और कहा — "हे प्रभो! आप ही मेरे स्वामी श्रीराम हैं; द्वापर में आपने इस रूप में मुझे दर्शन दिया।"

उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवती तथा स्यमन्तक मणि श्रीकृष्ण को समर्पित कर दीं। मणि लौटाकर श्रीकृष्ण ने अपने ऊपर लगा कलंक दूर किया।

आगे चलकर शतधन्वा ने सोए हुए सत्राजित का वध कर मणि छीन ली; श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत किया। मणि अक्रूर के पास पहुँची, और श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक कहा कि वे धर्मात्मा हैं, अतः मणि उन्हीं के पास रहे।

कथा में जो बात रह जाती है वह यह है कि कलंक स्वयं भगवान पर भी लगा — और उसे मिटाने के लिए उन्हें भी वन-वन भटकना पड़ा, इक्कीस दिन युद्ध करना पड़ा। मिथ्या दोष किसी को नहीं छोड़ता; उसका निवारण भी परिश्रम माँगता है।

कथा ही उपाय है

नारद जी ने श्रीकृष्ण को बताया था कि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रमा को देख लिया था, इसी कारण उन पर मिथ्या दोष लगा।

इसीलिए परंपरा कहती है — जो कोई स्यमन्तक मणि का यह आख्यान पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चन्द्र-दर्शन दोष से मुक्त हो जाता है और समस्त अपकीर्ति से छूटकर शांति पाता है।

यदि दैववशात् चन्द्र-दर्शन हो ही जाए, तो यह मंत्र पढ़ा जाता है — "सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥" अर्थात — "सिंह ने प्रसेन को मारा, और सिंह को जाम्बवान् ने मारा। हे सुकुमार बालक! तू मत रो, यह स्यमन्तक अब तेरा ही है।"

लाभ

  • परंपरा में यह व्रत विघ्नों के नाश तथा किसी भी नए कार्य के निर्विघ्न आरंभ के लिए किया जाता है।
  • विद्या, बुद्धि व आरोग्य की प्राप्ति की मान्यता है — गणेश बुद्धि-विवेक के अधिष्ठाता माने जाते हैं।
  • स्यमन्तक-कथा का श्रवण चन्द्र-दर्शन दोष तथा मिथ्या आरोप से मुक्ति का विहित उपाय बताया गया है।
  • कथा का भाव यह है कि मिथ्या कलंक स्वयं भगवान पर भी लगा — इसलिए उसका लगना अपमान नहीं, और उसका निवारण संभव है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल परंपरागणेश पुराण तथा श्रीमद्भागवत की स्यमन्तक-कथा
स्रोतdrikpanchang.com — गणेश चतुर्थी तिथि-निर्धारण: मध्याह्नव्यापिनी चतुर्थी क्यों (गणेश का जन्म मध्याह्न काल में), चन्द्र-दर्शन निषेध की अवधि, षोडशोपचार गणपति पूजा तथा अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन · गणेश पुराण परंपरा — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, मध्याह्न में श्रीगणेश का प्राकट्य · श्रीमद्भागवत की स्यमन्तक-कथा — सत्राजित, प्रसेन, जाम्बवान्, जाम्बवती, शतधन्वा व अक्रूर का प्रसंग; तथा दोष-शमन मंत्र "सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः" · चन्द्र-श्राप की कथा (कार्तिकेय व फल का प्रसंग; बारह वर्ष तप के पश्चात श्राप का मंद होना) — प्रचलित पौराणिक परंपरा · ⚠️ स्यमन्तक-आख्यान का सटीक अध्याय-क्रमांक किसी स्रोत में नहीं मिला, इसलिए वह यहाँ नहीं दिया गया — संख्या गढ़ी नहीं गई।
अंतिम अद्यतनजून 2026

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारतिथि व्रत (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) — मध्याह्न पूजन सहित
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