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FAQ
राधाष्टमी व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को — जन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद। तिथि प्रतिवर्ष पंचांग के अनुसार बदलती है।
प्रायः मध्याह्न तक उपवास रखा जाता है, क्योंकि राधा जी का प्राकट्य मध्याह्न में माना जाता है। मध्याह्न में पंचामृत अभिषेक और षोडशोपचार पूजन के बाद फलाहार लिया जाता है; कुछ परंपराओं में निर्जला व्रत भी रखते हैं। पारण अगले दिन नवमी को अन्नदान के साथ होता है।
पिता वृषभानु और माता कीर्ति (कीर्तिदा)। गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड 15.34) में गर्ग मुनि स्वयं कहते हैं — "वृषभानुसुता राधा या जाता कीर्तिमंदिरे"।
गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड 16) में इसका विस्तृत वर्णन है — भांडीरवन में स्वयं ब्रह्मा जी ने युगल का विवाह-संस्कार कराया। यह प्रसंग इसी पृष्ठ की कथा में तीसरे भाग के रूप में दिया गया है।
यह कथा ब्रज में और हिन्दी पुस्तकों में बहुत सुनाई जाती है, पर हमें इसका कोई जाँचने योग्य ग्रंथ-उद्धरण नहीं मिला — न गर्गसंहिता में, न ब्रह्मवैवर्त पुराण में। इसीलिए हमने इसे कथा में शास्त्र कहकर नहीं जोड़ा। इसे लोक-परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
यह भी बहुप्रचलित लोक-कथा है, जिसका कोई प्रामाणिक शास्त्रीय उद्धरण हमें नहीं मिला। हमारी नीति यही है कि जो सत्यापित न हो, उसे शास्त्र कहकर न परोसा जाए — इसलिए यहाँ केवल गर्गसंहिता वाली कथा दी गई है।
परंपरा में यह कथा, राधा चालीसा और राधा आरती — तीनों पढ़े जाते हैं। इसके अतिरिक्त "राधे राधे" नाम-जाप, राधा गायत्री मंत्र और राधिका अष्टोत्तर-शत-नाम स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है। ये सभी इसी साइट पर उपलब्ध हैं।
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