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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री शीतला माता आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता। आरोग्य की दाता तू, सब सुख की दाता॥

2

गर्दभ पर असवारी, कर कलश सुहाता। सूप-झाड़ू-नीम धारे, शीतल तन-दाता॥

3

ज्वर-रोग सब हरती, चेचक से बचाती। शरण पड़े की रक्षा, माँ तू कर जाती॥

4

बासी भोग लगावें, बसोड़ा तुझे प्यारा। भक्तन के घर रहती, सुख-शीतल धारा॥

5

शीतला माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। रोग-शोक सब मिटते, आरोग्य वह पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे शीतला माता, आपकी जय हो! आप आरोग्य की दात्री तथा सब सुख देने वाली हैं।
  2. गर्दभ (गधे) पर सवारी करती हुई, हाथ में सुन्दर कलश धारण किए; सूप, झाड़ू व नीम धारण कर शरीर को शीतलता देने वाली हैं।
  3. आप ज्वर व रोग हर लेती हैं और चेचक से बचाती हैं; हे माँ, शरण में आए हुए जनों की रक्षा करती हैं।
  4. भक्त आपको बासी भोग लगाते हैं, बसोड़ा (शीतला अष्टमी) आपको प्रिय है; आप भक्तों के घर सुख-शीतलता की धारा बनकर रहती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से शीतला माँ की यह आरती गाता है, उसके रोग-शोक मिट जाते हैं और वह आरोग्य प्राप्त करता है।

लाभ

  • आरोग्य की प्राप्ति होकर रोग-व्याधि से रक्षा होती है।
  • परिवार में शीतलता, सुख व शांति बनी रहती है।
  • चेचक, ज्वर आदि रोगों के भय से मुक्ति मिलती है।

कब करें पाठ

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) पर · चैत्र मास में · प्रातः पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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