वापस
लिपि:
॥ श्री ॥

श्री शीतला माता चालीसा

चालीसा · माँ दुर्गा

पाठ

गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ मातु गुणगान। शीतला माता वंदना, देहु आरोग्य-दान॥

1

जय शीतला माता सुखदाई। आरोग्य की तुम वरदाई॥

2

गर्दभ पर असवारी तुम्हारी। कर कलश-झाड़ू-नीम धारी॥

3

सूप शोभित तन शीतलकारी। रूप निरख भक्तन मन-हारी॥

4

ज्वर-रोग सब हरती माता। चेचक से तुम सबको बचाता॥

5

शीतलता तन-मन की दाता। जग की रक्षक तुम महतारी॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। रोग-शोक ता के मिट जावै॥

7

बासी भोग तुम्हें अति प्यारा। बसोड़ा पर्व जग-हितकारा॥

8

भक्तन के घर शीतलता लाती। सुख-आरोग्य घर में भर जाती॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

शीतला अष्टमी व्रत जो धारे। आरोग्य-सुख माँ ता पर वारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। आरोग्य-सुख सहज वह पावै॥

13

जल अर्पण जो श्रद्धा करते। आरोग्य-सुख वे घर भरते॥

14

रोग-महामारी दूर भगाती। शीतलता जग में फैलाती॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। शीतला-कृपा सहज वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। रोग-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥

17

सन्तान-रक्षा तुम्हीं करती। आरोग्य-दीर्घायु तुम भरती॥

18

जो श्रद्धा से माँ को ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह शीतला चालीसा गावै। रोग-शोक सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा शीतला की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। आरोग्य-सुख घर में लावैं॥

22

शीतला-कृपा जिन पर होई। रोग-व्याधि रहे न कोई॥

23

बसोड़ा पर्व जो जन धारे। एक दिन पूर्व भोग सँवारे॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत शीतला देवा॥

25

संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

27

दुर्गा-स्वरूपा तुम कल्याणी। रोग-नाशिनी तुम सुखदानी॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

रोग-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

शीतला-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

शीतला-धाम की महिमा भारी। आरोग्य-दायिनी जग-हितकारी॥

32

सन्तान-आरोग्य की दाता। परिवार-सुख की तुम विधाता॥

33

श्रद्धा-शीतलता का बल बताती। रोग-संकट सब दूर कराती॥

34

जो जन शीतला गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

शीतला-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

आरोग्य-सुख घर में आवै। भक्ति-शीतलता-संतोष बढ़ावै॥

37

रोग-संकट सब दूर हटावै। शीतला जो जन नित ध्यावै॥

38

आरोग्य-सुख वह सहज वह पावै। शीतला-नाम जो जन गावै॥

39

शीतलता-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-आरोग्य सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय शीतला महारानी। आरोग्य-दायिनी कल्याणी॥

शीतला चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। रोग-शोक सब दूर हो, आरोग्य-सुख घर आय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे शीतला माता, वंदना स्वीकार कर आरोग्य का दान दीजिए।
  2. हे सुख देने वाली शीतला माता, आपकी जय हो; आप आरोग्य का वरदान देने वाली हैं।
  3. गर्दभ (गधे) पर आपकी सवारी है; हाथों में कलश, झाड़ू व नीम धारण किए हैं।
  4. हाथ में सूप शोभित है व आप शीतलता देने वाली हैं; आपका रूप निरखकर भक्तों का मन हर जाता है।
  5. हे माता, आप ज्वर व रोग सब हर लेती हैं और चेचक से सबको बचाती हैं।
  6. आप तन-मन की शीतलता की दात्री हैं; हे माता, आप जगत की रक्षक हैं।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, उसके रोग-शोक मिट जाते हैं।
  8. आपको बासी भोग अति प्रिय है; बसोड़ा (शीतला अष्टमी) पर्व जगत का हित करने वाला है।
  9. आप भक्तों के घर शीतलता लाती हैं; घर में सुख व आरोग्य भर जाता है।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो शीतला अष्टमी का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर आरोग्य-सुख न्योछावर करती हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह सहज ही आरोग्य व सुख पाता है।
  14. जो श्रद्धा से जल अर्पण करते हैं, वे आरोग्य व सुख से घर भरते हैं।
  15. आप रोग व महामारी दूर भगाती हैं और जगत में शीतलता फैलाती हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही शीतला-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; रोग हरकर सुख प्रदान करती हैं।
  18. आप ही सन्तान की रक्षा करती हैं और आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करती हैं।
  19. जो श्रद्धा से माँ का ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह शीतला चालीसा गाता है, उसके रोग व शोक सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ शीतला की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में आरोग्य व सुख लाते हैं।
  23. जिन पर माँ शीतला की कृपा होती है, उनमें कोई रोग-व्याधि नहीं रहती।
  24. जो बसोड़ा पर्व मनाते हैं, वे एक दिन पूर्व ही भोग तैयार कर लेते हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ शीतला तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. आप दुर्गा-स्वरूपा कल्याणी हैं; रोग-नाशिनी व सुख देने वाली हैं।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन रोग-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन शीतला-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. शीतला-धाम की महिमा अति महान है; आप आरोग्य-दायिनी व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप सन्तान-आरोग्य की दात्री व परिवार-सुख की विधात्री हैं।
  34. आप श्रद्धा व शीतलता का बल बताती हैं और रोग-संकट सब दूर कराती हैं।
  35. जो जन शीतला माता के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन शीतला-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में आरोग्य व सुख आता है और भक्ति, शीतलता व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन शीतला माता का नित्य ध्यान करता है, वह रोग व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन शीतला-नाम गाता है, वह सहज ही आरोग्य व सुख पा लेता है।
  40. घर में शीतलता, सुख व शांति आती है और भक्ति व आरोग्य बढ़ता है।
  41. हे शीतला महारानी, आपकी जय हो; आप आरोग्य देने वाली कल्याणी हैं।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल शीतला चालीसा पढ़ता है, उसके रोग-शोक दूर होते हैं और घर में आरोग्य-सुख आता है।

लाभ

  • आरोग्य की प्राप्ति होकर रोग-व्याधि से रक्षा होती है।
  • परिवार में शीतलता, सुख व शांति बनी रहती है।
  • चेचक, ज्वर आदि रोगों के भय से मुक्ति मिलती है।
  • सन्तान की रक्षा व दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) पर · चैत्र मास में · प्रातः पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक शीतला माता चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

VedikMarg · निःशुल्क भक्ति संग्रह · vedikmarg.in