श्री शीतला माता चालीसा

śrī śītalā mātā cālīsā

Sheetla Mata Chalisa

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
41
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
शीतला अष्टमी (बसोड़ा); चैत्र मास
उद्देश्य:आरोग्य (Health)बच्चों की रक्षा (Protection of children)रोग-भय से मुक्ति (Freedom from fear of disease)
✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)

श्री शीतला माता चालीसा एक दोहे से आरंभ होकर उनतालीस चौपाइयों में चलती है — "जय-जय-जय शीतला भवानी, जय जग जननि सकल गुणखानी"। इसके केंद्र में एक कथा है: विस्फोटक नाम का दैत्य रोग बनकर घर-घर बालकों को खाता था, और माता ने मार्जनी और सूप लेकर उसे वश में किया। अंत में रचयिता अपना नाम देते हैं — रामसुन्दर।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: शीतला माता — चेचक व ज्वर से रक्षा करने वाली देवी; छाप "रामसुन्दर" — ककरा, प्रयाग के पूर्व

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री शीतला माता चालीसा
IASTśrī śītalā mātā cālīsā
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोतशीतला माता — चेचक व ज्वर से रक्षा करने वाली देवी; छाप "रामसुन्दर" — ककरा, प्रयाग के पूर्व
शुभ दिनशीतला अष्टमी (बसोड़ा); चैत्र मास
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा एक रोग की देवी की स्तुति है, और इसलिए इसकी भाषा घर की, आँगन की और बच्चे की चिंता की भाषा है।

रूप (चौपाई 6, 13, 26–27). "शुचि मार्जनी कलश करराजै" (6) — हाथ में झाड़ू और कलश; कथा में "करमें लिये मार्जनी सूपा" (13) — झाड़ू और सूप; "हो तुम दिगम्बर तनुधारी" (26); और वाहन गधा, जिसके पाँच नाम चौपाई 27 गिनाती है — रासभ, खर, वैशाखनंदन, गर्दभ, दूर्वा-निकंदन। यही रूप स्कन्द पुराण में बताए जाने वाले शीतलाष्टक के ध्यान-श्लोक का है — गधे पर आसीन, दिगम्बरा, मार्जनी-कलश धारिणी, सूप से अलंकृत।

कथा (चौपाई 10–17). विस्फोटक नाम का ज्वाला-रूप दैत्य "रोग रूप धरि बालक भक्षत" (11) — रोग बनकर बालकों को खाता था, और कोई उसे रोक न सका। तब माता ने अद्भुत रूप धरा, उसे पकड़ा और मूसल से मारा; उसने क्षमा माँगी और वचन दिया कि अब किसी के घर नहीं जाएगा — "भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं" (17)। "विस्फोटक" यहाँ चेचक का ही नाम है, और चौपाई 3 माता का काम इसी से जोड़ती है — "विस्फोटक से जलत शरीरा, शीतल करत हरत सब पीरा": जलते शरीर को जो शीतल करे, वही शीतला।

उपाय (चौपाई 19–20, 29–30). चालीसा सीधा कहती है कि जिस घर में यह भय हो, वहाँ देवी का भजन और शीतला का कलश सजाकर पाठ ही उपाय है — और गले के रोगों (गलका, गलगंड) के लिए भी "एक मातु जी का आराधन, और नहिं कोई है साधन" (30)।

छाप (चौपाई 36–37). अंत में रचयिता नाम और पता देते हैं — "भनत रामसुन्दर प्रभुदासा, तट प्रयाग से पूरब पासा" और "पुरी तिवारी मोर निवासा, ककरा गंगा तट दुर्वासा"। यही नाम और यही गाँव हमारी गणेश चालीसा ("भजत रामसुन्दर प्रभुदासा, जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा") और नवग्रह चालीसा ("ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी") में भी है — यानी ये एक ही कवि की रचनाएँ जान पड़ती हैं। यह पाठ के भीतर का संकेत है, बाहरी प्रमाण नहीं।

संपूर्ण चालीसा

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जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान। होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बलज्ञान॥

हे माता शीतला, आपकी जय हो! जो आपका ध्यान धरता है, उसका हृदय निर्मल और शीतल हो जाता है, और उसकी बुद्धि, बल व ज्ञान खिल उठते हैं।

जय-जय-जय शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणखानी॥

हे शीतला भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! हे जगत की जननी, हे सब गुणों की खान, आपकी जय हो।

गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित। पूरण शरदचन्द्र समसाजित॥

घर-घर में आपकी शक्ति विराजमान है; आप शरद ऋतु के पूर्ण चंद्रमा के समान सुशोभित हैं।

विस्फोटक से जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीरा॥

जब विस्फोटक (चेचक) से शरीर जलता है, तब आप उसे शीतल करती हैं और सारी पीड़ा हर लेती हैं।

मातु शीतला तव शुभनामा। सबके गाढ़े आवहिं कामा॥

हे माँ शीतला, आपका नाम मंगलमय है — गाढ़े (कठिन) समय में यह सबके काम आता है।

शोकहरी शंकरी भवानी। बाल-प्राणरक्षी सुख दानी॥

आप शोक हरने वाली, कल्याण करने वाली भवानी हैं; बालकों के प्राणों की रक्षा करने वाली और सुख देने वाली हैं।

शुचि मार्जनी कलश करराजै। मस्तक तेज सूर्य समराजै॥

आपके हाथों में पवित्र मार्जनी (झाड़ू) और कलश शोभा पाते हैं; मस्तक पर सूर्य के समान तेज है।

चौसठ योगिन संग में गावैं। वीणा ताल मृदंग बजावै॥

चौंसठ योगिनियाँ आपके संग गाती हैं और वीणा, ताल व मृदंग बजाती हैं।

नृत्य नाथ भैरो दिखरावैं। सहज शेष शिव पार ना पावैं॥

नाथ भैरव नृत्य दिखाते हैं; शेषनाग और शिव भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।

धन्य-धन्य धात्री महारानी। सुरनर मुनि तब सुयश बखानी॥

हे धात्री (पालन करने वाली) महारानी, आप धन्य हैं, धन्य हैं; देवता, मनुष्य और मुनि आपका सुयश बखानते हैं।

ज्वाला रूप महा बलकारी। दैत्य एक विस्फोटक भारी॥

(कथा) विस्फोटक नाम का एक भारी दैत्य था — ज्वाला-रूप और महाबलशाली।

घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत। रोग रूप धरि बालक भक्षत॥

वह घर-घर में घुस जाता, कोई रोक न पाता; रोग का रूप धरकर वह बालकों को खा जाता।

हाहाकार मच्यो जगभारी। सक्यो न जब संकट टारी॥

सारे जगत में भारी हाहाकार मच गया, जब कोई भी उस संकट को टाल न सका।

तब मैया धरि अद्भुत रूपा। करमें लिये मार्जनी सूपा॥

तब मैया ने अद्भुत रूप धारण किया — हाथ में मार्जनी (झाड़ू) और सूप लिए।

विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो। मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥

उन्होंने विस्फोटक को हाथ से पकड़ लिया और मूसल से अनेक प्रकार से प्रहार किया।

बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा। मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥

तब उसने बहुत प्रकार से विनती की — "मैया, मैंने भले-बुरे को कुछ नहीं पहचाना।"

अबनहिं मातु, काहुगृह जइहौं। जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहौं॥

"माँ, अब मैं किसी के घर नहीं जाऊँगा…" दूसरी पंक्ति प्रतियों में इसी रूप में है और उसका आशय स्पष्ट नहीं; दूसरी प्रचलित परंपरा में यह "जहँ अपवित्र वही घर रहि हो" है — यानी वह केवल अपवित्र घर में ही रहेगा।

भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं। विस्फोटक भयघोर नसइहैं॥

(और वचन दिया —) "ज्वर से भभकते शरीर शीतल हो जाएँगे, और विस्फोटक का घोर भय नष्ट हो जाएगा।"

श्री शीतलहिं भजे कल्याना। वचन सत्य भाषे भगवाना॥

श्री शीतला को भजने में ही कल्याण है — भगवान ने यह सत्य वचन कहा है।

विस्फोटक भय जिहि गृह भाई। भजै देवि कहँ यही उपाई॥

हे भाई, जिस घर में विस्फोटक का भय हो, वहाँ देवी का भजन ही उपाय है।

कलश शीतला का सजवावै। द्विज से विधिवत पाठ करावै॥

शीतला का कलश सजवाए और ब्राह्मण से विधिपूर्वक पाठ करवाए।

तुम्हीं शीतला, जग की माता। तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥

आप ही शीतला हैं, आप ही जगत की माता हैं; आप ही पिता हैं और आप ही जगत को सुख देने वाली हैं।

तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी। नमो नमामि शीतले देवी॥

आप ही जगत को धारण करने वाली और सुख देने वाली हैं — हे शीतला देवी, आपको बार-बार नमस्कार।

नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी। नमो-नमो जगतारणि तरणी॥

सुख करने वाली और दुख हरने वाली, आपको नमस्कार; जगत को तारने वाली नौका, आपको नमस्कार, नमस्कार।

नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी। दुखदारिद्रादिक कन्दिनी॥

तीनों लोकों में वंदित देवी, आपको नमस्कार, नमस्कार; आप दुख और दरिद्रता आदि का नाश करने वाली हैं (दूसरी परंपरा में यहाँ "निकंदिनी" है)।

श्री शीतला, शेढ़ला, महला। रुणलीह्युणनी मातु मंदला॥

श्री शीतला, शेढ़ला, महला, मंदला — यहाँ माता के लोक-प्रचलित नाम गिनाए गए हैं; "रुणलीह्युणनी" का रूप प्रतियों में जैसा छपा है, वैसा ही रखा गया है।

हो तुम दिगम्बर तनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी॥

आप दिगम्बर-रूप धारण करती हैं, और जिस वाहन पर सुशोभित हैं, उसके पाँच नाम हैं —

रासभ, खर बैशाख सुनन्दन। गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन॥

रासभ, खर, वैशाखनंदन, गर्दभ और दूर्वा की जड़ें खाने वाला — ये पाँचों गधे के ही नाम हैं, जो शीतला माता का वाहन है।

सुमिरत संग शीतला माई। जाहि सकल दुख दूर पराई॥

जो शीतला माता का स्मरण करता है, उसके सारे दुख दूर भाग जाते हैं।

गलका, गलगन्डादि जुहोई। ताकर मंत्र न औषधि कोई॥

जिसे गलका (गले का रोग) या गलगंड आदि हो जाए, उसके लिए न कोई मंत्र है न कोई औषधि —

एक मातु जी का आराधन। और नहिं कोई है साधन॥

— केवल माता जी की आराधना; उसके सिवा कोई और साधन नहीं।

निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय मन इच्छित फल पावै॥

जो निश्चय के साथ माता की शरण में आता है, वह निर्भय होकर मनचाहा फल पाता है।

कोढ़ी, निर्मल काया धारै। अन्धा, दृग-निज दृष्टि निहारै॥

कोढ़ी निर्मल काया पाता है, और अंधा अपनी ही आँखों से देखने लगता है।

वन्ध्या नारि पुत्र को पावै। जन्म दरिद्र धनी होई जावै॥

बाँझ स्त्री पुत्र पाती है, और जन्म का दरिद्र भी धनी हो जाता है।

मातु शीतला के गुण गावत। लखा मूक को छन्द बनावत॥

माता शीतला के गुण गाते हुए गूँगे को भी छंद रचते देखा गया है।

यामे कोई करै जनि शंका। जग में मैया का ही डंका॥

इसमें कोई शंका न करे — जगत में मैया का ही डंका बजता है।

भनत रामसुन्दर प्रभुदासा। तट प्रयाग से पूरब पासा॥

प्रभु का दास रामसुन्दर कहता है — (मेरा स्थान) प्रयाग के पूर्व में, (गंगा) तट के पास है।

पुरी तिवारी मोर निवासा। ककरा गंगा तट दुर्वासा॥

पुरी-तिवारी मेरा निवास है — ककरा, गंगा के तट पर, दुर्वासा (आश्रम) के पास।

अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत। मातु कृपा कौ बाट निहारत॥

अब देर न कीजिए, मैं आपको पुकार रहा हूँ; माँ, आपकी कृपा की बाट जोह रहा हूँ।

पड़ा द्वार तव आस लगाई। रक्षा करहु शीतला माई॥

आपकी आशा लगाए आपके द्वार पर पड़ा हूँ — हे शीतला माई, रक्षा कीजिए।

घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छइयां में झुलई, मइया पलना डार॥

हे घट-घट में बसने वाली शीतला, आपकी प्रभा शीतल है; मैया, अपनी शीतल छाया में पालना डालकर हमें झुलाइए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे माता शीतला, आपकी जय हो! जो आपका ध्यान धरता है, उसका हृदय निर्मल और शीतल हो जाता है, और उसकी बुद्धि, बल व ज्ञान खिल उठते हैं।
  2. हे शीतला भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! हे जगत की जननी, हे सब गुणों की खान, आपकी जय हो।
  3. घर-घर में आपकी शक्ति विराजमान है; आप शरद ऋतु के पूर्ण चंद्रमा के समान सुशोभित हैं।
  4. जब विस्फोटक (चेचक) से शरीर जलता है, तब आप उसे शीतल करती हैं और सारी पीड़ा हर लेती हैं।
  5. हे माँ शीतला, आपका नाम मंगलमय है — गाढ़े (कठिन) समय में यह सबके काम आता है।
  6. आप शोक हरने वाली, कल्याण करने वाली भवानी हैं; बालकों के प्राणों की रक्षा करने वाली और सुख देने वाली हैं।
  7. आपके हाथों में पवित्र मार्जनी (झाड़ू) और कलश शोभा पाते हैं; मस्तक पर सूर्य के समान तेज है।
  8. चौंसठ योगिनियाँ आपके संग गाती हैं और वीणा, ताल व मृदंग बजाती हैं।
  9. नाथ भैरव नृत्य दिखाते हैं; शेषनाग और शिव भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
  10. हे धात्री (पालन करने वाली) महारानी, आप धन्य हैं, धन्य हैं; देवता, मनुष्य और मुनि आपका सुयश बखानते हैं।
  11. (कथा) विस्फोटक नाम का एक भारी दैत्य था — ज्वाला-रूप और महाबलशाली।
  12. वह घर-घर में घुस जाता, कोई रोक न पाता; रोग का रूप धरकर वह बालकों को खा जाता।
  13. सारे जगत में भारी हाहाकार मच गया, जब कोई भी उस संकट को टाल न सका।
  14. तब मैया ने अद्भुत रूप धारण किया — हाथ में मार्जनी (झाड़ू) और सूप लिए।
  15. उन्होंने विस्फोटक को हाथ से पकड़ लिया और मूसल से अनेक प्रकार से प्रहार किया।
  16. तब उसने बहुत प्रकार से विनती की — "मैया, मैंने भले-बुरे को कुछ नहीं पहचाना।"
  17. "माँ, अब मैं किसी के घर नहीं जाऊँगा…" दूसरी पंक्ति प्रतियों में इसी रूप में है और उसका आशय स्पष्ट नहीं; दूसरी प्रचलित परंपरा में यह "जहँ अपवित्र वही घर रहि हो" है — यानी वह केवल अपवित्र घर में ही रहेगा।
  18. (और वचन दिया —) "ज्वर से भभकते शरीर शीतल हो जाएँगे, और विस्फोटक का घोर भय नष्ट हो जाएगा।"
  19. श्री शीतला को भजने में ही कल्याण है — भगवान ने यह सत्य वचन कहा है।
  20. हे भाई, जिस घर में विस्फोटक का भय हो, वहाँ देवी का भजन ही उपाय है।
  21. शीतला का कलश सजवाए और ब्राह्मण से विधिपूर्वक पाठ करवाए।
  22. आप ही शीतला हैं, आप ही जगत की माता हैं; आप ही पिता हैं और आप ही जगत को सुख देने वाली हैं।
  23. आप ही जगत को धारण करने वाली और सुख देने वाली हैं — हे शीतला देवी, आपको बार-बार नमस्कार।
  24. सुख करने वाली और दुख हरने वाली, आपको नमस्कार; जगत को तारने वाली नौका, आपको नमस्कार, नमस्कार।
  25. तीनों लोकों में वंदित देवी, आपको नमस्कार, नमस्कार; आप दुख और दरिद्रता आदि का नाश करने वाली हैं (दूसरी परंपरा में यहाँ "निकंदिनी" है)।
  26. श्री शीतला, शेढ़ला, महला, मंदला — यहाँ माता के लोक-प्रचलित नाम गिनाए गए हैं; "रुणलीह्युणनी" का रूप प्रतियों में जैसा छपा है, वैसा ही रखा गया है।
  27. आप दिगम्बर-रूप धारण करती हैं, और जिस वाहन पर सुशोभित हैं, उसके पाँच नाम हैं —
  28. रासभ, खर, वैशाखनंदन, गर्दभ और दूर्वा की जड़ें खाने वाला — ये पाँचों गधे के ही नाम हैं, जो शीतला माता का वाहन है।
  29. जो शीतला माता का स्मरण करता है, उसके सारे दुख दूर भाग जाते हैं।
  30. जिसे गलका (गले का रोग) या गलगंड आदि हो जाए, उसके लिए न कोई मंत्र है न कोई औषधि —
  31. — केवल माता जी की आराधना; उसके सिवा कोई और साधन नहीं।
  32. जो निश्चय के साथ माता की शरण में आता है, वह निर्भय होकर मनचाहा फल पाता है।
  33. कोढ़ी निर्मल काया पाता है, और अंधा अपनी ही आँखों से देखने लगता है।
  34. बाँझ स्त्री पुत्र पाती है, और जन्म का दरिद्र भी धनी हो जाता है।
  35. माता शीतला के गुण गाते हुए गूँगे को भी छंद रचते देखा गया है।
  36. इसमें कोई शंका न करे — जगत में मैया का ही डंका बजता है।
  37. प्रभु का दास रामसुन्दर कहता है — (मेरा स्थान) प्रयाग के पूर्व में, (गंगा) तट के पास है।
  38. पुरी-तिवारी मेरा निवास है — ककरा, गंगा के तट पर, दुर्वासा (आश्रम) के पास।
  39. अब देर न कीजिए, मैं आपको पुकार रहा हूँ; माँ, आपकी कृपा की बाट जोह रहा हूँ।
  40. आपकी आशा लगाए आपके द्वार पर पड़ा हूँ — हे शीतला माई, रक्षा कीजिए।
  41. हे घट-घट में बसने वाली शीतला, आपकी प्रभा शीतल है; मैया, अपनी शीतल छाया में पालना डालकर हमें झुलाइए।

लाभ

  • चेचक, ज्वर और त्वचा-रोगों के भय में — चालीसा स्वयं यही प्रसंग गाती है ("विस्फोटक से जलत शरीरा")।
  • बच्चों की रक्षा की कामना का पाठ — माता को "बाल-प्राणरक्षी" कहा गया है।
  • घर की शुद्धि और शीतलता का भाव — झाड़ू, सूप और कलश माता के ही चिह्न हैं।
  • फलश्रुति की चौपाइयाँ (31–33) निश्चय से शरण में आने वाले को निर्भय होकर मनचाहा फल पाने की बात कहती हैं।

कब करें पाठ

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) परचैत्र मास मेंघर में किसी को ज्वर या चेचक हो तबप्रातः पूजा में

पाठ विधि

माँ शीतला के चित्र के समक्ष जल से भरा कलश रखें और दीप जलाएँ — चालीसा स्वयं "कलश शीतला का सजवावै" (20) कहती है। शीतला अष्टमी (बसोड़ा) पर परंपरा से एक दिन पहले बना ठंडा भोजन भोग लगता है। पहले आरंभिक दोहा, फिर उनतालीस चौपाइयाँ, और अंत में "घट-घट वासी शीतला" दोहा पढ़ें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (39/39 श्लोक)
स्रोत परंपराdrikpanchang.com — शीतला चालीसा (आधार-पाठ) · divineaarti.com — श्री शीतला माता चालीसा · dharmyaatra.in — शीतला माता चालीसा · दूसरी परंपरा ("कमल" पाठ, 40 चौपाइयाँ) — bhaktibharat.com, bhaktitak.com, dharmsaar.com
रचयितारामसुन्दर (चौपाई 36 की छाप)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
सभी पाठ देखें

श्री शीतला माता चालीसा — सामान्य प्रश्न

संबंधित पर्व व व्रत

माँ दुर्गा भक्ति संग्रह

आरती, चालीसा, मंत्र, स्तोत्र, अष्टकम, सहस्रनाम और अन्य भक्ति पाठ