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॥ श्री ॥
शिव सहस्रनाम
सहस्रनाम · श्री शिव
पाठ
॥ ध्यानम् ॥ ॐ नमः शिवाय शान्ताय कारणत्रयहेतवे। निवेदयामि चात्मानं त्वं गतिः परमेश्वर॥
1
ॐ स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः प्रवरो वरदो वरः। सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः॥
आरंभिक नाम (नाम 1–32)
- स्थिरः — सदा स्थिर, अचल
- स्थाणुः — नित्य, अविचल स्तंभ-रूप
- प्रभुः — सर्वसमर्थ स्वामी
- भीमः — भयंकर (दुष्टों हेतु)
- प्रवरः — सर्वश्रेष्ठ
- वरदः — वर देने वाले
- वरः — श्रेष्ठ, वरण करने योग्य
- सर्वात्मा — समस्त की आत्मा
- सर्वविख्यातः — सर्वत्र विख्यात
- सर्वः — सर्वस्वरूप
- सर्वकरः — सब कुछ करने वाले
- भवः — संसार-रूप, उत्पत्ति के कारण
- जटी — जटाधारी
- चर्मी — चर्म (मृगचर्म) धारण करने वाले
- शिखी — शिखा (चूड़ा) धारण करने वाले
- खड्गी — खड्ग धारण करने वाले
- सर्वाङ्गः — सर्व अंगस्वरूप, पूर्ण
- सर्वभावनः — सबको उत्पन्न व भावित करने वाले
- हरः — पाप व दुःख हरने वाले
- हरिणाक्षः — मृग जैसे नेत्रों वाले
- सर्वभूतहरः — प्रलय में समस्त प्राणियों का संहार करने वाले
- प्रभुः — सर्वसमर्थ स्वामी
- प्रवृत्तिः — सृष्टि-प्रवृत्ति के कारण
- निवृत्तिः — निवृत्ति (विरक्ति) स्वरूप
- नियतः — नियमबद्ध, संयत
- शाश्वतः — नित्य, सनातन
- ध्रुवः — अचल, स्थिर
- श्मशानवासी — श्मशान में निवास करने वाले
- भगवान् — षड्ऐश्वर्य-सम्पन्न
- खचरः — आकाश में विचरण करने वाले
- गोचरः — इन्द्रिय-गोचर, सर्वत्र विचरने वाले
- अर्दनः — दुष्टों को पीड़ित करने वाले
रूप व लीला नाम (नाम 33–63)
- अभिवाद्यः — वंदना के योग्य
- महाकर्मा — महान कर्म करने वाले
- तपस्वी — महान तपस्वी
- भूतभावनः — प्राणियों का पालन व उत्पादन करने वाले
- उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः — उन्मत्त वेष में अपना स्वरूप छिपाने वाले
- सर्वलोकप्रजापतिः — समस्त लोकों के प्रजापति
- महारूपः — विशाल रूप वाले
- महाकायः — विशाल शरीर वाले
- वृषरूपः — धर्म (वृष) रूप वाले
- महायशाः — महान यशस्वी
- महात्मा — महान आत्मा
- सर्वभूतात्मा — समस्त प्राणियों की आत्मा
- विश्वरूपः — विश्व-रूप धारण करने वाले
- महाहनुः — विशाल हनु (ठोड़ी) वाले
- लोकपालः — लोकों के रक्षक
- अन्तर्हितात्मा — अन्तर्यामी, गूढ़ आत्मा
- प्रसादः — प्रसन्नता व कृपा स्वरूप
- हयगर्दभिः — अश्व व गर्दभ रूपों में भी व्याप्त
- पवित्रम् — परम पवित्र करने वाले
- महान् — महान, सर्वोपरि
- नियमः — नियमस्वरूप
- नियमाश्रितः — नियमों में स्थित रहने वाले
- सर्वकर्मा — समस्त कर्म करने वाले
- स्वयम्भूतः — स्वयं प्रकट होने वाले
- आदिः — सबके आदिकारण
- आदिकरः — आदि (प्रथम) सृष्टि करने वाले
- निधिः — समस्त निधियों के आधार
- सहस्राक्षः — सहस्र नेत्रों वाले
- विशालाक्षः — विशाल नेत्रों वाले
- सोमः — उमा-सहित (सोम) व चन्द्रस्वरूप
- नक्षत्रसाधकः — नक्षत्रों को नियंत्रित-साधने वाले
ग्रह व तप नाम (नाम 64–91)
- चन्द्रः — चन्द्रस्वरूप, आह्लादक
- सूर्यः — सूर्यस्वरूप, प्रकाशक
- शनिः — शनि-रूप
- केतुः — केतु-रूप, ध्वजस्वरूप
- ग्रहः — ग्रहस्वरूप, ग्रहण करने वाले
- ग्रहपतिः — ग्रहों के स्वामी
- वरः — श्रेष्ठ, वरदायी
- अत्रिः — अत्रि-रूप, त्रिगुणातीत
- अत्र्यानमस्कर्ता — अत्रि-पत्नी अनसूया द्वारा नमस्कृत
- मृगबाणार्पणः — यज्ञ-मृग पर बाण चढ़ाने वाले
- अनघः — निष्पाप, निर्दोष
- महातपाः — महान तप करने वाले
- घोरतपाः — उग्र तप करने वाले
- अदीनः — कभी दीन न होने वाले
- दीनसाधकः — दीनों का उद्धार करने वाले
- संवत्सरकरः — संवत्सर (काल) के रचयिता
- मन्त्रः — मन्त्रस्वरूप
- प्रमाणम् — प्रमाणस्वरूप, प्रमाता
- परमं तपः — परम तपस्वरूप
- योगी — योगयुक्त, महायोगी
- योज्यः — योग द्वारा प्राप्य
- महाबीजः — सृष्टि के महाबीज
- महारेताः — महान तेज (रेतस्) वाले
- महाबलः — महाबलशाली
- सुवर्णरेताः — स्वर्णमय तेज वाले
- सर्वज्ञः — सब कुछ जानने वाले
- सुबीजः — उत्तम बीजस्वरूप
- बीजवाहनः — सृष्टि-बीज को धारण-वहन करने वाले
गण व आयुध नाम (नाम 92–119)
- दशबाहुः — दस भुजाओं वाले
- अनिमिषः — पलक न झपकाने वाले, सदा जागृत
- नीलकण्ठः — नीले कण्ठ वाले (विषपान से)
- उमापतिः — उमा (पार्वती) के पति
- विश्वरूपः — विश्व-रूप
- स्वयंश्रेष्ठः — स्वयं ही सर्वश्रेष्ठ
- बलवीरः — बल व वीरता से युक्त
- बलः — बलस्वरूप
- गणः — गणस्वरूप, समूहरूप
- गणकर्ता — गणों के रचयिता
- गणपतिः — गणों के स्वामी
- दिग्वासाः — दिशाएँ ही जिनका वस्त्र (दिगम्बर)
- कामः — कामनाओं को पूर्ण करने वाले
- मन्त्रवित् — मन्त्रों के ज्ञाता
- परमः — परम, सर्वोच्च
- मन्त्रः — मन्त्रस्वरूप
- सर्वभावकरः — समस्त भावों के रचयिता
- हरः — समस्त पाप व दुःख हरने वाले
- कमण्डलुधरः — कमण्डलु धारण करने वाले
- धन्वी — धनुषधारी
- बाणहस्तः — हाथ में बाण धारण करने वाले
- कपालवान् — कपाल धारण करने वाले
- अशनी — वज्र धारण करने वाले
- शतघ्नी — शतघ्नी अस्त्र धारण करने वाले
- खड्गी — खड्गधारी
- पट्टिशी — पट्टिश (परशु-सदृश अस्त्र) धारण करने वाले
- आयुधी — समस्त आयुधों से युक्त
- महान् — महान, सर्वोपरि
तेज व रूप नाम (नाम 120–144)
- स्रुवहस्तः — हाथ में स्रुवा (यज्ञपात्र) धारण करने वाले
- सुरूपः — सुन्दर रूप वाले
- तेजः — तेजस्वरूप
- तेजस्करः — तेज प्रदान करने वाले
- निधिः — समस्त निधियों के आधार
- उष्णीषी — उष्णीष (शिरोवेष्टन) धारण करने वाले
- सुवक्त्रः — सुन्दर मुख वाले
- उदग्रः — अत्यंत उन्नत, उग्र
- विनतः — भक्तों के प्रति विनम्र
- दीर्घः — दीर्घ (विशाल) स्वरूप
- हरिकेशः — हरित (पिंगल) केश वाले
- सुतीर्थः — उत्तम तीर्थस्वरूप
- कृष्णः — आकर्षक, श्याम स्वरूप
- शृगालरूपः — शृगाल (सियार) रूप भी धारण करने वाले
- सिद्धार्थः — जिनके समस्त प्रयोजन सिद्ध हैं
- मुण्डः — मुण्डित-शिर रूप
- सर्वशुभङ्करः — सबका कल्याण करने वाले
- अजः — अजन्मा
- बहुरूपः — अनेक रूप धारण करने वाले
- गन्धधारी — दिव्य गंध धारण करने वाले
- कपर्दी — जटाजूट (कपर्द) धारण करने वाले
- ऊर्ध्वरेताः — ऊर्ध्वरेता, परम संयमी
- ऊर्ध्वलिङ्गः — ऊर्ध्वलिङ्ग स्वरूप
- ऊर्ध्वशायी — ऊर्ध्व (उन्नत) स्थिति में शयन करने वाले
- नभःस्थलः — आकाश ही जिनका स्थल है
रुद्र व काल नाम (नाम 145–177)
- त्रिजटी — तीन जटाओं वाले
- चीरवासाः — वल्कल (चीर) वस्त्र धारण करने वाले
- रुद्रः — दुःख व रुदन का नाश करने वाले
- सेनापतिः — देव-सेनाओं के नायक
- विभुः — सर्वव्यापी, समर्थ
- अहश्चरः — दिन में विचरण करने वाले
- नक्तञ्चरः — रात्रि में विचरण करने वाले
- तिग्ममन्युः — तीव्र क्रोध (मन्यु) वाले
- सुवर्चसः — उत्तम तेज (वर्चस्) वाले
- गजहा — गजासुर का वध करने वाले
- दैत्यहा — दैत्यों का नाश करने वाले
- कालः — कालस्वरूप
- लोकधाता — लोकों के धारक
- गुणाकरः — समस्त गुणों के आकर
- सिंहशार्दूलरूपः — सिंह व व्याघ्र रूप धारण करने वाले
- आर्द्रचर्माम्बरावृतः — गीले चर्म-वस्त्र से ढके हुए
- कालयोगी — काल के साथ योगयुक्त रहने वाले
- महानादः — महान नाद (ध्वनि) वाले
- सर्वकामः — समस्त कामनाओं के स्वरूप व दाता
- चतुष्पथः — चारों मार्गों (पुरुषार्थों) के स्वरूप
- निशाचरः — रात्रि में विचरने वाले
- प्रेतचारी — प्रेतों के बीच विचरण करने वाले
- भूतचारी — भूतगणों के साथ विचरने वाले
- महेश्वरः — महान ईश्वर
- बहुभूतः — अनेक भूतों के स्वामी
- बहुधरः — अनेक रूपों को धारण करने वाले
- स्वर्भानुः — स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले
- अमितः — अपरिमित, असीम
- गतिः — समस्त की परम गति
- नृत्यप्रियः — नृत्य के प्रेमी
- नित्यनर्तः — सदा नृत्य करने वाले
- नर्तकः — नटराज, नर्तक स्वरूप
- सर्वलालसः — सबमें रुचि रखने वाले, सर्वप्रिय
घोर व गम्भीर नाम (नाम 178–210)
- घोरः — भयंकर स्वरूप
- महातपाः — महान तपस्वी
- पाशः — पाश (बंधन) स्वरूप
- नित्यः — शाश्वत, नित्य
- गिरिरुहः — पर्वत पर स्थित रहने वाले
- नभः — आकाशस्वरूप
- सहस्रहस्तः — सहस्र हाथों वाले
- विजयः — विजयस्वरूप
- व्यवसायः — दृढ़ संकल्प स्वरूप
- अतन्द्रितः — आलस्यरहित, सदा सजग
- अधर्षणः — जिसे कोई पराभूत न कर सके
- धर्षणात्मा — दुष्टों का दमन करने वाले
- यज्ञहा — दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले
- कामनाशकः — कामदेव का नाश करने वाले
- दक्षयागापहारी — दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
- सुसहः — सबको सहने वाले, सहनशील
- मध्यमः — मध्यस्थ, सर्वत्र समभाव
- तेजोपहारी — शत्रुओं का तेज हरने वाले
- बलहा — दुष्टों का बल नष्ट करने वाले
- मुदितः — सदा प्रसन्न रहने वाले
- अर्थः — समस्त पुरुषार्थों के स्वरूप
- अजितः — अपराजेय
- अवरः — सबसे निकट, आश्रयदाता
- गम्भीरघोषः — गंभीर ध्वनि वाले
- गम्भीरः — गहन, अथाह
- गम्भीरबलवाहनः — गंभीर बल व वाहन वाले
- न्यग्रोधरूपः — वटवृक्ष-रूप
- न्यग्रोधः — वटवृक्ष स्वरूप, आश्रयदाता
- वृक्षपर्णस्थितिः — वृक्ष-पत्र पर स्थित रहने वाले
- विभुः — सर्वव्यापक
- सुतीक्ष्णदशनः — तीक्ष्ण दाँतों वाले
- महाकायः — विशाल शरीर वाले
- महाननः — विशाल मुख वाले
यज्ञ व तेज नाम (नाम 211–244)
- विष्वक्सेनः — सर्वत्र व्याप्त सेना वाले
- हरिः — पाप हरने वाले, हरि-रूप
- यज्ञः — यज्ञस्वरूप
- संयुगापीडवाहनः — युद्ध में पीड़ादायक वाहन वाले
- तीक्ष्णतापः — तीव्र ताप (तेज) वाले
- हर्यश्वः — हरित अश्वों वाले
- सहायः — सबके सहायक
- कर्मकालवित् — कर्म व काल के ज्ञाता
- विष्णुप्रसादितः — विष्णु द्वारा प्रसन्न किए गए
- यज्ञः — यज्ञस्वरूप
- समुद्रः — समुद्र के समान गंभीर
- वडवामुखः — वडवानल (समुद्राग्नि) रूप
- हुताशनसहायः — अग्नि के सहायक
- प्रशान्तात्मा — परम शांत आत्मा
- हुताशनः — अग्निस्वरूप, हवि का भोक्ता
- उग्रतेजाः — उग्र तेज वाले
- महातेजाः — महान तेजस्वी
- जन्यः — सबके उत्पादक
- विजयकालवित् — विजय के उपयुक्त काल को जानने वाले
- ज्योतिषामयनम् — ज्योतिर्गणों की गति-पथ स्वरूप
- सिद्धिः — सिद्धिस्वरूप
- सर्वविग्रहः — समस्त रूपों के धारक
- शिखी — शिखाधारी
- मुण्डी — मुण्डित शिर वाले
- जटी — जटाधारी
- ज्वाली — ज्वालामय, तेजस्वी
- मूर्तिजः — मूर्त रूप में प्रकट होने वाले
- मूर्धगः — सर्वोच्च (मस्तक) पर स्थित
- बली — बलवान
- वेणवी — वेणु (बाँसुरी/दण्ड) धारण करने वाले
- पणवी — पणव (ढोल) धारण करने वाले
- ताली — ताल (झाँझ) धारण करने वाले
- खली — खल (अधमों) का दमन करने वाले
- कालकटङ्कटः — काल को भी भयभीत करने वाले उग्र रूप
प्रजापति व गुहा नाम (नाम 245–279)
- नक्षत्रविग्रहमतिः — नक्षत्र-रूप शरीर व बुद्धि वाले
- गुणबुद्धिः — गुणों की बुद्धि-स्वरूप
- लयः — प्रलय (लय) स्वरूप
- गमः — सर्वत्र पहुँचने वाले
- प्रजापतिः — प्रजाओं के स्वामी
- विश्वबाहुः — विश्वव्यापी भुजाओं वाले
- विभागः — सबका विभाजन करने वाले
- सर्वगोमुखः — सब ओर मुख वाले
- विमोचनः — बंधनों से मुक्त करने वाले
- सुसरणः — सुगम शरण देने वाले
- हिरण्यकवचोद्भवः — स्वर्ण-कवच में प्रकट होने वाले
- मेढ्रजः — सृष्टि-बीज से प्रकट
- बलचारी — बलपूर्वक विचरण करने वाले
- महीचारी — पृथ्वी पर विचरण करने वाले
- स्रुतः — सर्वत्र विख्यात, श्रुत
- सर्वतूर्यनिनादी — समस्त वाद्यों की ध्वनि करने वाले
- सर्वातोद्यपरिग्रहः — समस्त वाद्य-यंत्रों को ग्रहण करने वाले
- व्यालरूपः — सर्प-रूप धारण करने वाले
- गुहावासी — गुहा (हृदय-गुफा) में निवास करने वाले
- गुहः — गूढ़, गुप्त स्वरूप
- माली — माला धारण करने वाले
- तरङ्गवित् — सृष्टि-तरंगों (गति) के ज्ञाता
- त्रिदशः — देवस्वरूप (तीनों अवस्थाओं में व्याप्त)
- त्रिकालधृक् — तीनों कालों को धारण करने वाले
- कर्म — समस्त कर्मों के स्वरूप
- सर्वबन्धविमोचनः — समस्त बंधनों से मुक्त करने वाले
- असुरेन्द्राणां बन्धनः — असुर-राजाओं को बाँधने वाले
- युधि शत्रुविनाशनः — युद्ध में शत्रुओं का नाश करने वाले
- साङ्ख्यप्रसादः — सांख्य-ज्ञान से प्रसन्न होने वाले
- दुर्वासाः — दुर्वासा-रूप, कठोर वस्त्र वाले
- सर्वसाधुनिषेवितः — समस्त साधुओं द्वारा सेवित
- प्रस्कन्दनः — शत्रुओं को परास्त करने वाले
- विभागज्ञः — विभाजन (अंश) के ज्ञाता
- अतुल्यः — जिसकी कोई तुलना नहीं
- यज्ञभागवित् — यज्ञ-भाग के ज्ञाता
सर्वधारी व बल नाम (नाम 280–305)
- सर्ववासः — सबमें निवास करने वाले
- सर्वचारी — सर्वत्र विचरण करने वाले
- दुर्वासाः — कठिन तप व वेष वाले
- वासवः — इन्द्र-रूप, ऐश्वर्यवान
- अमरः — अमर, मृत्युरहित
- हैमः — स्वर्णमय
- हेमकरः — स्वर्ण उत्पन्न करने वाले
- यज्ञः — यज्ञस्वरूप
- सर्वधारी — सबको धारण करने वाले
- धरोत्तमः — धारकों में सर्वोत्तम
- लोहिताक्षः — लाल नेत्रों वाले
- महाक्षः — विशाल नेत्रों वाले
- विजयाक्षः — विजयी नेत्रों वाले
- विशारदः — सर्व विद्याओं में निपुण
- सङ्ग्रहः — सबका संग्रह करने वाले
- निग्रहः — दुष्टों का निग्रह करने वाले
- कर्ता — समस्त कर्मों के कर्ता
- सर्पचीरनिवासनः — सर्प व वल्कल वस्त्र धारण करने वाले
- मुख्यः — प्रधान, सर्वप्रमुख
- अमुख्यः — गौण रूपों में भी व्याप्त
- देहः — समस्त देहों के स्वरूप
- काहलिः — रणवाद्य (काहल) स्वरूप
- सर्वकामदः — समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाले
- सर्वकामप्रसादः — समस्त कामनाओं में कृपा करने वाले
- सुबलः — उत्तम बल वाले
- बलरूपधृत् — बल-रूप को धारण करने वाले
सर्वद व वेग नाम (नाम 306–329)
- सर्वकामवरः — समस्त कामनाओं का श्रेष्ठ वर देने वाले
- सर्वदः — सब कुछ देने वाले
- सर्वतोमुखः — सब ओर मुख वाले
- आकाशनिर्विरूपः — आकाश के समान निराकार
- निपाती — दुष्टों पर आक्रमण करने वाले
- अवशः — किसी के वश में न आने वाले, स्वतंत्र
- खगः — आकाश में गमन करने वाले
- रौद्ररूपः — रौद्र (भयंकर) रूप वाले
- अंशुः — किरण-स्वरूप
- आदित्यः — सूर्य-स्वरूप
- बहुरश्मिः — अनेक किरणों वाले
- सुवर्चसी — उत्तम तेज वाले
- वसुवेगः — वसुओं के समान वेग वाले
- महावेगः — महान वेग वाले
- मनोवेगः — मन के समान वेगवान
- निशाचरः — रात्रि में विचरने वाले
- सर्ववासी — सबमें निवास करने वाले
- श्रियावासी — श्री (ऐश्वर्य) में निवास करने वाले
- उपदेशकरः — ज्ञान का उपदेश देने वाले
- अकरः — कर्मफल से अलिप्त, निष्क्रिय स्वरूप
- मुनिः — मननशील, मौनी
- आत्मनिरालोकः — आत्मा में ही दृष्टि रखने वाले
- सम्भग्नः — अहंकार आदि को भग्न करने वाले
- सहस्रदः — सहस्रों वरदान देने वाले
काम व सिद्धि नाम (नाम 330–356)
- पक्षी — पक्षी-रूप (गरुड़ आदि)
- पक्षरूपः — पक्ष (पंख) रूप धारण करने वाले
- अतिदीप्तः — अत्यंत प्रकाशमान
- विशाम्पतिः — प्रजा के स्वामी
- उन्मादः — उन्माद (परम आनन्द) स्वरूप
- मदनः — आह्लाद उत्पन्न करने वाले
- कामः — इच्छित फल देने वाले
- अश्वत्थः — अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष स्वरूप
- अर्थकरः — अर्थ (प्रयोजन) सिद्ध करने वाले
- यशः — यशस्वरूप
- वामदेवः — वामदेव-रूप, सुन्दर देव
- वामः — सुन्दर, प्रिय
- प्राग्दक्षिणः — पूर्व व दक्षिण दिशाओं में व्याप्त
- वामनः — वामन (लघु) रूप धारण करने वाले
- सिद्धयोगी — सिद्ध योगी
- महर्षिः — महान ऋषि
- सिद्धार्थः — जिनके प्रयोजन सिद्ध हैं
- सिद्धसाधकः — सिद्धि प्रदान करने वाले
- भिक्षुः — भिक्षु-रूप
- भिक्षुरूपः — भिक्षु का वेष धारण करने वाले
- विपणः — व्यापार-रहित, निःस्पृह
- मृदुः — कोमल स्वभाव वाले
- अव्ययः — अविनाशी
- महासेनः — महान सेना वाले
- विशाखः — विशाखा-रूप (कार्तिकेय से संबद्ध)
- षष्टिभागः — काल के षष्टि अंशों के स्वरूप
- गवाम्पतिः — गौओं व किरणों के स्वामी
नन्दी व ईशान नाम (नाम 357–389)
- वज्रहस्तः — हाथ में वज्र धारण करने वाले
- विष्कम्भी — सबको धारण-रोक रखने वाले
- चमूस्तम्भनः — शत्रु-सेना को स्तंभित करने वाले
- वृत्तावृत्तकरः — सृष्टि-चक्र को चलाने व रोकने वाले
- तालः — ताल (लय) स्वरूप
- मधुः — मधुर स्वभाव वाले
- मधुकलोचनः — मधुर नेत्रों वाले
- वाचस्पत्यः — वाणी के स्वामी
- वाजसनः — अन्न व बल प्रदान करने वाले
- नित्यमाश्रमपूजितः — सभी आश्रमों में नित्य पूजित
- ब्रह्मचारी — ब्रह्मचर्य में स्थित
- लोकचारी — लोकों में विचरण करने वाले
- सर्वचारी — सर्वत्र विचरने वाले
- विचारवित् — विवेक व विचार के ज्ञाता
- ईशानः — सर्वशासक, ईशान-रूप
- ईश्वरः — सर्वसमर्थ नियंता
- कालः — कालस्वरूप
- निशाचारी — रात्रि में विचरने वाले
- पिनाकवान् — पिनाक धनुष धारण करने वाले
- निमित्तस्थः — समस्त कारणों में स्थित
- निमित्तम् — सृष्टि के निमित्त-कारण
- नन्दिः — आनन्द-स्वरूप
- नन्दिकरः — आनन्द प्रदान करने वाले
- हरिः — दुःख हरने वाले
- नन्दीश्वरः — नन्दी के स्वामी
- नन्दी — आनन्दमय, नन्दी-रूप
- नन्दनः — सबको आनन्दित करने वाले
- नन्दिवर्धनः — आनन्द को बढ़ाने वाले
- भगहारी — भग (दक्ष-यज्ञ में) का हरण करने वाले
- निहन्ता — दुष्टों का संहार करने वाले
- कालः — कालस्वरूप, संहारक
- ब्रह्मा — ब्रह्मा-रूप, सृष्टिकर्ता
- पितामहः — समस्त लोकों के पितामह
लिङ्ग व ब्रह्म नाम (नाम 390–424)
- चतुर्मुखः — चार मुख वाले (ब्रह्मा-रूप)
- महालिङ्गः — महान लिङ्ग-स्वरूप
- चारुलिङ्गः — सुन्दर लिङ्ग-स्वरूप
- लिङ्गाध्यक्षः — समस्त लिङ्गों (चिह्नों) के अध्यक्ष
- सुराध्यक्षः — देवताओं के अध्यक्ष
- योगाध्यक्षः — योग के अध्यक्ष
- युगावहः — युगों को प्रवर्तित करने वाले
- बीजाध्यक्षः — सृष्टि-बीज के अध्यक्ष
- बीजकर्ता — सृष्टि-बीज के रचयिता
- अध्यात्मानुगतः — अध्यात्म-ज्ञान में अनुस्यूत
- बलः — बलस्वरूप
- इतिहासः — इतिहास-स्वरूप
- सकल्पः — कल्प (विधि) सहित
- गौतमः — गौतम-रूप ऋषि
- निशाकरः — चन्द्र-स्वरूप (रात्रि-कर्ता)
- दम्भः — दुष्टों के प्रति दम्भ-स्वरूप
- अदम्भः — निष्कपट, दम्भरहित
- वैदम्भः — दम्भियों का दमन करने वाले
- वश्यः — भक्तों के वश में रहने वाले
- वशकरः — सबको वश में करने वाले
- कलिः — कलह व संघर्ष के स्वरूप
- लोककर्ता — लोकों के रचयिता
- पशुपतिः — समस्त जीवों (पशुओं) के स्वामी
- महाकर्ता — महान कर्ता
- अनौषधः — जिनके लिए कोई औषधि-उपाय अपेक्षित नहीं
- अक्षरम् — अविनाशी अक्षर-ब्रह्म
- परमं ब्रह्म — परब्रह्म
- बलवत् — बलयुक्त
- शक्रः — सामर्थ्यवान (इन्द्र-रूप)
- नीतिः — नीति-स्वरूप
- अनीतिः — नीति से परे, मायातीत
- शुद्धात्मा — परम शुद्ध आत्मा
- शुद्धः — निर्मल, पवित्र
- मान्यः — सबके लिए माननीय
- गतागतः — आवागमन (गति-आगति) के स्वरूप
अग्नि व महाकाय नाम (नाम 425–473)
- बहुप्रसादः — बहुत प्रसन्न होने व कृपा करने वाले
- सुस्वप्नः — शुभ स्वप्न देने वाले
- दर्पणः — दर्पण के समान सब प्रतिबिंबित करने वाले
- अमित्रजित् — शत्रुओं को जीतने वाले
- वेदकारः — वेदों के रचयिता
- मन्त्रकारः — मन्त्रों के रचयिता
- विद्वान् — सर्वज्ञ विद्वान
- समरमर्दनः — युद्ध में शत्रुओं का मर्दन करने वाले
- महामेघनिवासी — महामेघों में निवास करने वाले
- महाघोरः — अत्यंत घोर रूप वाले
- वशीकरः — सबको वश में करने वाले
- अग्निः — अग्नि-स्वरूप
- ज्वालः — ज्वाला-स्वरूप
- महाज्वालः — महान ज्वाला वाले
- अतिधूम्रः — अत्यंत धूम्रवर्ण वाले
- हुतः — हवि (आहुति) स्वरूप
- हविः — यज्ञ-हवि स्वरूप
- वृषणः — धर्म व कामनाओं की वर्षा करने वाले
- शङ्करः — कल्याण करने वाले
- नित्यः — शाश्वत
- वर्चस्वी — तेजस्वी
- धूमकेतनः — धूम-ध्वज (अग्नि) वाले
- नीलः — नील-वर्ण (कण्ठ) वाले
- अङ्गलुब्धः — अपने स्वरूप में रमे रहने वाले
- शोभनः — अत्यंत शोभायमान
- निरवग्रहः — किसी से न रुकने वाले, स्वतंत्र
- स्वस्तिदः — कल्याण (स्वस्ति) देने वाले
- स्वस्तिभावः — मंगल-स्वरूप
- भागी — यज्ञ-भाग के अधिकारी
- भागकरः — सबको उनका भाग देने वाले
- लघुः — सूक्ष्म व सुगम स्वरूप
- उत्सङ्गः — सबका आश्रय (गोद) स्वरूप
- महाङ्गः — विशाल अंगों वाले
- महागर्भपरायणः — महान गर्भ (सृष्टि-मूल) में स्थित
- कृष्णवर्णः — श्याम वर्ण वाले
- सुवर्णः — स्वर्ण के समान कांति वाले
- इन्द्रियम् — समस्त देहधारियों की इन्द्रिय-शक्ति स्वरूप
- महापादः — विशाल चरणों वाले
- महाहस्तः — विशाल हाथों वाले
- महाकायः — विशाल शरीर वाले
- महायशाः — महान यश वाले
- महामूर्धा — विशाल मस्तक वाले
- महामात्रः — महान परिमाण वाले
- महानेत्रः — विशाल नेत्रों वाले
- निशालयः — रात्रि (तमस्) के आश्रय
- महान्तकः — महान अन्तक (मृत्यु को भी नियंत्रित करने वाले)
- महाकर्णः — विशाल कानों वाले
- महोष्ठः — विशाल ओष्ठों वाले
- महाहनुः — विशाल हनु वाले
अन्तरात्मा व महामुख नाम (नाम 474–501)
- महावक्षाः — विशाल वक्षःस्थल वाले
- महोरस्कः — विशाल छाती वाले
- अन्तरात्मा — सबकी अन्तरात्मा
- मृगालयः — मृगों के आश्रय (वनवासी)
- लम्बनः — सबको अवलंबन देने वाले
- लम्बितोष्ठः — लंबे ओष्ठ वाले
- महामायः — महामाया के स्वामी
- पयोनिधिः — समुद्र-स्वरूप, करुणा-निधि
- महादन्तः — विशाल दाँतों वाले
- महादंष्ट्रः — विशाल दाढ़ों वाले
- महाजिह्वः — विशाल जिह्वा वाले
- महामुखः — विशाल मुख वाले
- महानखः — विशाल नखों वाले
- महारोमा — विशाल रोमों वाले
- महाकेशः — घने केशों वाले
- महाजटः — विशाल जटाओं वाले
- प्रसन्नः — सदा प्रसन्न रहने वाले
- प्रसादः — कृपा-स्वरूप
- प्रत्ययः — ज्ञान व विश्वास के स्वरूप
- गिरिसाधनः — पर्वत (कैलास) को साधन बनाने वाले
- स्नेहनः — स्नेह (प्रेम) करने वाले
- अस्नेहनः — आसक्ति-रहित
- अजितः — अपराजेय
- महामुनिः — महान मननशील मुनि
- वृक्षाकारः — वृक्ष के समान स्थिर व आश्रयदाता
- वृक्षकेतुः — वृक्ष-ध्वज वाले
- अनलः — अग्नि-स्वरूप
- वायुवाहनः — वायु को वाहन बनाने वाले
वेद व प्रकाश नाम (नाम 502–535)
- गण्डली — गणसमूह से युक्त
- मेरुधामा — मेरु पर्वत को धाम बनाने वाले
- देवाधिपतिः — देवताओं के अधिपति
- अथर्वशीर्षः — अथर्ववेद ही जिनका शीर्ष
- सामास्यः — सामवेद ही जिनका मुख
- ऋक्सहस्रामितेक्षणः — सहस्र ऋचाओं रूपी असीम नेत्रों वाले
- यजुःपादभुजः — यजुर्वेद ही जिनके पाद-भुज
- गुह्यः — गूढ़, रहस्यमय
- प्रकाशः — स्वयं-प्रकाश स्वरूप
- जङ्गमः — चराचर में व्याप्त, गतिशील
- अमोघार्थः — जिनका प्रयोजन कभी निष्फल नहीं
- प्रसादः — कृपा-स्वरूप
- अभिगम्यः — सहज प्राप्य
- सुदर्शनः — सुन्दर दर्शन वाले
- उपकारः — सबका उपकार करने वाले
- प्रियः — सबके प्रिय
- सर्वः — सर्वस्वरूप
- कनकः — स्वर्ण के समान कांतिमान
- काञ्चनच्छविः — स्वर्ण-सी छवि वाले
- नाभिः — सृष्टि के केन्द्र-स्वरूप
- नन्दिकरः — आनन्द देने वाले
- भावः — सत्ता व भाव-स्वरूप
- पुष्करस्थपतिः — पुष्कर (आकाश/जल) के स्वामी
- स्थिरः — अचल, स्थिर
- द्वादशः — द्वादश आदित्यों के स्वरूप
- त्रासनः — दुष्टों को भयभीत करने वाले
- आद्यः — सबसे आदि
- यज्ञः — यज्ञ-स्वरूप
- यज्ञसमाहितः — यज्ञ में समाहित (स्थित)
- नक्तम् — रात्रि-स्वरूप
- कलिः — कलह-स्वरूप
- कालः — काल-स्वरूप
- मकरः — मकर-स्वरूप
- कालपूजितः — काल द्वारा भी पूजित
भस्म व शुचि नाम (नाम 536–571)
- सगणः — गणों सहित रहने वाले
- गणकारः — गणों के रचयिता
- भूतवाहनसारथिः — भूतगणों के वाहन व सारथि
- भस्मशयः — भस्म पर शयन करने वाले
- भस्मगोप्ता — भस्म से रक्षा करने वाले
- भस्मभूतः — भस्म-रूप (विभूति) धारण करने वाले
- तरुः — वृक्ष-स्वरूप, आश्रयदाता
- गणः — गण-स्वरूप
- लोकपालः — लोकों के रक्षक
- लोकः — समस्त लोक-स्वरूप
- महात्मा — महान आत्मा
- सर्वपूजितः — सबके द्वारा पूजित
- शुक्लः — श्वेत, शुद्ध स्वरूप
- त्रिशुक्लः — त्रिगुण से शुद्ध
- सम्पन्नः — समस्त ऐश्वर्य से सम्पन्न
- शुचिः — परम पवित्र
- भूतनिषेवितः — समस्त प्राणियों द्वारा सेवित
- आश्रमस्थः — समस्त आश्रमों में स्थित
- क्रियावस्थः — समस्त क्रियाओं में स्थित
- विश्वकर्ममतिः — विश्वकर्मा-सदृश बुद्धि वाले
- वरः — श्रेष्ठ, वरदायी
- विशालशाखः — विशाल शाखाओं (भुजाओं) वाले
- ताम्रोष्ठः — ताम्र-वर्ण ओष्ठ वाले
- अम्बुजालः — जल-समूह (सृष्टि) के आधार
- सुनिश्चलः — अत्यंत अचल, स्थिर
- कपिलः — कपिल-वर्ण (पिंगल) वाले
- कपिशः — भूरे-वर्ण वाले
- शुक्लः — श्वेत स्वरूप
- आयुः — आयु-स्वरूप (जीवन-शक्ति)
- परः — परम, सर्वोच्च
- अपरः — अपर (निकटतम) भी
- गन्धर्वः — गन्धर्व-स्वरूप
- अदितिः — अदिति-रूप, अखण्ड
- तार्क्ष्यः — गरुड़-स्वरूप
- सुविज्ञेयः — भक्तों द्वारा सहज जान लिए जाने वाले
- सुशारदः — शरद् ऋतु-सा निर्मल, ज्ञानप्रद
देव व वंश नाम (नाम 572–605)
- परश्वधायुधः — परशु (फरसा) आयुध धारण करने वाले
- देवः — देव-स्वरूप, द्योतमान
- अनुकारी — भक्तों का अनुसरण करने वाले
- सुबान्धवः — सबके सच्चे बन्धु
- तुम्बवीणः — तुम्बी की वीणा धारण करने वाले
- महाक्रोधः — दुष्टों पर महान क्रोध करने वाले
- ऊर्ध्वरेताः — परम संयमी (ऊर्ध्वरेता)
- जलेशयः — जल में शयन करने वाले
- उग्रः — उग्र स्वरूप
- वंशकरः — वंश (परम्परा) चलाने वाले
- वंशः — वंश-स्वरूप
- वंशनादः — वंशी (वेणु) का नाद करने वाले
- अनिन्दितः — निन्दा-रहित, निर्दोष
- सर्वाङ्गरूपः — समस्त अंगों में व्याप्त रूप वाले
- मायावी — माया के स्वामी
- सुहृत् — सबके हितैषी मित्र
- अनिलः — वायु-स्वरूप
- अनलः — अग्नि-स्वरूप
- बन्धनः — दुष्टों को बाँधने वाले
- बन्धकर्ता — संसार-बन्धन रचने वाले
- सुबन्धनविमोचनः — बन्धनों से सुगमता से मुक्त करने वाले
- यज्ञारिः — दक्ष-यज्ञ के शत्रु
- कामारिः — कामदेव के शत्रु
- महादंष्ट्रः — विशाल दाढ़ों वाले
- महायुधः — महान आयुध वाले
- बहुधानिन्दितः — अज्ञानियों द्वारा अनेक प्रकार से अनिन्दित
- शर्वः — संहारकर्ता
- शङ्करः — कल्याण करने वाले
- शङ्करः — सुख व मंगल देने वाले
- अधनः — धन-रहित (अपरिग्रही)
- अमरेशः — देवताओं के ईश
- महादेवः — देवों के देव, महादेव
- विश्वदेवः — समस्त विश्व के देव
- सुरारिहा — देव-शत्रुओं (असुरों) का नाश करने वाले
देवरूप व ग्रह नाम (नाम 606–643)
- अहिर्बुध्न्यः — अहिर्बुध्न्य (रुद्र) स्वरूप
- अनिलाभः — वायु के समान आभा वाले
- चेकितानः — सर्वज्ञ, चैतन्यमय
- हविः — यज्ञ-हवि स्वरूप
- अजैकपात् — अजैकपात् (रुद्र) स्वरूप
- कापाली — कपाल धारण करने वाले
- त्रिशङ्कुः — त्रिशंकु-रूप, तीन लोकों में स्थित
- अजितः — अपराजेय
- शिवः — परम कल्याणकारी
- धन्वन्तरिः — धन्वन्तरि-रूप (आरोग्यदाता)
- धूमकेतुः — धूम-ध्वज (अग्नि/केतु) स्वरूप
- स्कन्दः — स्कन्द (कार्तिकेय) स्वरूप
- वैश्रवणः — कुबेर-स्वरूप
- धाता — सबके धारक व विधाता
- शक्रः — इन्द्र-स्वरूप
- विष्णुः — विष्णु-स्वरूप, सर्वव्यापी
- मित्रः — सबके मित्र
- त्वष्टा — रूपों के निर्माता
- ध्रुवः — अचल, ध्रुव
- धरः — सबको धारण करने वाले
- प्रभावः — समस्त ऐश्वर्य के मूल
- सर्वगः — सर्वत्र व्याप्त
- वायुः — वायु-स्वरूप
- अर्यमा — अर्यमा (पितरों के अधिपति) स्वरूप
- सविता — सृष्टि के प्रेरक सूर्य
- रविः — सूर्य-स्वरूप
- उषङ्गुः — भक्तों के प्रति हितकारी
- विधाता — सृष्टि-विधान करने वाले
- मान्धाता — जगत् का मनन व धारण करने वाले
- भूतभावनः — प्राणियों का पालन-पोषण करने वाले
- विभुः — सर्वव्यापक
- वर्णविभावी — वर्णों (रूप-रंग) को प्रकट करने वाले
- सर्वकामगुणावहः — समस्त कामनाओं व गुणों को प्रदान करने वाले
- पद्मनाभः — नाभि-कमल वाले
- महागर्भः — महान गर्भ (सृष्टि-मूल) वाले
- चन्द्रवक्त्रः — चन्द्र-सा मुख वाले
- अनिलः — वायु-स्वरूप
- अनलः — अग्नि-स्वरूप
अन्तिम नाम (नाम 644–694)
- बलवान् — बलशाली
- उपशान्तः — परम शांत
- पुराणः — सनातन, अति प्राचीन
- पुण्यचञ्चुरी — पुण्य में निपुण व पुण्यदायी
- कुरुकर्ता — सत्कर्म करने व कराने वाले
- कुरुवासी — कुरुक्षेत्र आदि पवित्र स्थलों में निवास करने वाले
- कुरुभूतः — समस्त कर्मों के रूप में विद्यमान
- गुणौषधः — गुणों रूपी भवरोग की औषधि
- सर्वाशयः — सबके आश्रय व अन्तःकरण में स्थित
- दर्भचारी — कुश (दर्भ) पर विचरण करने वाले तपस्वी
- सर्वेषां प्राणिनां पतिः — समस्त प्राणियों के स्वामी
- देवदेवः — देवों के भी देव
- सुखासक्तः — परम आनन्द में स्थित
- सत् — सत्-स्वरूप (नित्य सत्ता)
- असत् — असत् (परिवर्तनशील) रूप में भी व्याप्त
- सर्वरत्नवित् — समस्त रत्नों (मूल्यवान तत्वों) के ज्ञाता
- कैलासगिरिवासी — कैलास पर्वत पर निवास करने वाले
- हिमवद्गिरिसंश्रयः — हिमालय पर्वत का आश्रय लेने वाले
- कूलहारी — तटों (मर्यादाओं) का संहार करने वाले
- कूलकर्ता — तट (आश्रय व मर्यादा) रचने वाले
- बहुविद्यः — अनेक विद्याओं के ज्ञाता
- बहुप्रदः — बहुत कुछ प्रदान करने वाले
- वणिजः — व्यापारी (कर्मफल का लेन-देन करने वाले) स्वरूप
- वर्धकी — सृष्टि का निर्माण-संवर्धन करने वाले
- वृक्षः — वृक्ष-स्वरूप, आश्रयदाता
- बकुलः — बकुल वृक्ष-स्वरूप
- चन्दनः — चन्दन के समान शीतल व सुगंधित
- छदः — सबको ढकने व आश्रय देने वाले
- सारग्रीवः — दृढ़ (सारयुक्त) ग्रीवा वाले
- महाजत्रुः — विशाल कंधों वाले
- अलोलः — चंचलता-रहित, स्थिरचित्त
- महौषधः — भवरोग की महान औषधि
- सिद्धार्थकारी — भक्तों के प्रयोजन सिद्ध करने वाले
- सिद्धार्थः — जिनके समस्त प्रयोजन सिद्ध हैं
- छन्दोव्याकरणोत्तरः — छन्द व व्याकरण में सर्वोत्तम
- सिंहनादः — सिंह-गर्जना करने वाले
- सिंहदंष्ट्रः — सिंह जैसी दाढ़ों वाले
- सिंहगः — सिंह पर गमन करने वाले
- सिंहवाहनः — सिंह को वाहन बनाने वाले
- प्रभावात्मा — प्रभावशाली आत्मा
- जगत्कालस्थालः — जगत् व काल के आधार
- लोकहितः — लोकों का हित करने वाले
- तरुः — वृक्ष-सा आश्रयदाता
- सारङ्गः — सार-तत्व में रमने वाले
- नवचक्राङ्गः — नौ चक्रों (शरीर-केन्द्रों) में व्याप्त
- केतुमाली — तेज-किरणों की माला वाले
- सभावनः — सबको भावित (उत्पन्न-पालित) करने वाले
- भूतालयः — समस्त प्राणियों के आश्रय
- भूतपतिः — समस्त भूतों के स्वामी
- अहोरात्रम् — दिन-रात (काल) के स्वरूप
- अनिन्दितः — निन्दा-रहित, परम पावन
धृति व गोपति नाम (नाम 695–734)
- सर्वभूतवाहिता — समस्त प्राणियों को धारण-वहन करने वाली शक्ति
- निलयः — सबके आश्रय-स्थान
- विभुः — सर्वव्यापक
- भवः — संसार के मूल
- अमोघः — अमोघ, कभी निष्फल न होने वाले
- संयतः — पूर्ण संयमी
- अश्वः — व्यापक व वेगवान अश्व-स्वरूप
- भोजनः — पालक, भोग्य प्रदान करने वाले
- प्राणधारणः — प्राणों के धारक
- धृतिमान् — धैर्यवान
- मतिमान् — बुद्धिमान
- दक्षः — कुशल, समर्थ
- सत्कृतः — सबके द्वारा सम्मानित
- युगाधिपः — युगों के अधिपति
- गोपालिः — गौ व पृथ्वी के पालक
- गोपतिः — गौओं व इन्द्रियों के स्वामी
- ग्रामः — समूह-स्वरूप
- गोचर्मवसनः — गोचर्म (मृगचर्म) वस्त्र वाले
- हरिः — पाप व दुःख हरने वाले
- हिरण्यबाहुः — स्वर्ण-भुजाओं वाले
- गुहापालः — गुहा (हृदय-गुफा) में प्रवेश करने वालों के रक्षक
- प्रकृष्टारिः — प्रबल शत्रुओं का नाश करने वाले
- महाहर्षः — महान आनन्द वाले
- जितकामः — काम को जीतने वाले
- जितेन्द्रियः — इन्द्रियों को जीतने वाले
- गान्धारः — गान्धार (संगीत-स्वर) स्वरूप
- सुवासः — सुगंधमय, उत्तम निवास वाले
- तपःसक्तः — तप में रत
- रतिः — आनन्द-स्वरूप
- नरः — सनातन पुरुष
- महागीतः — महान संगीत के प्रेमी
- महानृत्यः — महान नृत्य करने वाले
- अप्सरोगणसेवितः — अप्सरा-गणों द्वारा सेवित
- महाकेतुः — महान ध्वजा वाले
- महाधातुः — महान धातु व आधार
- नैकसानुचरः — अनेक शिखरों पर विचरने वाले
- चलः — गतिशील
- आवेदनीयः — जानने व प्रार्थना करने योग्य
- आदेशः — उपदेश व आदेश-स्वरूप
- सर्वगन्धसुखावहः — समस्त सुगंध व सुख देने वाले
तोरण व युक्त नाम (नाम 735–761)
- तोरणः — प्रवेश-द्वार (तोरण) स्वरूप
- तारणः — भवसागर से तारने वाले
- वातः — वायु-स्वरूप
- परिधिः — सबको घेरने वाली सीमा
- पतिः — स्वामी
- खेचरः — आकाशचारी
- संयोगः — योग व मिलन-स्वरूप
- वर्धनः — वृद्धि करने वाले
- वृद्धः — सबसे प्राचीन
- अतिवृद्धः — अत्यंत प्राचीन
- गुणाधिकः — गुणों में सबसे अधिक
- नित्यः — शाश्वत
- आत्मसहायः — स्वयं ही अपने सहायक (स्वावलंबी)
- देवासुरपतिः — देव व असुर दोनों के स्वामी
- पतिः — सर्वस्वामी
- युक्तः — योगयुक्त
- युक्तबाहुः — सुगठित भुजाओं वाले
- देवः — द्योतमान देव
- सुपर्वा — स्वर्ग में श्रेष्ठ (देवों में पूज्य)
- आषाढः — आषाढ (दण्डधारी मुनि) स्वरूप
- सुषाढः — सब कुछ सहने व जीतने वाले
- ध्रुवः — अचल, स्थिर
- हरिणः — हरित व हरिण-स्वरूप
- हरः — हरने वाले
- वपुः — दिव्य रूप-स्वरूप
- वसुश्रेष्ठः — वसुओं में श्रेष्ठ
- महापथः — महान मार्ग-स्वरूप
योग व तीर्थ नाम (नाम 762–785)
- शिरोहारी — (दक्ष/ब्रह्मा का) शिर हरने वाले
- विमर्शः — विवेक व विचार-स्वरूप
- सर्वलक्षणलक्षितः — समस्त शुभ लक्षणों से युक्त
- अक्षः — धुरी व इन्द्रिय-स्वरूप
- रथयोगी — रथ पर आरूढ़ योगी
- सर्वयोगी — समस्त योगों से युक्त
- महाबलः — महाबलशाली
- समाम्नायः — वेद-परम्परा स्वरूप
- असमाम्नायः — परम्परा से परे
- तीर्थदेवः — तीर्थों के देव
- महारथः — महान रथी
- निर्जीवः — प्राण-धर्म से परे (निर्विकार)
- जीवनः — जीवन देने वाले
- मन्त्रः — मन्त्र-स्वरूप
- शुभाक्षः — शुभ नेत्रों वाले
- बहुकर्कशः — दुष्टों के प्रति अत्यंत कठोर
- रत्नप्रभूतः — रत्नों के उद्भव-स्थान
- रत्नाङ्गः — रत्नमय अंगों वाले
- महार्णवनिपानवित् — महासागर रूपी जलाशय के ज्ञाता
- मूलम् — सबके मूल कारण
- विशालः — विशाल, व्यापक
- अमृतः — अमर
- व्यक्ताव्यक्तः — व्यक्त व अव्यक्त दोनों स्वरूप
- तपोनिधिः — तप के भण्डार
रूप व आयुध नाम (उत्तर) (नाम 786–821)
- आरोहणः — उन्नति (आरोहण) देने वाले
- अधिरोहः — आरोहण-स्वरूप
- शीलधारी — शील (सदाचार) धारण करने वाले
- महायशाः — महायशस्वी
- सेनाकल्पः — सेना-सदृश सामर्थ्य वाले
- महाकल्पः — महान कल्प (विधि) स्वरूप
- योगः — योग-स्वरूप
- युगकरः — युगों के रचयिता
- हरिः — हरने वाले
- युगरूपः — युग-रूप
- महारूपः — महान रूप वाले
- महानागहनः — महान नागों/शत्रुओं का नाश करने वाले
- वधः — दुष्टों के वध-स्वरूप
- न्यायनिर्वपणः — न्याय की स्थापना करने वाले
- पादः — सबके आधार (चरण) स्वरूप
- पण्डितः — परम ज्ञानी
- अचलोपमः — पर्वत के समान अचल
- बहुमालः — अनेक मालाओं वाले
- महामालः — महान माला वाले
- शशी — चन्द्र धारण करने वाले
- हरसुलोचनः — सुन्दर नेत्रों वाले हर
- विस्तारः — विस्तार-स्वरूप
- लवणः — समुद्र (लवण) स्वरूप, रसमय
- कूपः — गहन आश्रय-स्वरूप
- त्रियुगः — तीन युगों में प्रकट होने वाले
- सफलोदयः — सफल उदय वाले
- त्रिलोचनः — तीन नेत्रों वाले
- विषण्णाङ्गः — गंभीर (संहार-काल में क्षीण) अंगों वाले
- मणिविद्धः — मणियों से जड़े (आभूषित)
- जटाधरः — जटा धारण करने वाले
- बिन्दुः — नाद-बिन्दु स्वरूप
- विसर्गः — विसर्जन (प्रलय) स्वरूप
- सुमुखः — सुन्दर मुख वाले
- शरः — बाण-स्वरूप
- सर्वायुधः — समस्त आयुधों से युक्त
- सहः — सहनशील
गन्ध व लोक नाम (नाम 822–850)
- निवेदनः — आत्म-निवेदन (समर्पण) स्वरूप
- सुखाजातः — सुखपूर्वक प्रकट होने वाले
- सुगन्धारः — उत्तम गंध वाले
- महाधनुः — महान धनुष वाले
- गन्धपाली — गन्ध (पृथ्वी) के पालक
- भगवान् — षड्ऐश्वर्य-सम्पन्न
- सर्वकर्मोत्थानः — समस्त कर्मों के उत्थान व प्रेरक
- मन्थानः — मथने वाले (समुद्र-मंथन)
- बहुलः — विस्तृत, बहुल
- वायुः — वायु-स्वरूप
- सकलः — समस्त कलाओं से युक्त
- सर्वलोचनः — सब ओर नेत्रों वाले
- तलः — आधार-स्वरूप
- तालः — ताल (लय) स्वरूप
- करस्थाली — हाथ ही जिनका पात्र
- ऊर्ध्वसंहननः — ऊर्ध्व (दृढ़) गठन वाले
- महान् — महान
- छत्रम् — छत्र (रक्षक) स्वरूप
- सुच्छत्रः — उत्तम छत्र वाले
- विख्यातः — सर्वविख्यात
- लोकः — लोक-स्वरूप
- सर्वाश्रयः — सबके आश्रय
- क्रमः — क्रम (व्यवस्था) स्वरूप
- मुण्डः — मुण्डित-शिर रूप
- विरूपः — विचित्र रूप वाले
- विकृतः — नाना विकृत रूप धारण करने वाले
- दण्डी — दण्डधारी
- कुण्डी — कमण्डलु धारण करने वाले
- विकुर्वणः — नाना रूप रचने वाले
सहस्रमूर्धा व ब्रह्म नाम (नाम 851–884)
- हर्यक्षः — सिंह-नेत्र / पीत-नेत्र वाले
- ककुभः — दिशा-स्वरूप, श्रेष्ठ
- वज्रः — वज्र-स्वरूप
- शतजिह्वः — सौ जिह्वाओं वाले
- सहस्रपात् — सहस्र चरणों वाले
- सहस्रमूर्धा — सहस्र मस्तकों वाले
- देवेन्द्रः — देवों के इन्द्र
- सर्वदेवमयः — समस्त देवमय
- गुरुः — जगद्गुरु
- सहस्रबाहुः — सहस्र भुजाओं वाले
- सर्वाङ्गः — सर्व-अंगमय
- शरण्यः — शरण देने योग्य
- सर्वलोककृत् — समस्त लोकों के रचयिता
- पवित्रम् — परम पवित्र
- त्रिककुत् — तीन शिखरों/लोकों के स्वामी
- मन्त्रः — मन्त्र-स्वरूप
- कनिष्ठः — सूक्ष्मतम रूप में भी व्याप्त
- कृष्णपिङ्गलः — श्याम व पिंगल वर्ण वाले
- ब्रह्मदण्डविनिर्माता — ब्रह्मदण्ड (दिव्य अस्त्र) के निर्माता
- शतघ्नीपाशशक्तिमान् — शतघ्नी, पाश व शक्ति आयुध धारी
- पद्मगर्भः — कमल-गर्भ में स्थित
- महागर्भः — महान गर्भ (सृष्टि-मूल)
- ब्रह्मगर्भः — ब्रह्म को गर्भ में धारण करने वाले
- जलोद्भवः — जल से प्रकट होने वाले
- गभस्तिः — किरण-स्वरूप
- ब्रह्मकृत् — ब्रह्म (वेद व सृष्टि) के कर्ता
- ब्रह्मी — ब्रह्म-स्वरूप
- ब्रह्मविद् — ब्रह्म के ज्ञाता
- ब्राह्मणः — ब्रह्मनिष्ठ, ब्राह्मण-स्वरूप
- गतिः — परम गति
- अनन्तरूपः — अनन्त रूप वाले
- नैकात्मा — अनेक रूपों में विद्यमान आत्मा
- तिग्मतेजाः — तीव्र तेज वाले
- स्वयम्भूः — स्वयं प्रकट होने वाले
उमापति व वराह नाम (नाम 885–916)
- ऊर्ध्वगात्मा — ऊर्ध्वगामी आत्मा
- पशुपतिः — जीवों के स्वामी
- वातरंहाः — वायु के समान वेग वाले
- मनोजवः — मन के समान वेगवान
- चन्दनी — चन्दन-लेपित, शीतल
- पद्मनालाग्रः — कमल-नाल के अग्र पर स्थित
- सुरभ्युत्तरणः — गौ (सुरभि) का उद्धार करने वाले
- नरः — पुरुष-स्वरूप
- कर्णिकारमहास्रग्वी — कर्णिकार-पुष्पों की महामाला वाले
- नीलमौलिः — नील मुकुट वाले
- पिनाकधृत् — पिनाक धनुष धारण करने वाले
- उमापतिः — उमा के पति
- उमाकान्तः — उमा के प्रिय
- जाह्नवीधृक् — गंगा को धारण करने वाले
- उमाधवः — उमा के स्वामी
- वरः — श्रेष्ठ
- वराहः — वराह-स्वरूप
- वरदः — वर देने वाले
- वरेण्यः — वरण योग्य, श्रेष्ठ
- सुमहास्वनः — महान ध्वनि वाले
- महाप्रसादः — महान कृपालु
- दमनः — दमन करने वाले
- शत्रुहा — शत्रुओं का नाश करने वाले
- श्वेतपिङ्गलः — श्वेत व पिंगल वर्ण वाले
- पीतात्मा — पवित्र (पीत-वर्ण) आत्मा
- परमात्मा — परम आत्मा
- प्रयतात्मा — संयमित आत्मा
- प्रधानधृत् — प्रकृति (प्रधान) को धारण करने वाले
- सर्वपार्श्वमुखः — सब ओर मुख वाले
- त्र्यक्षः — तीन नेत्रों वाले
- धर्मसाधारणः — धर्म के समान सर्वाधार
- वरः — श्रेष्ठ, वरदायी
काल व कला नाम (नाम 917–950)
- चराचरात्मा — चर-अचर की आत्मा
- सूक्ष्मात्मा — सूक्ष्म आत्मा
- अमृतः — अमर
- गोवृषेश्वरः — वृषभ (नन्दी) के स्वामी
- साध्यर्षिः — साध्य-गण व ऋषि स्वरूप
- वसुः — वसु-स्वरूप, निवास-स्थान
- आदित्यः — आदित्य-स्वरूप
- विवस्वान् — सूर्य-स्वरूप
- सविता — प्रेरक सूर्य
- अमृतः — अमरस्वरूप
- व्यासः — विस्तारक, व्यास-स्वरूप
- सर्गः — सृष्टि-स्वरूप
- सुसङ्क्षेपः — संक्षेप (संहार) स्वरूप
- विस्तरः — विस्तार-स्वरूप
- पर्ययः — परिवर्तन व क्रम स्वरूप
- नरः — पुरुष-स्वरूप
- ऋतुः — ऋतु-स्वरूप
- संवत्सरः — वर्ष-स्वरूप
- मासः — मास-स्वरूप
- पक्षः — पक्ष-स्वरूप
- सङ्ख्यासमापनः — काल-गणना के समापक
- कला — कला (काल-अंश) स्वरूप
- काष्ठा — काष्ठा (काल-अंश) स्वरूप
- लवा — लव (काल-अंश) स्वरूप
- मात्रा — मात्रा (काल-अंश) स्वरूप
- मुहूर्तः — मुहूर्त-स्वरूप
- अहः — दिन-स्वरूप
- क्षपा — रात्रि-स्वरूप
- क्षणः — क्षण-स्वरूप
- विश्वक्षेत्रम् — विश्व-रूपी क्षेत्र
- प्रजाबीजम् — प्रजा (सृष्टि) के बीज
- लिङ्गम् — लिङ्ग (चिह्न व कारण) स्वरूप
- आद्यः — सबसे आदि
- निर्गमः — सबका उद्गम व लय-स्थान
द्वार व देवासुर नाम (नाम 951–982)
- सत् — सत्-स्वरूप (नित्य सत्ता)
- असत् — असत् (परिवर्तनशील) स्वरूप
- व्यक्तम् — व्यक्त (प्रकट) स्वरूप
- अव्यक्तम् — अव्यक्त (अप्रकट) स्वरूप
- पिता — सबके पिता
- माता — सबकी माता
- पितामहः — सबके पितामह
- स्वर्गद्वारम् — स्वर्ग के द्वार
- प्रजाद्वारम् — प्रजा (सृष्टि) के द्वार
- मोक्षद्वारम् — मोक्ष के द्वार
- त्रिविष्टपम् — त्रिलोक व स्वर्ग-स्वरूप
- निर्वाणम् — निर्वाण (परम शांति) स्वरूप
- ह्लादनः — आह्लाद देने वाले
- ब्रह्मलोकः — ब्रह्मलोक-स्वरूप
- परा गतिः — परम गति
- देवासुरविनिर्माता — देव व असुरों के निर्माता
- देवासुरपरायणः — देव-असुर दोनों के आश्रय
- देवासुरगुरुः — देव-असुरों के गुरु
- देवः — देव
- देवासुरनमस्कृतः — देव-असुरों द्वारा नमस्कृत
- देवासुरमहामात्रः — देव-असुरों में महान
- देवासुरगणाश्रयः — देव-असुर गणों के आश्रय
- देवातिदेवः — देवों से भी श्रेष्ठ देव
- देवर्षिः — देवर्षि-स्वरूप
- देवासुरवरप्रदः — देव-असुरों को वर देने वाले
- देवासुरेश्वरः — देव-असुरों के ईश्वर
- विश्वः — विश्व-स्वरूप
- देवासुरमहेश्वरः — देव-असुरों के महेश्वर
- सर्वदेवमयः — समस्त देवमय
- अचिन्त्यः — चिन्तन से परे
- देवतात्मा — देवताओं की आत्मा
- आत्मसम्भवः — स्वयं से प्रकट होने वाले
अन्तिम दिव्य नाम (नाम 983–1037)
- उद्भित् — सृष्टि को अंकुरित-प्रकट करने वाले
- त्रिविक्रमः — तीन पगों में जगत् नापने वाले
- वैद्यः — भवरोग के वैद्य
- विरजः — रजोगुण-रहित, निर्मल
- नीरजः — मल-रहित, शुद्ध
- अमरः — अमर
- ईड्यः — स्तुति के योग्य
- हस्तीश्वरः — गजेन्द्र व हाथियों के स्वामी
- व्याघ्रः — व्याघ्र-स्वरूप
- देवसिंहः — देवों में सिंह
- नरर्षभः — नरों में श्रेष्ठ (वृषभ)
- विबुधः — परम ज्ञानी, देव
- अग्रवरः — सर्वश्रेष्ठ
- सूक्ष्मः — सूक्ष्म
- सर्वदेवः — समस्त देव-स्वरूप
- तपोमयः — तपोमय
- सुयुक्तः — भली-भाँति योगयुक्त
- शोभनः — शोभायमान
- वज्री — वज्रधारी
- प्रासानां प्रभवः — प्रास (अस्त्रों) के उद्गम
- अव्ययः — अविनाशी
- गुहः — गूढ़, गुहा में स्थित
- कान्तः — कमनीय, सुन्दर
- निजः — नित्य स्व-स्वरूप
- सर्गः — सृष्टि-स्वरूप
- पवित्रम् — पवित्र करने वाले
- सर्वपावनः — सबको पवित्र करने वाले
- शृङ्गी — शृंग (शिखर/सींग) धारण करने वाले
- शृङ्गप्रियः — शृंग (पर्वत-शिखर) के प्रेमी
- बभ्रुः — भरण करने वाले, भूरे वर्ण
- राजराजः — राजाओं के राजा
- निरामयः — रोग-रहित
- अभिरामः — परम सुन्दर, आनन्ददायी
- सुरगणः — देवगण-स्वरूप
- विरामः — विश्राम (लय) स्वरूप
- सर्वसाधनः — समस्त साधनों के स्वरूप
- ललाटाक्षः — ललाट में नेत्र वाले
- विश्वदेवः — विश्व के देव
- हरिणः — हरिण-स्वरूप
- ब्रह्मवर्चसः — ब्रह्मतेज से युक्त
- स्थावराणां पतिः — स्थावर (अचल) जगत् के स्वामी
- नियमेन्द्रियवर्धनः — नियम व इन्द्रिय-संयम को बढ़ाने वाले
- सिद्धार्थः — जिनके प्रयोजन सिद्ध हैं
- सिद्धभूतार्थः — जिनके समस्त अर्थ सिद्ध हो चुके हैं
- अचिन्त्यः — अचिन्त्य
- सत्यव्रतः — सत्य-व्रती
- शुचिः — पवित्र
- व्रताधिपः — व्रतों के अधिपति
- परं ब्रह्म — परब्रह्म
- भक्तानां परमा गतिः — भक्तों की परम गति
- विमुक्तः — पूर्णतः मुक्त
- मुक्ततेजाः — अबाधित तेज वाले
- श्रीमान् — श्री-सम्पन्न
- श्रीवर्धनः — श्री (ऐश्वर्य) बढ़ाने वाले
- जगत् — सम्पूर्ण जगत्-स्वरूप
अर्थ (हिन्दी)
- शांत स्वरूप, सृष्टि-स्थिति-संहार तीनों के कारण भगवान शिव को नमस्कार। हे परमेश्वर, मैं अपने आत्मा को आपको समर्पित करता हूँ; आप ही मेरी गति हैं।
- आरंभिक श्लोक: शिव स्थिर, स्थाणु (अचल), प्रभु, भीम, श्रेष्ठ, वरदाता व वरण-योग्य हैं; वे सबकी आत्मा, सर्वविख्यात, सर्वस्वरूप, सब कुछ करने वाले व संसार के कारण हैं। (इसी क्रम में आगे एक हजार नाम आते हैं।)
लाभ
- मन को शांति व निर्भयता प्राप्त होती है।
- रोग, भय व बाधाओं का नाश माना जाता है।
- शिव के प्रति गहन भक्ति व आध्यात्मिक उन्नति होती है।
कब करें पाठ
सोमवार व प्रदोष काल में · महाशिवरात्रि पर · प्रातः पूजा में
स्रोत
रचयिता: वेदव्यास (महाभारत). महाभारत — अनुशासन पर्व (शिव सहस्रनाम स्तोत्र)
