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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री सूर्य देव आरती
आरती · श्री सूर्य देव
पाठ
1
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हे दिवाकर भगवान। जगत के पालनकर्ता, तुम हो दीनदयाल॥
2
सप्त अश्व रथ साजे, महा तेज प्रचण्ड। रूप तुम्हारा निरखत, हरषत सब ब्रह्माण्ड॥
3
देव दनुज नर मुनिगण, करते सब गुणगान। रोग-शोक हर लेते, देते जीवन-दान॥
4
तुम हो त्रिभुवन स्वामी, तेज पुंज भगवान। आरोग्य धन देते, हरते सब अज्ञान॥
5
सूर्यदेव की आरती, जो जन नित्य गावे। मन इच्छित फल पावे, रोग दूर भगावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे सूर्य भगवान, दिवाकर! आपकी जय हो। आप जगत के पालनकर्ता तथा दीनों पर दया करने वाले हैं।
- सात अश्वों वाले रथ पर सुशोभित, महान प्रचण्ड तेज वाले; आपका रूप देखकर समस्त ब्रह्माण्ड हर्षित होता है।
- देव, दानव, मनुष्य व मुनिगण सभी आपका गुणगान करते हैं; आप रोग-शोक हर लेते हैं तथा जीवन-दान देते हैं।
- आप तीनों लोकों के स्वामी व तेज के पुंज हैं; आरोग्य रूपी धन देते हैं तथा समस्त अज्ञान का नाश करते हैं।
- जो भक्त सूर्यदेव की यह आरती नित्य गाता है, वह मन-इच्छित फल पाता है तथा उसके रोग दूर हो जाते हैं।
लाभ
- आरोग्य, तेज व जीवनशक्ति में वृद्धि होती है।
- आत्मविश्वास, यश व नेतृत्व-क्षमता बढ़ती है।
- कुंडली में सूर्य की स्थिति बलवान होती है।
कब करें पाठ
प्रातः सूर्योदय के समय · रविवार को · मकर संक्रांति व रथ सप्तमी पर · अर्घ्य देने के पश्चात
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
