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लिपि:
॥ श्री ॥
सूर्य वैदिक मंत्र — आ कृष्णेन रजसा
मंत्र · श्री सूर्य देव
पाठ
1
ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
अर्थ (हिन्दी)
- सविता देव अंधकारमय अंतरिक्ष-पथ में भ्रमण करते हुए अमर (देवताओं) और मर्त्य (मनुष्यों) — दोनों को उनके स्थान पर स्थापित करते हैं; और स्वर्णमय रथ पर सवार होकर समस्त भुवनों को देखते हुए चलते हैं।
लाभ
- नवग्रह उपासना में सूर्य का प्रतिष्ठित वैदिक मंत्र माना जाता है।
- परंपरा में इसे आरोग्य, तेज व आत्मविश्वास से जोड़ा जाता है।
- सूर्य-दोष शांति व नवग्रह हवन में पाठ विहित बताया जाता है।
- रविवार व्रत तथा अर्घ्य-दान के साथ जप प्रचलित है।
कब करें पाठ
सूर्योदय के समय अर्घ्य देते हुए · रविवार को · मकर संक्रांति व रथ सप्तमी पर · नवग्रह शांति व सूर्य-दोष निवारण में
स्रोत
रचयिता: कण्व घौर (ऋग्वेद प्रथम मण्डल). ऋग्वेद 1.35.2 — सविता सूक्त, ऋषि कण्व घौर · यजुर्वेद 33.43 व 34.31 — वही ऋचा · नवग्रह ग्रह-शांति की वैदिक मंत्र परंपरा
