समय
45 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
रविवार, मकर संक्रांति व रथ सप्तमी
उद्देश्य:स्वास्थ्य (Health)तेज व आत्मविश्वास (Vitality)सूर्य दोष शांति (Remedy)
✓ संपूर्ण वैदिक मंत्र
सूर्य का वैदिक मंत्र “आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च…” ऋग्वेद 1.35.2 की सविता-ऋचा है, जो यजुर्वेद में भी आती है। इसमें सविता देव अंधकारमय अंतरिक्ष में भ्रमण करते हुए, स्वर्ण-रथ पर समस्त लोकों को देखते हुए चलते हैं। नवग्रह उपासना में यही सूर्य का वैदिक मंत्र है।
FAQ
सूर्य वैदिक मंत्र — आ कृष्णेन रजसा — सामान्य प्रश्न
"ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥" — यह ऋग्वेद 1.35.2 की सविता-ऋचा है और यजुर्वेद (33.43, 34.31) में भी आती है। नवग्रह उपासना में यही सूर्य का वैदिक मंत्र है।
हाँ, दोनों अलग ऋचाएँ हैं — यद्यपि दोनों का सम्बोधन "सविता" ही है। गायत्री मंत्र ऋग्वेद 3.62.10 है और गायत्री छंद में है; यह ऋचा ऋग्वेद 1.35.2 है और सविता सूक्त की है।
शुद्ध पाठ "निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च" है। "निवेशयन्" अर्थात् स्थापित करते हुए, और "मर्त्य" अर्थात् मरणशील (मनुष्य)। कुछ प्रचलित स्रोतों में मुद्रण-दोष से "विनेशयन्" व "मत्र्यं" छपा मिलता है।
"कृष्ण" अर्थात् काला और "रजस्" अर्थात् अंतरिक्ष — यानी अंधकारमय अंतरिक्ष-पथ। यह रात्रि का वह भाग है जिसमें सूर्य अदृश्य रहते हुए भी गतिशील माने जाते हैं।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष या स्फटिक माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय सूर्योदय काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए रविवार, मकर संक्रांति व रथ सप्तमी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय सूर्योदय काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — सूर्योदय के समय अर्घ्य देते हुए; रविवार को; मकर संक्रांति व रथ सप्तमी पर; नवग्रह शांति व सूर्य-दोष निवारण में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह वैदिक मंत्र है। परंपरा में वैदिक मंत्रों को गुरु के मुख से, शुद्ध उच्चारण तथा स्वर सहित सीखना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इनमें स्वर का भी विधान होता है। बिना गुरु के केवल भाव सहित पाठ करने का निषेध नहीं कहा जाता, किंतु विधिवत जप के लिए सीखना उत्तम बताया गया है।
पर्व
