समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
रविवार, मकर संक्रांति व रथ सप्तमी
उद्देश्य:स्वास्थ्य (Health)तेज व आत्मविश्वास (Vitality)सूर्य दोष शांति (Remedy)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् — यह सूर्य का ध्यान मंत्र है और वेदव्यास कृत नवग्रह स्तोत्रम् का प्रथम श्लोक है। इसमें सूर्य को जपा-पुष्प के समान लाल, कश्यप-वंशज, महातेजस्वी, अंधकार के शत्रु और पापनाशक कहकर प्रणाम किया जाता है। सूर्य अर्घ्य के साथ इसका पाठ प्रचलित है।
FAQ
जपाकुसुमसंकाशं — सूर्य ध्यान मंत्र — सामान्य प्रश्न
यह नवग्रह स्तोत्रम् का प्रथम श्लोक है, जो सूर्य को समर्पित है। स्तोत्र का कोलोफ़ोन "इति श्रीवेदव्यासविरचितम् नवग्रहस्तोत्रम्" इसे वेदव्यास की रचना बताता है।
"जपा" अर्थात् गुड़हल का फूल, जो गहरा लाल होता है। सूर्य का वर्ण उसी के समान बताया गया है — और यही कारण है कि सूर्य-पूजा में लाल पुष्प व लाल वस्त्र का विधान परंपरा में बताया जाता है।
नहीं। सूर्य का वैदिक मंत्र "ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो…" है, जो ऋग्वेद 1.35.2 की सविता-ऋचा है; इस संग्रह में उसका अलग पृष्ठ है। यह श्लोक नवग्रह स्तोत्र का प्रणाम-मंत्र है, वैदिक ऋचा नहीं।
"कश्यप ऋषि के वंशज"। पुराण-परंपरा में सूर्य को कश्यप ऋषि और अदिति का पुत्र कहा गया है — इसी से उनका नाम "आदित्य" भी पड़ा।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष या स्फटिक माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय सूर्योदय काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए रविवार, मकर संक्रांति व रथ सप्तमी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय सूर्योदय काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — सूर्योदय के समय अर्घ्य देते हुए; रविवार को; मकर संक्रांति व रथ सप्तमी पर; नवग्रह शांति व सूर्य-दोष निवारण में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
पर्व
