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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री स्वामिनारायण आरती

आरती

पाठ

1

जय सद्‌गुरु स्वामी, (प्रभु) जय सद्‌गुरु स्वामी, सहजानंद दयाळुं, बळवंत बहुनामी॥

2

चरणसरोज तमारां, वंदुं कर जोडी, चरणे चित्त धर्याथी, दुःख नाख्यां तोडी॥

3

नारायण सुखदाता, द्विजकुळ तनुधारी, पामर पतित उद्धार्यां, अगणित नरनारी॥

4

नित्य नित्य नौतम लीला, करता अविनाशी, अडसठ तीरथ चरणे, कोटि गया काशी॥

5

पुरुषोत्तम प्रगटनुं, जे दर्शन करशे, काळ करमथी छूटी, कुटुंब सहित तरशे॥

6

आ अवसर करुणानिधि, करुणा बहु कीधी, मुक्तानंद कहे मुक्ति, सुगम करी सीधी॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे सद्गुरु स्वामी, हे प्रभु, आपकी जय हो! हे दयालु सहजानंद, आप बलवान और अनेक नामों वाले हैं।
  2. मैं हाथ जोड़कर आपके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ; चरणों में चित्त धरने से (आपने) दुख तोड़कर फेंक दिए।
  3. सुख देने वाले नारायण ने ब्राह्मण-कुल में देह धारण की, और अगणित पामर और पतित नर-नारियों का उद्धार किया।
  4. अविनाशी (प्रभु) नित्य-नित्य नई लीलाएँ करते हैं; उनके चरणों में अड़सठ तीर्थ हैं — करोड़ों गया और काशी।
  5. जो प्रकट पुरुषोत्तम के दर्शन करेगा, वह काल और कर्म (के बंधन) से छूटकर कुटुंब सहित (भवसागर से) तर जाएगा।
  6. इस अवसर पर करुणा के सागर ने बहुत करुणा की; मुक्तानंद कहते हैं — (उन्होंने) मुक्ति सुगम और सीधी कर दी।

लाभ

  • सहजानंद स्वामी के चरणों में शरणागति — "चरणे चित्त धर्याथी, दुःख नाख्यां तोडी"।
  • मुक्ति का भरोसा — "मुक्तानंद कहे मुक्ति, सुगम करी सीधी"।

कब करें पाठ

नित्य संध्या आरती में · स्वामिनारायण जयंती (रामनवमी) पर · एकादशी पर

स्रोत

रचयिता: मुक्तानंद स्वामी (अंतिम पद की छाप). anirdesh.com — कीर्तन मुक्तावली 1-154: જય સદ્‌ગુરુ સ્વામી (आधार-पाठ, गुजराती) · knowledgemandir.com — સ્વામિનારાયણ આરતી (જય સદગુરુ સ્વામી)

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