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लिपि:
॥ श्री ॥
तर्पण मंत्र — पितृ तर्पण के मंत्र
मंत्र
पाठ
1
आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम् ॥
2
पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । अक्षन् पितरः । अमीमदन्त पितरः । अतीतृपन्त पितरः । पितरः शुन्धध्वम् ॥
3
असावेतत्ते तिलोदकं ये चात्र त्वानु याँश्च त्वमनु तस्मै ते स्वधा ॥
4
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् तृप्यतु ॥
अर्थ (हिन्दी)
- आवाहन — मेरे पितर आएँ और जल की यह अंजलि ग्रहण करें। (गरुड पुराण आचार 213.129 — नाभि तक जल में खड़े होकर, पितरों का ध्यान करते हुए।)
- स्वधा ग्रहण करने वाले पितरों को स्वधा और नमस्कार; पितामहों को स्वधा और नमस्कार; प्रपितामहों को स्वधा और नमस्कार। पितरों ने ग्रहण किया, पितर प्रसन्न हुए, पितर तृप्त हुए। हे पितरो, (अपने हाथ) शुद्ध करो। (शुक्ल यजुर्वेद 19.36)
- ("असौ" की जगह पिता का नाम लें) हे (नाम)! यह तिल-मिला जल तुम्हारे लिए है — और उनके लिए भी जो यहाँ तुम्हारे साथ हैं, और जिनके साथ तुम हो। तुम्हें स्वधा। फिर पितामह और प्रपितामह के नाम से भी वैसे ही दें। (गोभिल गृह्यसूत्र 4.2.34–35)
- ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक — यह सारा जगत तृप्त हो। (गरुड पुराण आचार 213.135 — यह कहकर तीन अंजलि देना "संक्षेप-तर्पण" है।)
लाभ
- तर्पण का पूरा शास्त्रीय क्रम — आवाहन से संक्षेप-तर्पण तक — एक जगह, स्रोत सहित।
- पिता, पितामह, प्रपितामह — तीनों पीढ़ियों का नाम से स्मरण।
- अंतिम मंत्र में सारे जगत की तृप्ति की कामना — स्मरण का सबसे व्यापक रूप।
- मंत्र छोटे हैं; तिल, जल और कुश जैसी सामान्य सामग्री से घर पर भी किया जा सकता है।
कब करें पाठ
प्रतिदिन स्नान के बाद (गरुड पुराण 213.128) — विशेषकर पितृ पक्ष में · श्राद्ध के दिन — प्रायः श्राद्ध के अंत में · अमावस्या को · पूर्वजों की पुण्यतिथि पर
स्रोत
शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि) 19.36 — उव्वट व महीधर भाष्य सहित · शतपथ ब्राह्मण 12.8.1.6 · वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश · गरुड पुराण आचारकाण्ड 213.128–135 · वाचस्पत्यम् (कार्ष्णाजिनि) · गोभिल गृह्यसूत्र 4.2.34–35 · भारद्वाज गृह्यसूत्र · नित्यकर्मविधि (स्नान-विधि)
