श्री तिरुपति बालाजी चालीसा
पाठ
तिरुपति की महिमा बड़ी, गाते वेद-पुरान। कलियुग में प्रत्यक्ष हैं, वेंकटेश भगवान॥
जय श्रीवेंकटेश करुणा कर। श्रीनिवास स्वामी सुख सागर॥
जय जय तिरुपति धाम निवासी। अखिल लोक स्वामी अविनाशी॥
जय श्रीवेंकटेश भगवाना। करुणा सागर कृपा निधाना॥
सप्तगिरि शेषाचल वासी। तिरुपति पर्वत शिखर निवासी॥
श्री दर्शन महिमा अति भारी। आते नित लाखों नर नारी॥
देव ऋषि गंधर्व जगाते। सुप्रभात सब मिल कर गाते॥
सकल सृष्टि के प्राणी आवें। सुप्रभात शुभ दर्शन पावें॥
विश्वरूप दर्शन सुखकारी। श्रीविग्रह की शोभा भारी॥
वेद पुराण शास्त्र यश गावें। अति दुर्लभ दर्शन बतलावें॥
जिन पर प्रभु कृपा करते हैं। उनको यह दर्शन मिलते हैं॥
महा विष्णु श्रीमन्नारायण। भक्तों के कारज सारायण॥
शेषाचल पर सदा विराजे। शंख चक्र कर सुन्दर साजे॥
अभय हस्त की मुद्रा प्यारी। सफल कामना करती सारी॥
वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला। शरणागत रक्षक प्रतिपाला॥
श्रीवैकुण्ठ लोक निज तज कर। श्रीस्वामी पुष्करिणी तट पर॥
भक्त कार्य करने को आये। कलियुग में प्रत्यक्ष कहाये॥
स्वामी तीर्थ पुण्यप्रद पावन। स्नान मात्र सब पाप नशावन॥
जो इसमें करते हैं स्नान। उनको मिलता पुण्य महान॥
प्रथम यहां दर्शन अधिकारी। श्रीवराह स्वामी सुखकारी॥
पहले दर्शन इनका करके। भू-वराह को प्रथम सुमिर के॥
श्रीवेंकटेश चरण चित धरना। श्रीनिवास के दर्शन करना॥
वेंकटेश सम इस कलियुग में। अन्य देव नहीं इस जग में॥
पहले भी नहीं हुआ कहीं है। आगे हो यह सत्य नहीं है॥
‘ओऽम्’ नम: श्रीवेंकटबाला। भक्तजनों के तुम रखवाला॥
भक्त जहां अगणित नित आते। सोना चांदी नकद चढ़ाते॥
श्रद्धा से कर हुण्डी सेवा। सेवा से पाते सब मेवा॥
श्रीनिवास की सुन्दर मूर्ति। मनोकामना करती पूर्ति॥
दर्शन कर हर्षित सब तन मन। सुन्दर सुखद सुशोभित दर्शन॥
दिव्य मधुर सुन्दर प्रसाद है। ‘लड्डू’ अमृत दिव्य स्वाद है॥
महाप्रसाद दिव्य जो पाते। उनके पाप सभी कट जाते॥
महिमा अति प्रसाद की भारी। मिटती भव बाधायें सारी॥
केशर-चंदन युत चरणामृत। दिव्य सुगन्धित प्रभु का तीरथ॥
तीर्थ-प्रसाद भक्त जो पाते। आवागमन मुक्त हो जाते॥
‘चौरासी’ में फिर नहीं आते। जो प्रसाद ‘लड्डू’ का पाते॥
सुख संपत्ति वांछित फल पावे। फिर वैकुण्ठ लोक में जावे॥
‘वें’ का अर्थ पाप बतलाया। ‘कट’ का अर्थ काट दे माया॥
माया पाप काटने वाला। वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला॥
श्रीनिवास विष्णु अवतारा। महिमा जानत है जग सारा॥
जो यह श्री चालीसा गावे। सकल पदारथ जग के पावे॥
शब्द पुष्प श्री चरण चढ़ाकर। करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’॥
जय जय श्रीतिरुपति-पति श्रीनिवास भगवान। करो सिद्ध सब कामना स्वामी कृपा निधान॥
अर्थ (हिन्दी)
- तिरुपति की महिमा बड़ी है, जिसे वेद और पुराण गाते हैं; कलियुग में वेंकटेश भगवान यहाँ प्रत्यक्ष विराजते हैं।
- हे करुणा करने वाले श्रीवेंकटेश, आपकी जय हो; हे श्रीनिवास स्वामी, आप सुख के सागर हैं।
- हे तिरुपति धाम में निवास करने वाले, जय हो, जय हो; आप समस्त लोकों के स्वामी और अविनाशी हैं।
- हे श्रीवेंकटेश भगवान, आपकी जय हो; आप करुणा के सागर और कृपा के निधान हैं।
- आप सप्तगिरि और शेषाचल पर वास करते हैं; तिरुपति पर्वत के शिखर पर निवास करते हैं।
- आपके दर्शन की महिमा अत्यंत बड़ी है; नित्य लाखों नर-नारी यहाँ आते हैं।
- देवता, ऋषि और गंधर्व आपको जगाते हैं; सब मिलकर सुप्रभातम् गाते हैं।
- समस्त सृष्टि के प्राणी यहाँ आते हैं और सुप्रभात के शुभ दर्शन पाते हैं।
- आपका विश्वरूप दर्शन सुख देने वाला है; आपके श्रीविग्रह की शोभा बहुत बड़ी है।
- वेद, पुराण और शास्त्र आपका यश गाते हैं और आपके दर्शन को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं।
- जिन पर प्रभु कृपा करते हैं, उन्हीं को ये दर्शन मिलते हैं।
- आप महाविष्णु श्रीमन्नारायण हैं; भक्तों के कार्य सिद्ध करने वाले नारायण हैं।
- आप सदा शेषाचल पर विराजते हैं; हाथों में शंख और चक्र सुंदर सजते हैं।
- आपके अभय-हस्त की मुद्रा प्यारी है, जो सारी कामनाएँ सफल कर देती है।
- हे वेंकटेश प्रभु, हे तिरुपति बाला — आप शरण में आए की रक्षा और पालन करते हैं।
- आप अपना श्रीवैकुण्ठ लोक छोड़कर श्री स्वामी पुष्करिणी के तट पर आ बसे —
- भक्तों का कार्य करने के लिए आए, और कलियुग में प्रत्यक्ष कहलाए।
- स्वामी तीर्थ पुण्य देने वाला और पावन है; उसमें स्नान मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
- जो इसमें स्नान करते हैं, उन्हें महान पुण्य मिलता है।
- यहाँ पहले दर्शन के अधिकारी सुख देने वाले श्रीवराह स्वामी हैं।
- पहले उनके दर्शन करके, भू-वराह का प्रथम स्मरण करके —
- फिर श्रीवेंकटेश के चरणों में चित्त धरना और श्रीनिवास के दर्शन करना चाहिए।
- इस कलियुग में वेंकटेश के समान इस जगत में कोई और देव नहीं।
- पहले भी कहीं ऐसा नहीं हुआ, और आगे होगा — यह भी सत्य नहीं।
- "ॐ नमः श्रीवेंकटबाला" — आप भक्तजनों के रखवाले हैं।
- यहाँ अगणित भक्त नित्य आते हैं और सोना, चाँदी तथा नकद चढ़ाते हैं।
- जो श्रद्धा से हुण्डी में सेवा करते हैं, वे उस सेवा से सब मेवा पाते हैं।
- श्रीनिवास की सुंदर मूर्ति सबकी मनोकामना पूरी करती है।
- दर्शन करके तन-मन हर्षित हो जाते हैं; दर्शन सुंदर, सुखद और सुशोभित है।
- यहाँ का प्रसाद दिव्य, मधुर और सुंदर है — "लड्डू" अमृत जैसे दिव्य स्वाद का है।
- जो यह दिव्य महाप्रसाद पाते हैं, उनके सभी पाप कट जाते हैं।
- प्रसाद की महिमा अत्यंत बड़ी है; इससे भव की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।
- केसर-चंदन युक्त चरणामृत — यह प्रभु का दिव्य सुगंधित तीर्थ है।
- जो भक्त तीर्थ और प्रसाद पाते हैं, वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
- जो "लड्डू" का प्रसाद पाते हैं, वे फिर चौरासी लाख योनियों में नहीं आते।
- वे सुख, सम्पत्ति और मनचाहा फल पाते हैं, और फिर वैकुण्ठ लोक को जाते हैं।
- "वें" का अर्थ पाप बताया गया है और "कट" का अर्थ है काट देना —
- अर्थात माया और पाप को काटने वाले वेंकटेश प्रभु ही तिरुपति बाला हैं।
- श्रीनिवास विष्णु के अवतार हैं; उनकी महिमा सारा जगत जानता है।
- जो यह श्री चालीसा गाता है, वह जगत के सकल पदार्थ पा लेता है।
- शब्दों के पुष्प श्रीचरणों में चढ़ाकर भक्त ‘गदाधर’ यह प्रार्थना करता है।
- हे तिरुपति के पति श्रीनिवास भगवान, आपकी जय हो, जय हो; हे कृपा-निधान स्वामी, सब कामनाएँ सिद्ध कीजिए।
लाभ
- तिरुमला की दर्शन-विधि चालीसा के भीतर ही — पुष्करिणी स्नान, पहले वराह स्वामी, फिर वेंकटेश (चौपाई 17–21)।
- हुण्डी सेवा और लड्डू प्रसाद की महिमा — ग्यारह चौपाइयाँ इन्हीं पर (25–35)।
- "वेंकट" नाम की व्युत्पत्ति — वें = पाप, कट = काट देना (चौपाई 36–37)।
- शनिवार और एकादशी का पाठ; तिरुपति यात्रा से पहले भी पढ़ा जाता है।
कब करें पाठ
शनिवार को · एकादशी के व्रत में · पुरट्टासी (भाद्रपद–आश्विन) मास में · तिरुपति यात्रा से पहले या लौटकर
स्रोत
रचयिता: अज्ञात (छाप: गदाधर — चौपाई 40). hindunidhi.com — श्री तिरुपति बाला जी चालीसा (आधार-पाठ) · sanatangyaan.com — श्री तिरुपति बालाजी चालीसा · aaradhika.com — श्रीवेंकटेश्वर चालीसा · रचयिता की छाप — चौपाई 40 "करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’" · ⚠️ मेहंदीपुर बालाजी (हनुमान) की चालीसा अलग रचना है; वह यहाँ नहीं ली गई।
