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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री तिरुपति बालाजी चालीसा

चालीसा · श्री विष्णु

पाठ

गणपति-गुरु-पद वंदना, सुमिर हृदय हरि-नाम। बालाजी चालीसा कहूँ, करहु भक्त सुखधाम॥

1

जय बालाजी वेंकटरमणा। भक्तन के तुम कष्ट-निवारणा॥

2

विष्णु-स्वरूप वेंकटेश्वर। तिरुमला-गिरि के तुम ईश्वर॥

3

सप्त-गिरि पर धाम सुहाये। भक्त-गण नित दरस को धाये॥

4

शंख-चक्र कर में सोहे। श्याम-वर्ण छवि मन मोहे॥

5

पद्मावती-संग शोभा पाते। कलियुग में जग को सुख देते॥

6

जो जन तुमको नित ही ध्यावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

7

मन्नत-पूरक नाम तुम्हारा। केश-दान जग में जयकारा॥

8

बालाजी-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित दरस को घेरा॥

9

जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥

10

एकादशी व्रत जो जन धारे। सकल मनोरथ प्रभु ते सारे॥

11

दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करते बेड़ा पारा॥

12

जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥

13

लड्डू-प्रसाद भोग जो पाते। हरि-कृपा वे सब घर भरते॥

14

रोग-दोष सब दूर भगाते। सुख-समृद्धि घर में लाते॥

15

जो नर निशदिन ध्यान लगावै। बालाजी-कृपा सहज वह पावै॥

16

मंगल-कारी विघ्न-विनाशन। भय-हारी तुम सुख-साधन॥

17

ऋण-मुक्ति का वर तुम देते। भक्तन के सब संकट हरते॥

18

जो श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥

19

जो यह बालाजी चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥

20

नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा बालाजी की होई॥

21

मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥

22

बालाजी-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥

23

भगवान विष्णु तुम जग-पालक। भव-सागर से तुम तारक॥

24

जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत बालाजी देवा॥

25

संकट-मोचन नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥

26

महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥

27

कलियुग में तुम सुलभ कहाये। जो जन शरण तुम्हारी आये॥

28

घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥

29

दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥

30

बालाजी-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥

31

तिरुमला-धाम की महिमा भारी। भव-तारण तुम जग-हितकारी॥

32

मोक्ष-मार्ग जग को दिखलाते। शरणागत को पार लगाते॥

33

जग-पालक तुम परम कल्याणी। भव-तारण तुम सुख-दानी॥

34

जो जन बालाजी गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥

35

बालाजी-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥

36

सुख-शान्ति-समृद्धि घर में आवै। भक्ति-श्रद्धा-संतोष बढ़ावै॥

37

भय-संकट सब दूर हटावै। बालाजी जो जन नित ध्यावै॥

38

मोक्ष-मार्ग वह सहज वह पावै। बालाजी-नाम जो जन गावै॥

39

हरि-कृपा-सुख घर में लावै। भक्ति-शान्ति सब बढ़ावै॥

40

जय जय जय बालाजी भयहारी। रक्षा करो प्रभु शरण हमारी॥

बालाजी चालीसा सरल, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट सब दूर हो, हरि-कृपा घर आय॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. गणपति व गुरु के चरणों की वंदना कर, हृदय में हरि-नाम का स्मरण कर मैं बालाजी चालीसा कहता हूँ; हे प्रभु, भक्तों को सुख-धाम दीजिए।
  2. हे बालाजी वेंकटरमण, आपकी जय हो; आप भक्तों के कष्ट दूर करने वाले हैं।
  3. आप विष्णु-स्वरूप वेंकटेश्वर हैं; तिरुमला पर्वत के आप ईश्वर हैं।
  4. सात पर्वतों (सप्त-गिरि) पर आपका धाम सुहावना है; भक्तगण नित्य दर्शन को दौड़े आते हैं।
  5. हाथों में शंख व चक्र सुशोभित हैं; श्याम-वर्ण आपकी छवि मन को मोह लेती है।
  6. देवी पद्मावती के संग आप शोभा पाते हैं और कलियुग में जगत को सुख देते हैं।
  7. जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  8. आपका नाम मन्नत पूर्ण करने वाला है; मनोकामना पूर्ण होने पर केश-दान की प्रथा जग-विख्यात है।
  9. बालाजी-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।
  10. जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
  11. जो एकादशी का व्रत धारण करता है, प्रभु उसके समस्त मनोरथ पूर्ण करते हैं।
  12. आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देते हैं।
  13. जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
  14. जो लड्डू-प्रसाद का भोग पाते हैं, वे हरि-कृपा से घर भरते हैं।
  15. आप समस्त रोग-दोष दूर भगाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  16. जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही बालाजी-कृपा प्राप्त करता है।
  17. आप मंगलकारी व विघ्नों के विनाशक हैं; भय हरकर सुख देने वाले हैं।
  18. आप ऋण-मुक्ति का वर देते हैं और भक्तों के सब संकट हरते हैं।
  19. जो श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
  20. जो यह बालाजी चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
  21. जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर बालाजी की कृपा होती है।
  22. सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
  23. जिन पर बालाजी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
  24. आप भगवान विष्णु जगत के पालक हैं; भव-सागर से तारने वाले हैं।
  25. जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर बालाजी देव तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाते हैं।
  26. आपका नाम संकट-मोचन है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करते हैं।
  27. आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
  28. कलियुग में आप सुलभ कहलाते हैं; जो जन आपकी शरण में आता है, वह तर जाता है।
  29. घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
  30. जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
  31. जो जन बालाजी-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
  32. तिरुमला-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारण व जगत-हितकारी हैं।
  33. आप जगत को मोक्ष का मार्ग दिखलाते हैं और शरणागत को पार लगाते हैं।
  34. आप जगत के पालक व परम कल्याणकारी हैं; भव-तारण व सुख देने वाले हैं।
  35. जो जन बालाजी के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
  36. जो जन बालाजी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
  37. घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है और भक्ति, श्रद्धा व संतोष बढ़ता है।
  38. जो जन बालाजी का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
  39. जो जन बालाजी-नाम गाता है, वह सहज ही मोक्ष-मार्ग पा लेता है।
  40. घर में हरि-कृपा व सुख आता है और भक्ति व शांति बढ़ती है।
  41. हे भय हरने वाले बालाजी, आपकी जय हो; हे प्रभु, शरण में आए हम सबकी रक्षा कीजिए।
  42. जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल बालाजी चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट दूर होते हैं और घर में हरि-कृपा आती है।

लाभ

  • ऋण, रोग व संकट से मुक्ति में सहायता मिलती है।
  • मन्नत व मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • विष्णु-भक्ति, सुख-शांति व समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • भय व नकारात्मकता से रक्षा होती है।

कब करें पाठ

शनिवार व एकादशी को · ब्रह्मोत्सव व पर्वों पर · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक तिरुपति बालाजी चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह

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