श्री तिरुपति बालाजी चालीसा

śrī tirupati bālājī cālīsā

Tirupati Balaji Chalisa (Venkateshwara, Tirumala)

समय
8–10 मिनट
श्लोक/चौपाई
42
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
शनिवार व एकादशी; पुरट्टासी मास
उद्देश्य:रक्षा (Protection)समृद्धि (Prosperity)शुभ आरंभ (Auspicious start)
✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)

श्री तिरुपति बालाजी चालीसा एक दोहे और चालीस चौपाइयों की स्तुति है, जो "जय श्रीवेंकटेश करुणा कर, श्रीनिवास स्वामी सुख सागर" से शुरू होती है। यह तिरुमला के वेंकटेश्वर की स्तुति है, और इसका बड़ा हिस्सा दर्शन-विधि बताता है: पुष्करिणी में स्नान, पहले वराह स्वामी के दर्शन, हुण्डी और लड्डू प्रसाद।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: तिरुमला–तिरुपति, आंध्र प्रदेश — वेंकटेश्वर परंपरा

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री तिरुपति बालाजी चालीसा
IASTśrī tirupati bālājī cālīsā
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोततिरुमला–तिरुपति, आंध्र प्रदेश — वेंकटेश्वर परंपरा
शुभ दिनशनिवार व एकादशी; पुरट्टासी मास
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा स्तुति के साथ-साथ तिरुमला जाने वाले भक्त की व्यावहारिक मार्गदर्शिका भी है — और यही इसे बाक़ी विष्णु-चालीसाओं से अलग करता है।

स्थान (चौपाई 3, 14–15). सप्तगिरि, शेषाचल, तिरुपति का पर्वत-शिखर। और वह बात जो तिरुमला की कथा का मूल है — भगवान ने श्रीवैकुण्ठ छोड़कर स्वामी पुष्करिणी के तट पर डेरा डाला, "भक्त कार्य करने को आये, कलियुग में प्रत्यक्ष कहाये"।

दर्शन का क्रम (चौपाई 17–21). यह हिस्सा सचमुच निर्देश देता है: पहले स्वामी पुष्करिणी में स्नान (17–18), फिर श्रीवराह स्वामी के दर्शन — "प्रथम यहां दर्शन अधिकारी श्रीवराह स्वामी सुखकारी" (19) — और उसके बाद ही श्रीवेंकटेश के। तिरुमला में आज भी यही परंपरा है: वराह स्वामी का दर्शन पहले।

हुण्डी और लड्डू (चौपाई 25–35). ग्यारह चौपाइयाँ इन्हीं दो पर हैं। हुण्डी — "श्रद्धा से कर हुण्डी सेवा, सेवा से पाते सब मेवा" (26)। और लड्डू — "‘लड्डू’ अमृत दिव्य स्वाद है" (29), जिसके बारे में चालीसा कहती है कि जो उसे पाता है वह ‘चौरासी’ में फिर नहीं आता (35)। किसी और चालीसा में प्रसाद को इतनी जगह नहीं मिली।

नाम की व्युत्पत्ति (चौपाई 36–37). एक सुंदर हिस्सा — "‘वें’ का अर्थ पाप बतलाया, ‘कट’ का अर्थ काट दे माया", यानी वेंकट = जो पाप काट दे। यह व्युत्पत्ति वराह पुराण की परंपरा में मिलती है।

अंतिम चौपाई में रचयिता की छाप है — "शब्द पुष्प श्री चरण चढ़ाकर, करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’"।

⚠️ नाम को लेकर एक भ्रम है जो दूर कर देना चाहिए। "बालाजी" दो अलग देवताओं का नाम है — तिरुपति के बालाजी विष्णु के वेंकटेश्वर रूप हैं, और मेहंदीपुर (राजस्थान) के बालाजी हनुमान जी हैं। दोनों की चालीसाएँ अलग हैं। यह पृष्ठ तिरुपति वाली का है।

संपूर्ण चालीसा

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तिरुपति की महिमा बड़ी, गाते वेद-पुरान। कलियुग में प्रत्यक्ष हैं, वेंकटेश भगवान॥

तिरुपति की महिमा बड़ी है, जिसे वेद और पुराण गाते हैं; कलियुग में वेंकटेश भगवान यहाँ प्रत्यक्ष विराजते हैं।

जय श्रीवेंकटेश करुणा कर। श्रीनिवास स्वामी सुख सागर॥

हे करुणा करने वाले श्रीवेंकटेश, आपकी जय हो; हे श्रीनिवास स्वामी, आप सुख के सागर हैं।

जय जय तिरुपति धाम निवासी। अखिल लोक स्वामी अविनाशी॥

हे तिरुपति धाम में निवास करने वाले, जय हो, जय हो; आप समस्त लोकों के स्वामी और अविनाशी हैं।

जय श्रीवेंकटेश भगवाना। करुणा सागर कृपा निधाना॥

हे श्रीवेंकटेश भगवान, आपकी जय हो; आप करुणा के सागर और कृपा के निधान हैं।

सप्तगिरि शेषाचल वासी। तिरुपति पर्वत शिखर निवासी॥

आप सप्तगिरि और शेषाचल पर वास करते हैं; तिरुपति पर्वत के शिखर पर निवास करते हैं।

श्री दर्शन महिमा अति भारी। आते नित लाखों नर नारी॥

आपके दर्शन की महिमा अत्यंत बड़ी है; नित्य लाखों नर-नारी यहाँ आते हैं।

देव ऋषि गंधर्व जगाते। सुप्रभात सब मिल कर गाते॥

देवता, ऋषि और गंधर्व आपको जगाते हैं; सब मिलकर सुप्रभातम् गाते हैं।

सकल सृष्टि के प्राणी आवें। सुप्रभात शुभ दर्शन पावें॥

समस्त सृष्टि के प्राणी यहाँ आते हैं और सुप्रभात के शुभ दर्शन पाते हैं।

विश्वरूप दर्शन सुखकारी। श्रीविग्रह की शोभा भारी॥

आपका विश्वरूप दर्शन सुख देने वाला है; आपके श्रीविग्रह की शोभा बहुत बड़ी है।

वेद पुराण शास्त्र यश गावें। अति दुर्लभ दर्शन बतलावें॥

वेद, पुराण और शास्त्र आपका यश गाते हैं और आपके दर्शन को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं।

जिन पर प्रभु कृपा करते हैं। उनको यह दर्शन मिलते हैं॥

जिन पर प्रभु कृपा करते हैं, उन्हीं को ये दर्शन मिलते हैं।

महा विष्णु श्रीमन्नारायण। भक्तों के कारज सारायण॥

आप महाविष्णु श्रीमन्नारायण हैं; भक्तों के कार्य सिद्ध करने वाले नारायण हैं।

शेषाचल पर सदा विराजे। शंख चक्र कर सुन्दर साजे॥

आप सदा शेषाचल पर विराजते हैं; हाथों में शंख और चक्र सुंदर सजते हैं।

अभय हस्त की मुद्रा प्यारी। सफल कामना करती सारी॥

आपके अभय-हस्त की मुद्रा प्यारी है, जो सारी कामनाएँ सफल कर देती है।

वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला। शरणागत रक्षक प्रतिपाला॥

हे वेंकटेश प्रभु, हे तिरुपति बाला — आप शरण में आए की रक्षा और पालन करते हैं।

श्रीवैकुण्ठ लोक निज तज कर। श्रीस्वामी पुष्करिणी तट पर॥

आप अपना श्रीवैकुण्ठ लोक छोड़कर श्री स्वामी पुष्करिणी के तट पर आ बसे —

भक्त कार्य करने को आये। कलियुग में प्रत्यक्ष कहाये॥

भक्तों का कार्य करने के लिए आए, और कलियुग में प्रत्यक्ष कहलाए।

स्वामी तीर्थ पुण्यप्रद पावन। स्नान मात्र सब पाप नशावन॥

स्वामी तीर्थ पुण्य देने वाला और पावन है; उसमें स्नान मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो इसमें करते हैं स्नान। उनको मिलता पुण्य महान॥

जो इसमें स्नान करते हैं, उन्हें महान पुण्य मिलता है।

प्रथम यहां दर्शन अधिकारी। श्रीवराह स्वामी सुखकारी॥

यहाँ पहले दर्शन के अधिकारी सुख देने वाले श्रीवराह स्वामी हैं।

पहले दर्शन इनका करके। भू-वराह को प्रथम सुमिर के॥

पहले उनके दर्शन करके, भू-वराह का प्रथम स्मरण करके —

श्रीवेंकटेश चरण चित धरना। श्रीनिवास के दर्शन करना॥

फिर श्रीवेंकटेश के चरणों में चित्त धरना और श्रीनिवास के दर्शन करना चाहिए।

वेंकटेश सम इस कलियुग में। अन्य देव नहीं इस जग में॥

इस कलियुग में वेंकटेश के समान इस जगत में कोई और देव नहीं।

पहले भी नहीं हुआ कहीं है। आगे हो यह सत्य नहीं है॥

पहले भी कहीं ऐसा नहीं हुआ, और आगे होगा — यह भी सत्य नहीं।

‘ओऽम्’ नम: श्रीवेंकटबाला। भक्तजनों के तुम रखवाला॥

"ॐ नमः श्रीवेंकटबाला" — आप भक्तजनों के रखवाले हैं।

भक्त जहां अगणित नित आते। सोना चांदी नकद चढ़ाते॥

यहाँ अगणित भक्त नित्य आते हैं और सोना, चाँदी तथा नकद चढ़ाते हैं।

श्रद्धा से कर हुण्डी सेवा। सेवा से पाते सब मेवा॥

जो श्रद्धा से हुण्डी में सेवा करते हैं, वे उस सेवा से सब मेवा पाते हैं।

श्रीनिवास की सुन्दर मूर्ति। मनोकामना करती पूर्ति॥

श्रीनिवास की सुंदर मूर्ति सबकी मनोकामना पूरी करती है।

दर्शन कर हर्षित सब तन मन। सुन्दर सुखद सुशोभित दर्शन॥

दर्शन करके तन-मन हर्षित हो जाते हैं; दर्शन सुंदर, सुखद और सुशोभित है।

दिव्य मधुर सुन्दर प्रसाद है। ‘लड्डू’ अमृत दिव्य स्वाद है॥

यहाँ का प्रसाद दिव्य, मधुर और सुंदर है — "लड्डू" अमृत जैसे दिव्य स्वाद का है।

महाप्रसाद दिव्य जो पाते। उनके पाप सभी कट जाते॥

जो यह दिव्य महाप्रसाद पाते हैं, उनके सभी पाप कट जाते हैं।

महिमा अति प्रसाद की भारी। मिटती भव बाधायें सारी॥

प्रसाद की महिमा अत्यंत बड़ी है; इससे भव की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।

केशर-चंदन युत चरणामृत। दिव्य सुगन्धित प्रभु का तीरथ॥

केसर-चंदन युक्त चरणामृत — यह प्रभु का दिव्य सुगंधित तीर्थ है।

तीर्थ-प्रसाद भक्त जो पाते। आवागमन मुक्त हो जाते॥

जो भक्त तीर्थ और प्रसाद पाते हैं, वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।

‘चौरासी’ में फिर नहीं आते। जो प्रसाद ‘लड्डू’ का पाते॥

जो "लड्डू" का प्रसाद पाते हैं, वे फिर चौरासी लाख योनियों में नहीं आते।

सुख संपत्ति वांछित फल पावे। फिर वैकुण्ठ लोक में जावे॥

वे सुख, सम्पत्ति और मनचाहा फल पाते हैं, और फिर वैकुण्ठ लोक को जाते हैं।

‘वें’ का अर्थ पाप बतलाया। ‘कट’ का अर्थ काट दे माया॥

"वें" का अर्थ पाप बताया गया है और "कट" का अर्थ है काट देना —

माया पाप काटने वाला। वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला॥

अर्थात माया और पाप को काटने वाले वेंकटेश प्रभु ही तिरुपति बाला हैं।

श्रीनिवास विष्णु अवतारा। महिमा जानत है जग सारा॥

श्रीनिवास विष्णु के अवतार हैं; उनकी महिमा सारा जगत जानता है।

जो यह श्री चालीसा गावे। सकल पदारथ जग के पावे॥

जो यह श्री चालीसा गाता है, वह जगत के सकल पदार्थ पा लेता है।

शब्द पुष्प श्री चरण चढ़ाकर। करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’॥

शब्दों के पुष्प श्रीचरणों में चढ़ाकर भक्त ‘गदाधर’ यह प्रार्थना करता है।

जय जय श्रीतिरुपति-पति श्रीनिवास भगवान। करो सिद्ध सब कामना स्वामी कृपा निधान॥

हे तिरुपति के पति श्रीनिवास भगवान, आपकी जय हो, जय हो; हे कृपा-निधान स्वामी, सब कामनाएँ सिद्ध कीजिए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. तिरुपति की महिमा बड़ी है, जिसे वेद और पुराण गाते हैं; कलियुग में वेंकटेश भगवान यहाँ प्रत्यक्ष विराजते हैं।
  2. हे करुणा करने वाले श्रीवेंकटेश, आपकी जय हो; हे श्रीनिवास स्वामी, आप सुख के सागर हैं।
  3. हे तिरुपति धाम में निवास करने वाले, जय हो, जय हो; आप समस्त लोकों के स्वामी और अविनाशी हैं।
  4. हे श्रीवेंकटेश भगवान, आपकी जय हो; आप करुणा के सागर और कृपा के निधान हैं।
  5. आप सप्तगिरि और शेषाचल पर वास करते हैं; तिरुपति पर्वत के शिखर पर निवास करते हैं।
  6. आपके दर्शन की महिमा अत्यंत बड़ी है; नित्य लाखों नर-नारी यहाँ आते हैं।
  7. देवता, ऋषि और गंधर्व आपको जगाते हैं; सब मिलकर सुप्रभातम् गाते हैं।
  8. समस्त सृष्टि के प्राणी यहाँ आते हैं और सुप्रभात के शुभ दर्शन पाते हैं।
  9. आपका विश्वरूप दर्शन सुख देने वाला है; आपके श्रीविग्रह की शोभा बहुत बड़ी है।
  10. वेद, पुराण और शास्त्र आपका यश गाते हैं और आपके दर्शन को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं।
  11. जिन पर प्रभु कृपा करते हैं, उन्हीं को ये दर्शन मिलते हैं।
  12. आप महाविष्णु श्रीमन्नारायण हैं; भक्तों के कार्य सिद्ध करने वाले नारायण हैं।
  13. आप सदा शेषाचल पर विराजते हैं; हाथों में शंख और चक्र सुंदर सजते हैं।
  14. आपके अभय-हस्त की मुद्रा प्यारी है, जो सारी कामनाएँ सफल कर देती है।
  15. हे वेंकटेश प्रभु, हे तिरुपति बाला — आप शरण में आए की रक्षा और पालन करते हैं।
  16. आप अपना श्रीवैकुण्ठ लोक छोड़कर श्री स्वामी पुष्करिणी के तट पर आ बसे —
  17. भक्तों का कार्य करने के लिए आए, और कलियुग में प्रत्यक्ष कहलाए।
  18. स्वामी तीर्थ पुण्य देने वाला और पावन है; उसमें स्नान मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
  19. जो इसमें स्नान करते हैं, उन्हें महान पुण्य मिलता है।
  20. यहाँ पहले दर्शन के अधिकारी सुख देने वाले श्रीवराह स्वामी हैं।
  21. पहले उनके दर्शन करके, भू-वराह का प्रथम स्मरण करके —
  22. फिर श्रीवेंकटेश के चरणों में चित्त धरना और श्रीनिवास के दर्शन करना चाहिए।
  23. इस कलियुग में वेंकटेश के समान इस जगत में कोई और देव नहीं।
  24. पहले भी कहीं ऐसा नहीं हुआ, और आगे होगा — यह भी सत्य नहीं।
  25. "ॐ नमः श्रीवेंकटबाला" — आप भक्तजनों के रखवाले हैं।
  26. यहाँ अगणित भक्त नित्य आते हैं और सोना, चाँदी तथा नकद चढ़ाते हैं।
  27. जो श्रद्धा से हुण्डी में सेवा करते हैं, वे उस सेवा से सब मेवा पाते हैं।
  28. श्रीनिवास की सुंदर मूर्ति सबकी मनोकामना पूरी करती है।
  29. दर्शन करके तन-मन हर्षित हो जाते हैं; दर्शन सुंदर, सुखद और सुशोभित है।
  30. यहाँ का प्रसाद दिव्य, मधुर और सुंदर है — "लड्डू" अमृत जैसे दिव्य स्वाद का है।
  31. जो यह दिव्य महाप्रसाद पाते हैं, उनके सभी पाप कट जाते हैं।
  32. प्रसाद की महिमा अत्यंत बड़ी है; इससे भव की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।
  33. केसर-चंदन युक्त चरणामृत — यह प्रभु का दिव्य सुगंधित तीर्थ है।
  34. जो भक्त तीर्थ और प्रसाद पाते हैं, वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
  35. जो "लड्डू" का प्रसाद पाते हैं, वे फिर चौरासी लाख योनियों में नहीं आते।
  36. वे सुख, सम्पत्ति और मनचाहा फल पाते हैं, और फिर वैकुण्ठ लोक को जाते हैं।
  37. "वें" का अर्थ पाप बताया गया है और "कट" का अर्थ है काट देना —
  38. अर्थात माया और पाप को काटने वाले वेंकटेश प्रभु ही तिरुपति बाला हैं।
  39. श्रीनिवास विष्णु के अवतार हैं; उनकी महिमा सारा जगत जानता है।
  40. जो यह श्री चालीसा गाता है, वह जगत के सकल पदार्थ पा लेता है।
  41. शब्दों के पुष्प श्रीचरणों में चढ़ाकर भक्त ‘गदाधर’ यह प्रार्थना करता है।
  42. हे तिरुपति के पति श्रीनिवास भगवान, आपकी जय हो, जय हो; हे कृपा-निधान स्वामी, सब कामनाएँ सिद्ध कीजिए।

लाभ

  • तिरुमला की दर्शन-विधि चालीसा के भीतर ही — पुष्करिणी स्नान, पहले वराह स्वामी, फिर वेंकटेश (चौपाई 17–21)।
  • हुण्डी सेवा और लड्डू प्रसाद की महिमा — ग्यारह चौपाइयाँ इन्हीं पर (25–35)।
  • "वेंकट" नाम की व्युत्पत्ति — वें = पाप, कट = काट देना (चौपाई 36–37)।
  • शनिवार और एकादशी का पाठ; तिरुपति यात्रा से पहले भी पढ़ा जाता है।

कब करें पाठ

शनिवार कोएकादशी के व्रत मेंपुरट्टासी (भाद्रपद–आश्विन) मास मेंतिरुपति यात्रा से पहले या लौटकर

पाठ विधि

भगवान वेंकटेश्वर के चित्र के समक्ष घी का दीप जलाएँ; तुलसी-दल और फल अर्पित करें। "ॐ नमो वेंकटेशाय" या "गोविंदा गोविंदा" का स्मरण कर पहले दोहा, फिर चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा पढ़ें। तिरुमला की परंपरा के अनुसार दर्शन में पहले वराह स्वामी को स्मरण किया जाता है — चालीसा की चौपाई 19–21 यही कहती हैं, इसलिए पाठ से पहले उनका भी स्मरण करना उचित है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (40/40 श्लोक)
स्रोत परंपराhindunidhi.com — श्री तिरुपति बाला जी चालीसा (आधार-पाठ) · sanatangyaan.com — श्री तिरुपति बालाजी चालीसा · aaradhika.com — श्रीवेंकटेश्वर चालीसा · रचयिता की छाप — चौपाई 40 "करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’" · ⚠️ मेहंदीपुर बालाजी (हनुमान) की चालीसा अलग रचना है; वह यहाँ नहीं ली गई।
रचयिताअज्ञात (छाप: गदाधर — चौपाई 40)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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