तिरुपति की महिमा बड़ी,
गाते वेद-पुरान।
कलियुग में प्रत्यक्ष हैं,
वेंकटेश भगवान॥
तिरुपति की महिमा बड़ी है, जिसे वेद और पुराण गाते हैं; कलियुग में वेंकटेश भगवान यहाँ प्रत्यक्ष विराजते हैं।
1जय श्रीवेंकटेश करुणा कर।
श्रीनिवास स्वामी सुख सागर॥
हे करुणा करने वाले श्रीवेंकटेश, आपकी जय हो; हे श्रीनिवास स्वामी, आप सुख के सागर हैं।
2जय जय तिरुपति धाम निवासी।
अखिल लोक स्वामी अविनाशी॥
हे तिरुपति धाम में निवास करने वाले, जय हो, जय हो; आप समस्त लोकों के स्वामी और अविनाशी हैं।
3जय श्रीवेंकटेश भगवाना।
करुणा सागर कृपा निधाना॥
हे श्रीवेंकटेश भगवान, आपकी जय हो; आप करुणा के सागर और कृपा के निधान हैं।
4सप्तगिरि शेषाचल वासी।
तिरुपति पर्वत शिखर निवासी॥
आप सप्तगिरि और शेषाचल पर वास करते हैं; तिरुपति पर्वत के शिखर पर निवास करते हैं।
5श्री दर्शन महिमा अति भारी।
आते नित लाखों नर नारी॥
आपके दर्शन की महिमा अत्यंत बड़ी है; नित्य लाखों नर-नारी यहाँ आते हैं।
6देव ऋषि गंधर्व जगाते।
सुप्रभात सब मिल कर गाते॥
देवता, ऋषि और गंधर्व आपको जगाते हैं; सब मिलकर सुप्रभातम् गाते हैं।
7सकल सृष्टि के प्राणी आवें।
सुप्रभात शुभ दर्शन पावें॥
समस्त सृष्टि के प्राणी यहाँ आते हैं और सुप्रभात के शुभ दर्शन पाते हैं।
8विश्वरूप दर्शन सुखकारी।
श्रीविग्रह की शोभा भारी॥
आपका विश्वरूप दर्शन सुख देने वाला है; आपके श्रीविग्रह की शोभा बहुत बड़ी है।
9वेद पुराण शास्त्र यश गावें।
अति दुर्लभ दर्शन बतलावें॥
वेद, पुराण और शास्त्र आपका यश गाते हैं और आपके दर्शन को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं।
10जिन पर प्रभु कृपा करते हैं।
उनको यह दर्शन मिलते हैं॥
जिन पर प्रभु कृपा करते हैं, उन्हीं को ये दर्शन मिलते हैं।
11महा विष्णु श्रीमन्नारायण।
भक्तों के कारज सारायण॥
आप महाविष्णु श्रीमन्नारायण हैं; भक्तों के कार्य सिद्ध करने वाले नारायण हैं।
12शेषाचल पर सदा विराजे।
शंख चक्र कर सुन्दर साजे॥
आप सदा शेषाचल पर विराजते हैं; हाथों में शंख और चक्र सुंदर सजते हैं।
13अभय हस्त की मुद्रा प्यारी।
सफल कामना करती सारी॥
आपके अभय-हस्त की मुद्रा प्यारी है, जो सारी कामनाएँ सफल कर देती है।
14वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला।
शरणागत रक्षक प्रतिपाला॥
हे वेंकटेश प्रभु, हे तिरुपति बाला — आप शरण में आए की रक्षा और पालन करते हैं।
15श्रीवैकुण्ठ लोक निज तज कर।
श्रीस्वामी पुष्करिणी तट पर॥
आप अपना श्रीवैकुण्ठ लोक छोड़कर श्री स्वामी पुष्करिणी के तट पर आ बसे —
16भक्त कार्य करने को आये।
कलियुग में प्रत्यक्ष कहाये॥
भक्तों का कार्य करने के लिए आए, और कलियुग में प्रत्यक्ष कहलाए।
17स्वामी तीर्थ पुण्यप्रद पावन।
स्नान मात्र सब पाप नशावन॥
स्वामी तीर्थ पुण्य देने वाला और पावन है; उसमें स्नान मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
18जो इसमें करते हैं स्नान।
उनको मिलता पुण्य महान॥
जो इसमें स्नान करते हैं, उन्हें महान पुण्य मिलता है।
19प्रथम यहां दर्शन अधिकारी।
श्रीवराह स्वामी सुखकारी॥
यहाँ पहले दर्शन के अधिकारी सुख देने वाले श्रीवराह स्वामी हैं।
20पहले दर्शन इनका करके।
भू-वराह को प्रथम सुमिर के॥
पहले उनके दर्शन करके, भू-वराह का प्रथम स्मरण करके —
21श्रीवेंकटेश चरण चित धरना।
श्रीनिवास के दर्शन करना॥
फिर श्रीवेंकटेश के चरणों में चित्त धरना और श्रीनिवास के दर्शन करना चाहिए।
22वेंकटेश सम इस कलियुग में।
अन्य देव नहीं इस जग में॥
इस कलियुग में वेंकटेश के समान इस जगत में कोई और देव नहीं।
23पहले भी नहीं हुआ कहीं है।
आगे हो यह सत्य नहीं है॥
पहले भी कहीं ऐसा नहीं हुआ, और आगे होगा — यह भी सत्य नहीं।
24‘ओऽम्’ नम: श्रीवेंकटबाला।
भक्तजनों के तुम रखवाला॥
"ॐ नमः श्रीवेंकटबाला" — आप भक्तजनों के रखवाले हैं।
25भक्त जहां अगणित नित आते।
सोना चांदी नकद चढ़ाते॥
यहाँ अगणित भक्त नित्य आते हैं और सोना, चाँदी तथा नकद चढ़ाते हैं।
26श्रद्धा से कर हुण्डी सेवा।
सेवा से पाते सब मेवा॥
जो श्रद्धा से हुण्डी में सेवा करते हैं, वे उस सेवा से सब मेवा पाते हैं।
27श्रीनिवास की सुन्दर मूर्ति।
मनोकामना करती पूर्ति॥
श्रीनिवास की सुंदर मूर्ति सबकी मनोकामना पूरी करती है।
28दर्शन कर हर्षित सब तन मन।
सुन्दर सुखद सुशोभित दर्शन॥
दर्शन करके तन-मन हर्षित हो जाते हैं; दर्शन सुंदर, सुखद और सुशोभित है।
29दिव्य मधुर सुन्दर प्रसाद है।
‘लड्डू’ अमृत दिव्य स्वाद है॥
यहाँ का प्रसाद दिव्य, मधुर और सुंदर है — "लड्डू" अमृत जैसे दिव्य स्वाद का है।
30महाप्रसाद दिव्य जो पाते।
उनके पाप सभी कट जाते॥
जो यह दिव्य महाप्रसाद पाते हैं, उनके सभी पाप कट जाते हैं।
31महिमा अति प्रसाद की भारी।
मिटती भव बाधायें सारी॥
प्रसाद की महिमा अत्यंत बड़ी है; इससे भव की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।
32केशर-चंदन युत चरणामृत।
दिव्य सुगन्धित प्रभु का तीरथ॥
केसर-चंदन युक्त चरणामृत — यह प्रभु का दिव्य सुगंधित तीर्थ है।
33तीर्थ-प्रसाद भक्त जो पाते।
आवागमन मुक्त हो जाते॥
जो भक्त तीर्थ और प्रसाद पाते हैं, वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।
34‘चौरासी’ में फिर नहीं आते।
जो प्रसाद ‘लड्डू’ का पाते॥
जो "लड्डू" का प्रसाद पाते हैं, वे फिर चौरासी लाख योनियों में नहीं आते।
35सुख संपत्ति वांछित फल पावे।
फिर वैकुण्ठ लोक में जावे॥
वे सुख, सम्पत्ति और मनचाहा फल पाते हैं, और फिर वैकुण्ठ लोक को जाते हैं।
36‘वें’ का अर्थ पाप बतलाया।
‘कट’ का अर्थ काट दे माया॥
"वें" का अर्थ पाप बताया गया है और "कट" का अर्थ है काट देना —
37माया पाप काटने वाला।
वेंकटेश प्रभु तिरुपति बाला॥
अर्थात माया और पाप को काटने वाले वेंकटेश प्रभु ही तिरुपति बाला हैं।
38श्रीनिवास विष्णु अवतारा।
महिमा जानत है जग सारा॥
श्रीनिवास विष्णु के अवतार हैं; उनकी महिमा सारा जगत जानता है।
39जो यह श्री चालीसा गावे।
सकल पदारथ जग के पावे॥
जो यह श्री चालीसा गाता है, वह जगत के सकल पदार्थ पा लेता है।
40शब्द पुष्प श्री चरण चढ़ाकर।
करे प्रार्थना भक्त ‘गदाधर’॥
शब्दों के पुष्प श्रीचरणों में चढ़ाकर भक्त ‘गदाधर’ यह प्रार्थना करता है।
जय जय श्रीतिरुपति-पति श्रीनिवास भगवान।
करो सिद्ध सब कामना स्वामी कृपा निधान॥
हे तिरुपति के पति श्रीनिवास भगवान, आपकी जय हो, जय हो; हे कृपा-निधान स्वामी, सब कामनाएँ सिद्ध कीजिए।