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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री तिरुपति गोविंदा आरती
आरती · श्री विष्णु
पाठ
1
गोविंदा हरि गोविंदा, वेंकट-रमणा गोविंदा। सप्तगिरि के स्वामी, श्रीनिवास गोविंदा॥
2
पद्मावती-वल्लभ, भक्तन हितकारी। शंख-चक्र-गदा-पद्म, धारे प्रभु प्यारी॥
3
सुप्रभातम् गाया जाता, दर्शन सुख देते। ऋण-संकट सब हरते, मनवांछित देते॥
4
कलियुग के तुम देवा, वैकुण्ठ-धाम सोहे। "गोविंदा" जयकारा, त्रिभुवन मन मोहे॥
5
गोविंदा की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। ऋण-संकट सब मिटते, हरि-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- गोविंदा, हरि गोविंदा, हे वेंकट-रमण गोविंदा! हे सात पहाड़ियों के स्वामी, हे श्रीनिवास गोविंदा (आपकी जय)।
- हे पद्मावती-वल्लभ, भक्तों का हित करने वाले; शंख, चक्र, गदा व पद्म धारण किए हे प्यारे प्रभु।
- प्रातः सुप्रभातम् गाया जाता है, आप दर्शन का सुख देते हैं; आप ऋण व संकट हर लेते हैं और मनोवांछित फल देते हैं।
- आप कलियुग के देव हैं, (तिरुमला) वैकुण्ठ-धाम सुशोभित है; "गोविंदा" का जयकारा तीनों लोकों के मन को मोह लेता है।
- जो भक्त श्रद्धा से गोविंदा (वेंकटेश्वर) की यह आरती गाता है, उसके ऋण-संकट मिट जाते हैं और वह हरि-कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- ऋण-मुक्ति व आर्थिक संकट से राहत मिलती है।
- मनोकामना पूर्ण होकर समृद्धि व सुख-शांति आती है।
- भक्ति व विष्णु-कृपा में वृद्धि होती है।
कब करें पाठ
शनिवार को · वैकुण्ठ एकादशी व एकादशी को · प्रातः (सुप्रभातम्) व संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
