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लिपि:
॥ श्री ॥

उत्पन्ना एकादशी

व्रत कथा · श्री विष्णु

पाठ

व्रत कथा

मुर असुर व देवी एकादशी का प्राकट्य

मुर नामक अत्यंत बलशाली असुर ने देवताओं को पराजित कर त्रिलोक में आतंक मचा दिया। भगवान विष्णु ने उससे सहस्र वर्ष तक युद्ध किया, किंतु वह पराजित न हुआ। विश्राम हेतु विष्णु बदरिकाश्रम की हेमवती गुफा में शयन करने लगे।

तभी मुर ने सोए हुए विष्णु पर आक्रमण करना चाहा। उसी क्षण विष्णु के शरीर से एक तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने अकेले ही मुर का संहार कर दिया।

देवी को "एकादशी" नाम व वरदान

प्रसन्न होकर विष्णु ने उस देवी को "एकादशी" नाम दिया और वरदान दिया कि जो भी एकादशी के दिन व्रत करेगा, उसके समस्त पाप नष्ट होंगे और उसे वैकुंठ की प्राप्ति होगी।

शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी व्रत का फल समस्त व्रतों व तीर्थों से भी अधिक है — यह भय दूर कर सुख, निर्भयता व अंत में मोक्ष प्रदान करता है।

लाभ

  • समस्त पापों का नाश
  • सभी व्रतों व तीर्थों से अधिक पुण्य
  • निर्भयता व सुख; अंत में वैकुंठ (मोक्ष)

स्रोत

उत्पन्ना एकादशी माहात्म्य — मुर असुर वध व देवी एकादशी का प्राकट्य · एकादशी माहात्म्य परंपरा

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